बूढ़े माँ बाप का एक टूटा हुआ चश्मा नहीं बनवा पाए, दस हजार का बकरा ले आए, क्या यह कुर्बानी अल्लाह को पसंद होगी
बकरीद में दस हज़ार, बीस हजार, पचास हजार या लाख रुपये का बकरा कुर्बान कर दिया तो क्या हुआ, अल्लाह के नज़दीक आ गए माज़ अल्लाह कोई एहसान कर दिया उस मालिक ए कायनात पर? अला कुल्ले शैय्यन कदीर, कण कण पर उसका कब्ज़ा है, हर शै का मालिक व काबिज़ है। कुर्बान करें अपनी जान से ज़्यादा प्यारी हमारी ख्वाहिशें, हमारी एन्द्रिक इच्छाएं, हमारी भौतिक लालसा, ऐशो आराम ऊंचे पद पर पहुचने की ललक, दौलत इकट्ठी करने की हवस, भोग विलास की कामनाएं।
स्वार्थ और बदनीयती। बकरा तो एक प्रतीक है हमारी दौलत और माल का हज़रत इब्राहीम से बकरा नहीं मांगा गया था उनसे उनका बेटा भी नहीं मांगा गया था उनसे कहा गया था कि वह अपनी सबसे ज्यादा प्यारी चीज़ अल्लाह की राह में उसकी रज़ा में बिना किसी सवाल जवाब के बिना किसी उजर के कुर्बान कर दें। चूंकि उनकी बुढ़ापे की संतान उनके बेटे इस्माइल ही उनकी सबसे बड़ी प्यारी चीज़ थे सो वे चल पड़े अपनी कुर्बानी देने। खुदा की रज़ा मे समर्पण की पराकाष्ठा थे वे।
आप और हम अपना दिल टटोल कर देखें तो एक से बढ़ कर एक इच्छाएं तमन्नाए, लालसाएं अंदर मचल रही होंगी कुछ तो इतनी प्रबल होगी कि उसके आगे रिश्ते नाते अपना पराया सब कुछ दाव पर लगा सकते हैं। उनमे सबसे ज्यादा अजीज़ कौन सी चीज़ है कौन सा पद, प्रतिष्ठा है कौन सी ऐश आराम की वस्तु है उसे छोड़ने के ख्याल से ही हम आप ड़र जाते हैं चलो दिल टटोल कर देखें और उसे छोड़ दें कुर्बान कर दें। और यह छोड़ने की कोशिश और इस तरह की हिम्मत ही पैदा करने के लिए कुर्बानी दी जाती है बकरे की जान लेने या गोश्त फ्रीज़ में भर कर कवाब बिरयानी उड़ाने के लिए नहीं। समाज में सबके घर में कुर्बानी हो रही है और हमे कोई छोटा न समझे इसलिए स्टेटस मेनटेन करने के लिए नहीं।
घर में बूढ़े माता पिता का एक टूटा हुआ चश्मा नहीं बनवा पा रहे हो और दस हजार का बकरा ले आए मेरी समझ में यह कुर्बानी अल्लाह को नापसंद होगी। तुम्हारे पड़ोस में एक बीमार दवाइयों के लिए तड़प रहा है बच्चे भूख बीमारी बाढ़ आक्सीजन की कमी से जूझ रहे हैं और तुम प्लेटो में गोश्त बंटाते फिरो कुर्बान कर दो न अपनी एक महीने की अराइशें एक बीमार का इलाज करा दो इस साल के बकरे के पैसों से ब्याह दो किसी गरीब की बेटी या पढ़ाई में खर्च कर दो किसी गरीब बच्चों के तुम्हारी यह कुर्बानी तुम्हें बिना किसी बकरे की पीठ पर सवार हुए जन्नत ले जाएगी। कुरान की मंशा समझो। सबकुछ अल्लाह के लिए लुटा देने औरउसकी रज़ा मे शामिल होने का नाम ही कुर्बानी है।
अल्लाह को ज़ुल्म नापसंद है फिर वह किसी का बेटा या बकरा नहीं मांग सकता वह तो तुम्हें हमे टटोलता है कि हम अपने माल दौलत से कितना चिपके हुए हैं। उस ज़माने में पशुधन ही माल दौलत का पर्याय थी इसलिए भेड़ या बकरा प्रतीक है। कुर्बानी करना चाहिए और इसके लिए ज़रूरी है कि हमारी प्राथमिकता अपने घर में परिवार में आस पास के समाज में यदि कोई उससे भी ज्यादा ज़रूररत मंद है तो वह ज़्यादा अहम है न कि बकरा ज़िबह करना। वह कुर्बानी बकरे की कुर्बानी से बेहतर है। यह मेरे अपने विचार हैं अपनी सोच और अमल है इसे किसी भी धार्मिक विवाद का रूप देने की कोशिश न करें। आप सबको ईद उल अज़हा की मुबारकबाद।