...अपनी थाल से दे दो वो वासी निवाला मौला

खुसरो मौला के रुठते पीर के सरने जाय, कह खुसरो रूठे पीर तो मौला नहीं होत सहाय..;

Update: 2018-01-07 07:42 GMT

आँखों में पानी और थके पाँव उम्मीद का दरिया लिए तमाम जायरीन उस पीर के दर पर पहुंच रहे है. उन्हें सब्र है कि उनकी बात मौला तक पहुँचाने का यही एकमात्र जरिया है. इसी उम्मीद के सहारे वो थके पाँव बेबस खींचे चले आते है. 


22 ख्वाजाओं की चौखट कही जाने वाली दिल्ली में ख्वाजा निजामुद्दीन औलिया की दरगाह हर दर्द को दूर करने की दवा है, तो दिलों में प्रेम की बर्षा कर देंने का जरिया है. ख्वाजा को जो शान इस दरगाह पर मिली है वो उनके सबसे ख़ास अमीर खुसरो के हिस्से में आई है. यही वजह है कि आज जब औलिया की दरगाह पर नूर की वारिश हो रही है तब 714वें उर्स पर अमीर खुसरो की कब्र भी रोशन और जायरीनों से गुलजार है. 

 यहाँ आने वाले हर सर ख्वाजा के कदमों में सजदा कर रहे है. यहाँ आने वाला हर शख्स और फैले हुए हाथ वही जौ की रोटी का निवाला मांग रहे है जो वह सूफी मुकाम का मालिक तन्हाई में बैठकर खाता था. उनकी यह मांग कब्बालों के लव से कव्वाली बनकर फूटती है.    

अपनी थाल से दे दो वासी निवाला    
रहमत का निवाला  मौला रहमत का निवाला 


फकीर चिराग अली शाह ने कहा कि जब आदमी दुनियावी परेशानियों में उलझकर उन उलझनों से परेशान होकर खुदा की खोज में निकलता है तो सूफी इस राह में उसकी मदद करता है. दरगाह गंगा जमुनी तहजीब की मिशाल बन चूका है. इस दरगाह पर आने वाले जायरीन हिन्दू मुस्लिम दोनों समुदाय से आते है. यहाँ जाती धर्म की बात नहीं होती है. 

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