शिवनाथ झा
'तिरंगा' उत्पादक और विक्रेता तिरंगे का व्यापार करते हैं .... 'तिरंगा' उत्पादक और विक्रेता तिरंगा के कल्पनाकार को नहीं जानता, नहीं पहचानता, क्रेताओं को नहीं बताता उनके बारे में, वह तो महज मुनाफ़ा के लिए तिरंगा बेचता है। 'बेचना और खरीदना' व्यापार का एक अहम् हिस्सा है और तिरंगा का व्यापार हो, यह शुभ संकेत नहीं है।
अतः इस कहानी के माध्यम से मैं देश के प्रधानमंत्री सम्मानित श्री नरेंद्र मोदी जी से निवेदन करता हूँ कि वे भारत के लोगों को आह्वान करें कि अगले वर्ष 2023 में और आगे, जब आज़ाद भारत के लोग जश्ने आज़ादी का वर्ष मनाएं, वे अपने-अपने घरों में, माँ के साथ, दादा-दादी के साथ, नाना-नानी के साथ, बहनों के साथ, घर-समाज के बड़े-बुजुर्गों के साथ बैठकर तिरंगा के नियमों का ह्रदय से पालन करते अपने-अपने हाथों से तिरंगा बनायें, लहरायें, फहराएं - लेकिन बाजार में न तो तिरंगा बेचें और ना ही बाज़ार से तिरंगा खरीदें। क्योंकि देश के बच्चे ही नहीं, युवक और वुजूर्ग भी, न तो आज तिरंगा की जीवन-यात्रा को जानते हैं, न अपनी अगली पीढ़ियों को बताते हैं। यही कारण है कि आज इस तिरंगा के कल्पनाकार सम्मानित पिंगली वेंकैय्या साहब को नहीं जानते और सम्मानित पिंगले साहब के बारे में न तो तिरंगा उत्पादक बताता है और ना ही बाजार में तिरंगा बेचने वाला ही
फ्लैग फाउंडेशन ऑफ़ इण्डिया देश में अब तक लगभग 100 विशालकाय ध्वज देश में लगा चुका है, जिसमें 13 झंडे 207 फुट से ऊंचे हैं। फ्लैग फाउण्डेशन के संस्थापक यह मानते हैं कि उनकी पहल के बाद पुरे देश में अनेक संस्थाएं आगे आईं और अभी तक 500 से अधिक विशालकाय ध्वज पुरे देश में लगाए जा चुके हैं। उनका यह भी मानना है कि किसी भी देश में इतने विशालकाय झंडे नहीं हैं, जितने हमारे देश भारत में हैं।
फ्लैग फाउंडेशन के संस्थापक यह भी स्वीकार करते हैं और कहते हैं कि : "हालांकि यह सत्य है कि सिर्फ तिरंगा प्रदर्शित करने से कोई देशभक्त नहीं बन जाता। यह प्रतीकात्मक है लेकिन किसी भी काम में सफलता के लिए हम इसे प्रेरणा स्रोत अवश्य बना सकते हैं। मेरा मानना है कि हम सभी अपने-अपने काम राष्ट्रहित में ईमानदारी दे करते रहें तो कोई भी ताकत भारत को खुशहाल राष्ट्र बनने से नहीं रोक सकती। तिरंगा हमारा राष्ट्रीय ध्वज है, जो देश की संप्रभुता और स्वाभिमान का सर्वोच्च प्रतीक है ही, राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए मर-मिटने वालों के बलिदान का भी प्रतीक है। हमें इसका मान-सम्मान बनाए रखना है। हमें सदैव याद रखना है, झंडा ऊंचा रहे हमारा।"
विगत 13, 14 और 15 अगस्त, 2022 को आज़ादी के अमृत महोत्सव के अवसर पर, देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र दामोदर मोदी जी के आह्वान पर 'हर घर तिरंगा' लहराने, फहराने का कार्य भारत के लोगों ने बहुत उत्साह से संपन्न किया। प्रधानमंत्री के आदेश पर बने वेबसाइट पर कोई पांच लाख से अधिक तिरंगे के साथ सेल्फी भी प्रेषित किया भारत के लोगों ने। उधर दिल्ली के मुख्यमंत्री श्री अरविन्द केजरीवाल अपने प्रदेश में करीब 25 लाख तिरंगा भी बांटा। प्रधानमंत्री के 'नारा' को कॉपी-पेस्ट करते उन्होंने ने भी 'हर हाथ तिरंगा' का नारा बुलंद किया। बेहतर है। 