6 अक्टूबर तक पितृपक्ष, श्राद्ध कर्म के लिए इन 12 स्थानों का है विशेष महत्व

पितरों की मुक्ति हेतु किए जाने वाले कर्म तर्पण, भोज व पिंडदान को पूरे रीति रिवाजों से नदी के किनारे किया जाता है

Update: 2021-09-23 11:32 GMT

पितृपक्ष भादपद्र माह की पूर्णिमा तिथि से आरंभ होकर अश्विन मास की अमावस्या तक रहते हैं। पितृपक्ष 16 दिन के होते हैं। इस बार पितृपक्ष 20 सितंबर 2021 से शुरू होकर 6 अक्टूबर 2021 तक रहेंगे। पितृपक्ष में लोग अपने पितरों का तर्पण और श्राद्ध करते हैं। मान्यता है कि पितृ पक्ष में पिंड दान, श्राद्ध और तर्पण करने से पितर प्रसन्न होते हैं और अपना आशीर्वाद प्रदान करते हैं। पितरों को हिंदू धर्म में देवतुल्य माना जाता है। सनातन धर्म में इस समय का विशेष महत्व होता है। 

पितरों की मुक्ति हेतु किए जाने वाले कर्म तर्पण, भोज व पिंडदान को पूरे रीति रिवाजों से नदी के किनारे किया जाता है. हमारे देश में पितृ दोष शांति के लिए 12 तीर्थों को मुख्य माना गया है. माना जाता है कि इन प्रमुख स्थानों पर श्राद्ध करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है. आइये आपको बताते हैं वो कौन से प्रमुख स्थान हैं, जहां पितृ दोष शांति के लिए श्राद्ध कर्म करवाना शुभ माना गया है.

श्राद्ध पक्ष के लिए इन स्थानों को माना गया है सबसे खास

हरिद्वार (उत्तराखंड):उत्तराखंड के हरिद्वार में भी श्राद्ध कर्म होता है. माना जाता है कि हर की पौड़ी पर सप्त गंगा, त्रि-गंगा और शकावर्त में विधिपूर्वक देव ऋषि व पितृ तर्पण करने वाला पुण्यलोक में प्रतिष्ठित होता है. इसके साथ ही यहां तदन्तर कनखल में पवित्र स्नान किया जाता है. 

ब्रह्म कपाल (उत्तराखंड):उत्तराखंड में बहती अलकनंदा नदी के किनारे ब्रह्म कपाल (कपाल मोचन) तीर्थ है, जहां पिण्ड दान किया जाता है. कहते हैं जिन पितरों को कहीं मुक्ती नहीं मिलती, उनका यहां श्राद्ध करने से मुक्ति मिल जाती है.

काशी (उत्तर प्रदेश):उत्तर प्रदेश के काशी को मोक्ष नगरी नाम से भी जाना जाता है. यहां एक पिशाच मोचन कुंड है, जहां पर त्रिपिंडी श्राद्ध करने से पितरों को प्रेत बाधा और अकाल मृत्यु से मरने के बाद अन्य तरह की व्याधियों से भी मुक्ति मिल जाती है.

प्रयागराज (उत्तर प्रदेश):उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में त्रिवेणी संगम पर गंगा नदी के तट पर श्राद्ध कर्म किया जाता है. बता दें कि श्राद्ध व पितृ तर्पण करने से बहुत अधिक पुण्य की प्राप्ति होती है.

गया (बिहार):बिहार के गया में फल्गु नदी के तट पर मुक्ति कर्म होता है. बता दें कि यहीं भगवान बुद्ध का विशाल मंदिर भी है. यहां पितृ तर्पण और श्राद्धकर्म का विशेष महत्व माना गया है.

उज्जैन (मध्यप्रदेश):मध्य प्रदेश के उज्जैन में बहती क्षिप्रा नदी को भगवान श्री हरि विष्णु के शरीर से उत्पन्न माना गया है. आपकी जानकारी के लिए बता दें कि क्षिप्रा नदी पर कई घाट व मंदिर बनें है. क्षिप्रा नदी के तट पर स्थित सिद्धवट पर श्राद्ध कर्म किया जाता है. माना जाता है कि महाकाल के इस स्थान पर श्राद्ध करने से पितृ पूर्ण तृप्त हो जाते हैं.

लोहार्गल (राजस्थान):राजस्थान का लोहार्गल सीकर के पास स्थित है. देश भर से लोग यहां अस्थि विसर्जन व श्राद्ध कर्म के लिए आते हैं. बताया जाता है कि यहां के सुरजकुंड में पांडवों ने अपने पितरों के लिए मुक्ति कार्य करवाया था. यहां तीन पर्वत से निकलने वाली सात धाराएं हैं.

पुष्कर (राजस्थान):राजस्थान के पुष्कर में भी पिण्ड दान होता है. बता दें कि यहां एक प्राचीन झील है, जिसके किनारे मुक्ति कर्म होता है.

पिंडारक (गुजरात):गुजरात के पिंडारक प्राभाष क्षेत्र में द्वारिका के पास एक तीर्थ स्थान है, जहां पितृ पिंड सरोवर है.

नासिक (महाराष्ट्र):महाराष्ट्र के नासिक में गोदावरी नदी के तट पर मुक्ति कर्म होता है. यहां बहने वाली गोदावरी नदी भारत की प्रसिद्ध सात नदियों में से एक है. यहां पितृों की संतुष्टि हेतु स्नान तर्पण कर्म होते हैं.

मेघंकर (महाराष्ट्र):महाराष्ट्र के मेघंकर में बहने वाली पैनगंगा नदी के तट पर मुक्ति कर्म किया जाता है.

लक्ष्मण बाण (कर्नाटक):कर्नाटक के लक्ष्मण बाण का नाता रामायण काल से जुड़ा हुआ है. बता दें कि लक्ष्मण मंदिर के पीछे लक्ष्मण कुंड है, जहां मुक्ति कर्म होता है. कहते हैं यहीं श्री राम ने अपने पिता का श्राद्ध किया था.


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