संयुक्त परिवार को निजता के नाम पर तोड़ने के बाद, अब वामपंथी विमर्श के निशाने पर मध्यमवर्ग की महिलायें

Update: 2021-03-09 05:22 GMT

सोनाली मिश्रा 

यह सीरीज धीरे धीरे इतना महीन जहर हमारे दिमागों में घोल रही हैं कि स्त्रियाँ उससे बाहर नहीं आ पाएंगी. किसी का नाम नहीं ले रही, मगर एक मध्य वर्ग की स्त्री की कहानी के नाम पर बनी फ़िल्में देह की कुंठा से शुरू होती हैं और फिर पच्चीस रूपए के बर्गर की तरह एक सतही संतुष्टि पर समाप्त होती है.

फिर से हम उसी बात पर जाएंगे कि जो भी यह कहानी लिखता है या लिखती है, वह समाज को ऊपर से देखता है और फिर अपनी व्यक्तिगत यौन कुंठा को मिलाकर दर्शकों के सामने परोस देती है या देता है. कभी आपने प्रश्न किया है कि पचास साल के बाद या कहें पैंतालीस वर्ष के बाद की स्त्रियों में अकेलापन क्यों आ जाता है? यह कभी प्रश्न कीजिएगा? उनमें अकेलापन इसलिए नहीं आता कि सारा जीवन उन्होंने अपने बच्चों को दे दिया? क्योंकि आपके जीवन में जब बच्चे आते हैं, तो उन्हें इस समाज में सार्थक भूमिका के लिए योग्य बनाने के लिए ही आपके वह वर्ष हैं. उन्हें अकेलापन इसलिए आता है क्योंकि वह अपनी बेटी या बेटे के विवाह के बाद उस माँ के खोल से बाहर नहीं निकलना चाहतीं. वह अपने बेटे या बेटी को सुखद वैवाहिक जीवन नहीं जीने देना चाहती हैं. मैंने कई स्त्रियों को देखा है कि वह अपनी बेटी को यहाँ तक निर्देश देती हैं कि बिस्तर पर कैसे जाना है और पूछती हैं कि पति कितनी देर साथ रहा.

कई बेटे की माओं को देखा है वह अपने बेटे को अपनी बहू के साथ केवल एक घंटे के लिए जाने देना चाहती हैं. यह इसीलिए होता है क्योंकि आपके बच्चे आपके लिए इन्वेस्टमेंट होते हैं, और जब वह इन्वेस्टमेंट दूसरे फंड में जा रहा है तो आपको दुःख हो रहा है.

हमारे यहाँ आश्रम व्यवस्था थी. उसमें गृहस्थ के बाद बहुत ही सुन्दर आश्रम का वर्णन है, और वह है वानप्रस्थ. अर्थात आपको अब इस मोह से तोड़कर आगे बढ़ने की जरूरत है और अब आपको वानप्रस्थ करना है, वन में जाकर बस नहीं जाना है, बल्कि जो गृहस्थी है उससे मोह दूर करना है. गृहस्थी का उत्तरदायित्व अपने बेटे और बहू को सौंपना है और स्वयं को उस ईश्वर की तलाश के लिए तैयार करना है जिन्होंने आपको एक उद्देश्य देकर भेजा था और वह था सृष्टि संचालन के लिए एक योग्य नागरिक पैदा करने का उद्देश्य. जब आपने वह कर दिया, अब स्वयं को तलाशिये! स्वयं को जीइए! जीवन केवल घर की चारदीवारी या बच्चों तक सीमित न रखिये.

किताबें पढ़िए, कुछ नहीं तो किसी गरीब बच्चे को पढ़ा लीजिए!

सार्थक कीजिए फिर अकेलापन नहीं आएगा. बच्चे तो एक दिन जाएंगे ही, क्योंकि उन्हें जाना ही है, कार्य के सिलसिले में, जीवन जीने के लिए, आप अपने स्वार्थ के लिए उनकी उड़ान कैसे रोक सकती हैं? मगर चूंकि आप अपने गृहस्थ जीवन के केवल घर में रहने की आदी हो जाती हैं, तो बंधन कौन तोड़े? कौन सुविधा से बाहर निकले? कौन दर्द झेले? मैं कई स्त्रियों से कहती हूँ कि जीवन भर आपने राम को नहीं पढ़ा, अब घुटने के दर्द में बताने के लिए मुझे फोन न करें, क्योंकि ध्यान आप करेंगी नहीं, व्यायाम करेंगी नहीं, यहाँ तक कि रामचरित मानस पढ़ेंगी नहीं, फिर रोने का फायदा नहीं!

वानप्रस्थ आपको उस मोह से काटने का परिवर्तन काल है, जिसमें आप इतने वर्षों तक फंसी हुई थीं, चूंकि आप उस मोह से बाहर नहीं निकलना चाहती हैं, तो आप कुंठित होती हैं और इसी कुंठा का फायदा एक यौनकुंठित लेखक या लेखिका उठाती है और आपके जीवन की कथा लिखकर पूरे समाज की कहानी पर दावेदारी जताती है. और मजे की बात यह है कि वह खुद जानती हैं कि उसने छटांक भर ही सच लिया है.

जितना जितना हम जड़ों से कटेंगे, मूल कॉन्सेप्ट्स से कटेंगे, वानप्रस्थ और संन्यास जैसी अवधारणाओं का उपहास करते रहेंगे, निष्काम कर्म का उपहास करते रहेंगे, कुंठित रहेंगे, दुखी रहेंगे. मजा लेंगे, आनंद नहीं! और इन यौनकुंठित लेखिकाओं का शिकार बनते रहेंगे और उनके शब्दों पर नाचते रहेंगे!

निर्णय आपके हाथ में हैं, जड़ों की ओर लौटना है या फिर कुंठाओं में लिपटी हुई विष्ठा अपनी देह और मस्तिष्क में लपेटनी है!

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