'सरकार द्वारा निर्धारित से 9/- रुपये, 18/- रुपये और 25/- रुपये में बाजार से तिरंगा खरीदकर भारत के घरों में, खिड़कियों पर, दरवाजों पर, छतों पर, गाड़ियों में, स्कूटरों में, बैलगाड़ियों पर, साइकिलों पर, रिक्शों पर, बसों पर, ट्रकों पर, राष्ट्रीय ध्वज को बांधने, लहराने, फहराने से हम स्वतंत्रता दिवान की ख़ुशी ज़ाहिर किये। शायद स्वतंत्र भारत में पहली बार लोगों ने इस कदर 'राष्ट्रप्रेम', 'राष्ट्रभक्ति', स्वाधीनता के लिए अपने प्राणों को उत्सर्ग करने वाले बलिदानियों के प्रति आस्था और विश्वास दिखाया है।
कहते हैं भारत के राष्ट्रीय ध्वज में 1906 से लेकर साल 1947 तक अलग-अलग बदलाव आए हैं। आज जो हमें ध्वज दिखता है वह पहले से वाले काफी अलग है। भारत के राष्ट्रीय ध्वज का इतिहास बहुत पुराना है। वर्तमान में जो हमारे देश राष्ट्रीय ध्वज है, उससे पहले कई बार ध्वज बदल चुके हैं। कहते हैं 1857 को हमने पहला स्वतंत्रता संग्राम मनाया था। उस दौरान सबका अपना-अपना झंडा था, लेकिन पहली बार क्रांतिकारियों ने एक झंडे को अपना झंडा बनाया एक हरे रंग का झंडा का आकार-प्रकार दिया जिसके ऊपर कमल था। आज़ादी की पहली लड़ाई के लिए यही वो झंडा था जिसे फहराया गया था। बाद में 1906 में कोलकाता के पारसी बागान चौक पर तिरंगा फहराया गया था। इस पर हरे पीले और लाल रंग से बनाया गया था जिसके बीच में 'वंदे मातरम' लिखा था।
सन 1907 में मैडम कामा द्वारा भारतीय क्रांतिकारियों की मौजूदगी में पेरिस में यह ध्वज फहराया गया जो 1906 के ध्वज से कुछ अलग थे। इसमें सबसे ऊपर लाल पट्टी का रंग केसरिया का और कमल के बजाय सात तारे थे जो सप्त ऋषि का प्रतीक था। उसमें आखिरी पट्टे पर सूरज और चांद भी अंकित किए गए थे। इसके दस साल बाद 1917 में जब राजनीतिक संघर्ष ने एक नया मोड़ लिया तब तीसरा झंडा आया भारतीयों के बीच। कह सकते हैं कि होमरूल आंदोलन के तहत इस ध्वज को एक दिया गया जिसे डॉ. एनी बेसेंट और लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने फहराया। उस ध्वज में पांच लाल और चार हरी क्षितिज पट्टियां थीं और यूनियन जैक भी मौजूद था। प्राचीन परंपरा को दर्शाते हुए सप्तऋषि और एकता दिखाने के लिए चांद और तारे मौजूद थे।
इसके बाद साल 1921 में दो रंगों का ध्वज था - लाल-हरा पट्टी का। महात्मा गाँधी ने सुझाव दिया कि भारत के शेष समुदाय का प्रतिनिधित्व करने के लिए इसमें एक सफेद पट्टी और राष्ट्र की प्रगति का संकेत देने के लिए एक चलता हुआ चरखा सम्मिलित करना चाहिए। गाँधी के इक्षानुसार चरखा जोड़ा। इसी बीच में नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने जर्मनी में एक ध्वज फहराया जिसमें ऊपर केसरिया, बीच में सफेद, नीचे हरा और बीच में एक टाइगर मौजूद था। बहरहाल 1931 में ध्वज को केसरिया, सफेद और हरे रंग के साथ, मध्य में गांधी जी के चलते हुए चरखे का साथ मिला। तत्पश्चात अशोक चक्र का सफर आता है। सन 1947 में सावरकर ने चरखे की कमेटी को एक टेलीग्राम भेजा और कहा कि तिरंगे के बीच में मध्य अशोक चक्र होना चाहिए."
