Navratri 2022 : कन्या पूजन की क्या है विधि? आयु के हिसाब से करें कन्या पूजन

Update: 2022-10-04 05:26 GMT

"मिट जायेंगे कष्ट सारे, दूर होंगी सारी परेशानी, कन्या रूप में पूजी जाएँगी जब माँ अष्ट भवानी।" नवरात्रि के दौरान, कन्या पूजन का विशेष महत्व है। देवी भागवत पुराण में लिखा है कि, "बिना कन्या पूजन के नवरात्रि के व्रत संपन्न नहीं होते हैं।" कोई अष्टमी तिथि को कन्या पूजन करता है तो कोई नवरात्रि की नवमी तिथि को। कन्या पूजन के दौरान, नौ कन्याओं और एक छोटे बालक को भोज कराने का विधान है। इन कन्याओं की आयु, दो साल से दस साल के बीच होनी चाहिए। इन नौ कन्याओं को नौ देवियों का स्वरूप माना जाता है। वहीं, बालक को लांगुर का स्वरूप माना जाता है। मान्यता है कि कन्या भोज और पूजन से माता रानी अत्यंत प्रसन्न होती हैं और अपने भक्तों के तमाम कष्टों को दूर करती हैं। शास्त्रों में आयु के हिसाब से कन्या भोज कराने का महत्व बताया गया है। आइए जानें इसके बारे में...

आयु के हिसाब से कन्या पूजन

आयु के हिसाब से कन्या पूजन से जुड़ी मान्यताएं इस प्रकार हैं:-

कहा जाता है कि दो साल की कन्या का पूजन करने से दरिद्रता दूर होती है।

तीन साल की कन्या के पूजन से घर में सुख-समृद्धि आती है और साथ ही धन-धान्य की कमी नहीं रहती।

चार साल की कन्या का पूजन करने से घर की सारी समस्याओं का अंत और परिवार के सदस्यों का कल्याण होता है।

पांच साल की कन्या का पूजन करने से व्यक्ति का रोग और व्याधि, दोनों दूर होते हैं।

छ: साल की कन्या, कालका देवी का रुप मानी जाती है। उसकी पूजा करने से विद्या और विजय की प्राप्ति होती है।

सात साल की कन्या का पूजन करने से ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।

आठ और नौ साल की कन्याएं, साक्षात दुर्गा का रूप कहलाती हैं। उनका पूजन करने से असाध्य काम भी पूरे हो सकते हैं।

दस साल की कन्या का पूजन करने से भक्तों की हर मनोकामना पूरी होती है।

कन्या पूजन विधि

वैसे तो कन्या पूजन, नवरात्रि के दौरान कभी भी किया जा सकता है। लेकिन इसके लिए अष्टमी और नवमी तिथि को श्रेष्ठ माना गया है। कन्या पूजन करने के लिए कन्याओं को आमंत्रित करना चाहिए। उनके घर आगमन पर, फूलों से उनका स्वागत करें और उनके पैरों को एक थाल में पानी डालकर धुलवाएं। उसके बाद उन्हें सम्मानपूर्वक, प्रसाद के रूप में बनाया हुआ भोजन कराएं। कन्या भोज से पहले, मां दुर्गा को भोग लगाएं। कन्याओं को तिलक लगाएं, कलावा बांधें और उन्हें चरणस्पर्श कर, उनका आशीर्वाद प्राप्त करें। आखिर में उन्हें सामर्थ्य अनुसार दक्षिणा व उपहार देकर सम्मानपूर्वक विदा करें।

नौ दिन तक चलने वाला इस महापर्व का समापन हो जाता है, यह पता ही नहीं चलता। क्योंकि भक्त, पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ नौ दिनों तक, माता रानी की भक्ति से सराबोर रहते हैं और साथ ही व्रत और अन्य भक्ति कार्यक्रमों में भाग लेकर इस पर्व को मनाते हैं। नवरात्रि का समापन तो हो जाता है, लेकिन भक्ति का नहीं। क्योंकि इस पर्व के दौरान, उनके मन में जो भक्ति की ज्योत उजागर होती है, वह अखंड हो जाती है।

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