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बहराइच एम्बुलेंस के इंतजार में मासूम की तड़प-तड़प कर मौत, अस्पताल के दर पर जिंदगी दर-बदर

अस्पताल के दर पर जिंदगी दर-ब-दर होकर मौत में तब्दील हो गई। दिमाग को झकझोरते इस दृश्य ने दुष्यंत कुमार की पंक्तियां याद दिला दीं…

बहराइच एम्बुलेंस के इंतजार में मासूम की तड़प-तड़प कर मौत, अस्पताल के दर पर जिंदगी दर-बदर
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स्वप्निल द्विवेदी की कलम से सच्चाई को आइना दिखाती एक खास रिपोर्ट

जी हां उत्तर प्रदेश के बहराइच जिला अस्पताल का यह दृश्य महज एक चित्र नहीं, बल्कि आईना है। सरकार अपने दावों का सच देखना चाहती है तो इसमें झांकने की हिम्मत दिखाए। अफसर चुस्त-दुरुस्त व्यवस्था के दंभ की हकीकत महसूस करने का दम दिखाएं तो इसे देखें। दिमागी बुखार से मासूमों को बचाने के लिए अफसर से लेकर सीएम तक सरकारी अस्पताल बुलाते हैं। लेकिन अस्पताल के मरीजों के जीवन से खिलवाड़ किया जाता है। ताजा मामला है बहराइच मेडिकल कॉलेज का जहा मासूम को गोद मे लेकर मां-बाप ढाई घंटे तक बदहवास भटकते रहे। बच्चा लखनऊ रेफर किया गया, लेकिन सरकारी एंबुलेंस नहीं मुहैया कराई गई। अस्पताल के दर पर जिंदगी दर-ब-दर होकर मौत में तब्दील हो गई। दिमाग को झकझोरते इस दृश्य ने दुष्यंत कुमार की पंक्तियां याद दिला दीं…

'अब तो इस तालाब का पानी बदल दो, ये कमल के फूल अब कुम्हलाने लगे हैं।

पिता की गोद मे बच्चा और और हाथ मे ग्लूकोज की बोतल लिए बेबस माँ बच्चे को लेकर अस्पताल परिसर में ढाई घंटे तक एम्बुलेंस के लिए भटकते रहे। इन्हें देखकर हर आदमी का दिल पसीज गया, लेकिन निकम्मे सिस्टम में जुड़े नाकारे लोग तो बस रस्म अदायगी करते रहे। बेबसी इस कदर की गोद मे कलेजे के टुकड़े को तड़प तड़प कर मरते हुए देखना पड़ा।

रिसिया इलाके के नौवा गांव निवासी दिनेश का दो साल का पुत्र सचिन दिमागी बुखार से पीड़ित था। दो दिन पहले बेटे को लेकर मेडिकल कॉलेज बहराइच में आये दिनेश के बेटे को पीडियाट्रिक आइसीयू वार्ड में रखा गया, बुधवार को बेटे की हालत बिगड़ने पर चिकित्सकों ने उसे मेडिकल कॉलेज बहराइच से लखनऊ रेफर कर दिया।

बच्चे को लखनऊ मेडिकल कॉलेज ले जाने के लिए तीमारदार ने 108 एम्बुलेंस सेवा को साढ़े नौ बजे फोन किया परिजनों का आरोप है कि एक घंटे बाद एम्बुलेंस आई भी तो एम्बुलेंस कर्मियों ने इधर उधर दौड़ाया। मासूम को गोद में लेकर ढाई घंटे तक मा बाप एम्बुलेंस की तलाश में अस्पताल परिसर में भटकते रहे।

परिजनों का आरोप है की जब एम्बुलेंस आई तो उस पर तैनात कर्मी ने ऑक्सीजन व अन्य सुविधाओं के लिए पैसे मांगे। पैसे देने में अश्मर्थता जाहिर करने पर एम्बुलेंस कर्मी टाल मटोल करने लगा। इस दौरान तीन घंटे बीत गए और पिता की बांहों में मासूम ने सिसक सिसक कर दम तोड़ दिया। ये मौत उस सिस्टम के दावों को भी उजागर कर रही थी जो सरकार के बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं का दंभ भरते हैं। तिल तिल बेटे को मरता देख बदहवास माँ बाप सरकारी सिस्टम को कोसते हुए घर चले गए। इस मामले पर बोलने के लिए कोई जिम्मेदार अधिकारी तैयार नही है, लेकिन सच्चाई को उजागर करने वाली सिस्टम के निकम्मेपन के इस चित्र को तो नाकारा नही जा सकता।

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