उनके विचार को सहर्ष स्वीकार किया गया। 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने उसे आजाद भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के रूप में वरण किया। अशोक चक्र होने का अर्थ 'अखंड भारत', एक बड़ा भारत, एक दिव्य भारत का प्रतिक। इस ध्वज की कल्पना पिंगली वेंकैय्या ने की थी। तीन समान चौड़ाई की क्षैतिज पट्टियाँ हैं, जिनमें सबसे ऊपर केसरिया रंग की पट्टी जो देश की ताकत और साहस को दर्शाती है, बीच में श्वेत पट्टी धर्म चक्र के साथ शांति और सत्य का संकेत है और नीचे गहरे हरे रंग की पट्टी देश के शुभ, विकास और उर्वरता को दर्शाती है। ध्वज की लम्बाई और चौड़ाई का अनुपात 3:2 है। सफेद पट्टी के मध्य में गहरे नीले रंग का एक चक्र है जिसमें 24 तीलियां होते हैं, यह इस बात प्रतीक है भारत निरंतर प्रगतिशील है|
तिरंगे की इस कठिन यात्रा में 'मशीनीकरण' नहीं था। इसकी रचना की कल्पना मन और आत्मा में थी और निर्माण हाथों से हुआ था। इस वीडियो के माध्यम से मैं भारत के प्रधानमंत्री सम्मानित श्री नरेंद्र दामोदर मोदीजी से आग्रह करता हूँ, निवेदन करता हूँ कि जिस प्रकार आज़ादी के अमृत महोत्सव के अवसर पर उन्होंने लोगों से कहा कि वे अपने-अपने घरों में तिरंगा का सम्मान करते हर घर तिरंगा लहरायें, फहराएं, तिरंगा के प्रति आस्था और विश्वास को मजबूत बनायें; मैं निवेदन करता हूँ की अगले वर्ष और उसके आगे जब आज़ाद भारत के लोग आज़ादी का जश्न मनाएं, वे अपने-अपने घरों में, माँ के साथ, दादा-दादी के साथ, नाना-नानी के साथ, बहनों के साथ बैठकर तिरंगा के नियमों का ह्रदय से पालन करते अपने-अपने हाथों से तिरंगा बनायें, लहरायें, फहराएं - लेकिन बाजार में न तो तिरंगा बेचें और ना ही बाज़ार से तिरंगा खरीदें। क्योंकि देश के बच्चे ही नहीं, युवक और वुजूर्ग भी, न तो आज तिरंगा की जीवन-यात्रा को जानते हैं, न अपनी अगली पीढ़ियों को बताते हैं। यही कारण है कि आज इस तिरंगा के कल्पनाकार सम्मानित पिंगली वेंकैय्या साहब को नहीं जानते और सम्मानित पिंगले साहब के बारे में न तो तिरंगा उत्पादक बताता है और ना ही बाजार में तिरंगा बेचने वाला ही