फैसल खान बिजनौर
इस कड़कडाती ठण्ड और कोहरे में एक दर्जन से भी अधिक गाँव के किसान अपनी जान हथेली पर रख कर खेतों पर काम करने के लिए गंगा को पार करके जाते है, २५-३० फीट गहरी गंगा को पार करके यह गन्ने जैसी जाडों की फसल को किस तरह बाजारों और मिलों तक पहुचाते है जिसे देख कर आम आदमी के रौंगटे खड़े हो जायेंगे और वो अपनी उंगंली दांतो तले दबा लेंगे ,वैसे तो यह पूरे साल इसी तरह अपने काम को अंजाम देते रहते है, जिसके चलते उन्हें अपनी और अपने जानवरों की ज़ाने तक गंवानी पड़ती है, प्रशासन इस ओर कोई ध्यान नही देता, लेकिन परिवार को पालने के लिए उन्हें अपनी जान को जोखिम में डालना ही पड़ता है !
बिजनौर के राजरामपुर गांव के खादर क्षेत्र के करीब दर्जनों गांव का हजारों हेक्टेयर जमीनी रकबा गंगा के दूसरी ओर पड़ता है, यहाँ के किसानो को गंगा के उस ओर आने जाने कि कोई वयवस्था न होने के कारण हजारो किसान रोज नाव से अपने खेतों पर काम करने जाते है, लेकिन उसके लिए उन्हें कड़ी मेहनत करनी पड़ती है,अपनी गन्ने जैसी जाड़ो की फसल को वो मिलो तक, अपनी जान को जोखिम में डाल कर पहुंचाते है, इस क्षेत्र के किसान अपनी फसलो को खेतो से ट्रैक्टर ट्रॉलियों और बुग्गियों से गंगा के किनारे तक लाते है तथा वहां से इसे नावों से लाते है, २५-३० फीट गहरी गंगा को जान जोखिम में डाल कर पार करते है, जिसे देख कर आम आदमी के रौंगटे खड़े हो जाते है और वो दांतों तले ऊँगली दबाने को मजबूर हो जायेंगे ,साथ ही दिमाग में कई सवाल उभरते है कि आख़िर ये सब करते कैसे है,ओर वो किस तरह गंगा को पार करते है जिसके चलते इन्हे हादसों का शिकार होना पड़ता है
स्थानीय किसान कलीराम ने बताया
गंगा बैराज बनने से पहले प्रशासन द्वारा गंगा के उस ओर आने जाने के लिए वैकल्पिक वयवस्था की जाती थी, बैराज बनने के पश्चात् पिछले दो दशको से यहाँ के किसान इस वयवस्था के लिए तरस रहे है, उनका कहना है कि जिस फसल को उगाने के लिए उन्हें खून पसीना एक करना पड़ता है तथा कड़ी मेहनत करनी पड़ती है, अभी कल ही एक किसान खेत से वापिस आते हुए नाव से गंगा में गिर गया है जिसकी लाश भी अभी तक नही मिल सकी है, दो रोटी के लिए ये लोग मौत का खेल खेलते हैं।
यूँ तो यह किसान १२ महीने इस जोखिम भरे काम में लगे रहते है, लेकिन कड़कडाती ठण्ड ओर भयंकर कोहरे के कारण इन्हे बहुत सी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है, जिसके चलते इस क्षेत्र के किसानो की गंगा में डूबने से मौते हो जाती है,तथा उनके जानवर भी आये दिन मौत का शिकार होते रहते है,! उनका कहना है कि कोई भी प्रशासनिक अधिकारी या कोई जनप्रतिनिधि यहाँ आकर नही देखता! लेकिन उन्हें रोटी कमाने और अपने परिवार को पालने के लिए जान को जोखिम डालना ही पड़ता है।
जब किसानो को हो रही परेशानी के बाबत अपर जिलाधिकारी से बात की गयी तो इस बारे में उनका कहना है की आपके द्वारा मामले कि जानकारी मिली है,इस जगह पर वैकल्पिक पुल की व्यवस्था की जा सकती है।