हाई कोर्ट ने राहत मांगने गए यौन शोषण के आरोपी पर ही कस दिया क़ानूनी शिकंजा, बिजनौर पुलिस को भी ज़बर्दस्त झटका
युसूफ अंसारी
बिजनौर के चर्चित यौन शोषण मामले में आरोपी का गिरफ्तारी से बचने के लिए हाई कोर्ट जाने का दांव उल्टा पड़ गया है। हाई कोर्ट ने पुलिस की जांच पूरी होने तक आरोपी की गिरफ्तारी पर रोक भले ही लगा दी है लेकिन आरोपी की याचिका पर उल्टे उसे कानून के शिकंजे में ऐसे फांस दिया है कि उसका बच निकलना मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन हो गया है।
दरअसल आरोपी ने इलाहबाद हाई कोर्ट में याचिका लगा कर अपने खिलाफ IPC की धाराओं 376, 420, 506 और 102 बी के अंतर्गत दर्ज FIR संख्या 0862/2018 को रद्द करने की मांग की थी। आरोपी ने हाई कोर्ट को बताया कि उसने अपनी पहली पत्नी से तलाक लेकर पीड़िता से दूसरी शादी कर ली है और पीड़िता उससे उसकी जायदाद में हिस्सा मांग रही है। लेकिन इन दावों की पुष्टि के लिए आरोपी कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर पाया। पीड़िता ने FIR रद्द करने का विरोध किया। हाई कोर्ट ने FIR रद्द करने सा साफ मना कर दिया और उल्टे उसे जांच में सहयोग करने के सख्त निर्देश दिए। साथ ही पुलिस को CrPc की धारा के 173 (2) के तहत जल्द से जल्द जांच पूरी करके सक्षम मजिस्ट्रेट का सामने जांच रिपोर्ट पेश करने का आदेश दे दिया।
हाई कोर्ट के इस फैसले से ऊपर से नीचे तक आरोपी की मदद कर रही बिजनौर पुलिस को भी ज़बर्दस्त झटका लगा है। इससे धारा 376 हटाकर धारा 494 का मामला बना कर इसे रफा-दफा करने के उसके मंसूबों पर पानी फिर गया है। प्रदेश के आला अधिकारियों की फटकार और इइस मामले पर उनकी लगातार पैनी नज़र की निगरानी की वजह से अब बिजनौर पुलिस आरोपी की बहुत ज़्यादा मदद नहीं कर पाएगी। इसी दबाव के चलते पुलिस को मजिस्ट्रेट के सामने 164 के तहत पीड़िता का बयान दर्ज कराना पड़ा। FIR दर्ज करने के बाद से ही पुलिस टाल मटोल कर रही थी। इसके साथ ही इस मामले में अब समझौते की संभावनाएं ख़त्म हो गई हैं।
बलात्कार और योन शोषण के मामलों में निचली आदालतों से लेकर हाई कोर्ट तक सुप्रीम कोर्ट के उस निर्देश के तहत काम करती हैं जिसमे कहा गया है कि मजिस्ट्रेट के सामने 164 के तहत दर्ज पीडिता का बयान ही आरोपी का सज़ा दिलाने के लिए काफी है। अब इस मामले में बिजनौर पुलिस पीड़िता को लगातार मिल रहे जनसमर्थ के साथ ही अपने आला अफसरों और हाई कोर्ट के दोहरे दबाव में आ गई है। ऐसे में आरोपी की मुश्किलें लगातार बढ़ेंगी। हाई कोर्ट के आदेश का उल्लंघन करके अगर उसने जांच में सहयोग नहीं किया तो गिरफ्तारी पर रोक हट सकती है। वैसे पुलिस के पास FIR दर्ज होने से लेकर चार्जशीट दाखिल करने के लिए तीन महीने का वक्त है। लेकिन हाई कोर्ट का आदेश है कि पुलिस CrPc की धारा के 173 (2) के तहत जत्द से जत्द पूरी करके सक्षम मजिस्ट्रेट के सामने पेश करे। इस लिए अब जल्द ही जांच पूरी करना पुलिस की मजबूरी बन गई है। अब वो जांच लटका नहीं सकती।
अपने यौन शोषण के खिलाफ लड़ने की पीड़िता की हिम्मत और उसका हौसला वाकई ताबिल-ए-तारीफ़ है। इस देश में कानून का राज ऐसे हिम्मती लोगों की वजह से ही है जो दबाव के आगे से झुकने से इंकार कर देते हैं। पैसे की ताक़त के आगे बिकने से इंकार कर देते हैं। इइसी हिम्त और हौसले ने आसाराम और गुरमीत को इनकी सही जगह पहुंचाया है। हर जगह देश की बेटियों पर गिद्ध दृष्टि जमाए बैठे दरिंदों को सलाखों के पीछे भेजकर इनका इलाज ऐसी ही बहादुर बेटियां करेंगी। इनकी हिम्मत और हौसला बढ़ाने के लिए हम जैसे लोगों के इनके साथ मज़बूती से खड़ा होना पड़ेगा। हर शहर, हर गांव में। तभी इस देश में हमारी मां, बहन और बेटियों को सुरक्षा की गरंटी मिलेगी।
हमें याद रखना चाहिए राजनीतिक लोगों का ताक़त हम से है। पुलिस जनता की सेवा के लिए है। उसकी जिम्मेदारी पीड़ित पक्ष को न्याय दिलाने की है आरोपी से सांठगांठ करके उसे बचाने की नहीं। अगर पुलिस अपनी ज़िम्मेदारी भूलती है या इससे बचती है तो उसे उसकी ज़िम्मेदारी का अहसास कराने के लिए हम थानों और एसपी दफ्तर से लेकर डीजीपी तक जाएंगे। महिलाओं के सम्मान के साथ कोई समझौता नहीं। हाई कोर्ट का फैसला और CrPc की धारा 173 (2) फोटो के रूप में लगा रहा हूं ताकि सनद रहे।