शाहबेरी में छह मंजिला इमारत बराबर वाली चार मंजिल इमारत पर गिरने से गौतमबुद्ध नगर के साथ साथ एनसीआर में दहशत का माहौल

नोएडा, ग्रेटर नोएडा, नोएडा वेस्ट में धड़ल्ले से अवैध निर्माण, खेतों में फ्लैट ग्रेटर नोएडा के शाहबेरी गांव मे गिरी छह मंजिला इमारत;

Update: 2018-07-19 06:09 GMT
ग्रेटर नोएडा, नोएडा वेस्ट और नोएडा एक्सटेंशन में हजारों फ्लैट तैयार हो रहे हैं, इस में से अधिकतर तो नामी बिल्डर्स के ही हैं, लेकिन जैसे ही आप किसी गांव में प्रवेश करेंगे तो अब आपको ऊंची ऊंची इमारतें नजर आएंगी यह इमारतें हैं जिन्हें या तो जमीन का मालिक या फिर कोई बिल्डर बगैर किसी मानक के बनाकर बेच देता है.

नोएडा से नोएडा एक्सटेंशन की ओर बढ़ते ही आपको दोनों तरफ कई किलोमीटर डूब क्षेत्र नजर आएगा यह वह इलाका है जो नदी के करीब होता है और जहां पर निर्माण कार्य कागज़ों में पूरी तरह से प्रतिबंधित है. लेकिन इस रेतीली मिट्टी में भी हजारों घर मकान, दुकान, फ्लैट अवैध रूप से बने नजर आ रहे हैं. जहां पर नोएडा अथॉरिटी का बड़ा सा बोर्ड लगा है जिसमें साफ लिखा है कि इस इलाके में किसी भी तरह का निर्माण प्रतिबंधित है, सेकड़ो कर्मचारियों व अधिकारियों की तैनाती अवैध निर्माण रोकने के लिए ही है ऑथरिटी में लेकिन राजनीतिक दबाव और भृष्टाचार की वजह से बेरोकटोक निर्माण कार्य जारी है।

वहीं दूसरी ओर नोएडा सेक्टर 121 के करीब व आसपास के कई गांव में ऊंची-ऊंची इमारत नजर आती हैं जो मानकों को ताक पर रखकर बनाई गई थी. यहां बिल्डिंग एक दूसरे के बिल्कुल करीब आड़ी-तिरछी बनी हुई है. कुछ निर्माणाधीन बिल्डिंग के तो पिलर भी तिरछे हैं.

दरअसल नोएडा और ग्रेटर नोएडा में महंगाई की वजह से ज्यादातर गांव में तेजी से फ्लैट कल्चर विकसित हो रहा है यही वजह है कि लोगों ने अपने खेतों में फ्लैट बना बना कर बेचना शुरू कर दिया है. इस मसले पर नोएडा और ग्रेटर नोएडा में सामाजिक कार्यो व आम जनता की छोटी बड़ी लड़ाई लड़ने वाले सक्रिय व्यक्ति कहते हैं कि सरकार चाहे बदलती रहे परंतु हर एक सरकार में सत्तारूढ़ दल के कुछ लोगो के संरक्षण के दबाव में प्राधिकरण के कुछ लोगो और पुलिस के कुछ लोगो की मिलीभगत से सरकारी जमीन से लेकर नदी के किनारे पड़ने वाली डूब क्षेत्र की जमीन तक में लोगों ने प्लॉट काट दिए हैं और वहां पर फ्लैट बनाकर आम जनता को बेचा जा रहा है. लोगों को इस बारे में जानकारी नहीं है कि जो फ्लैट वह खरीद रहे हैं, वे गैर कानूनी जमीन पर बने हैं, लेकिन सस्ता होने की वजह से अधिकतर लोग इनके चंगुल में फस जाते हैं, जीवनभर की जमापूंजी अटक जाती है, प्रतिबंधित क्षेत्र में प्लॉट, मकान या अवैध फ्लैट आसानी से रीसेल भी नहीं होते हैं, जीवनभर की कमाई डूबने की आशंका हर समय बनी रहती है, ढंग से जांच होने पर ऐसे अनगिनत प्रोजेक्ट दिख जाएंगे जो अवैध के साथ साथ शाहबेरी की जानलेवा बिल्डिंग की तरह जानलेवा भी साबित हो सकते हैं, एनसीआर में बढ़ती आबादी को छत उपलब्ध कराने के लिए ठोस नीति बनाने की जरूरत है, अधिकारियों व विभागों की जवाबदेही तय करने की जरूरत है।

हमारी टीम ने जमीनी स्तर पर जब दौरा किया तो शाहबेरी गांव में हर दूसरी बिल्डिंग 6 मंजिला है !
गौरतलब है कि ग्रेटर नोएडा के शाहबेरी गांव में बिल्डिंग गिरने से कई लोगों की मौत हो गई काफी लोग 37 घंटे बाद अभी तक भी बिल्डिंग के मलबे में दबे हुए हैं लेकिन इस गांव में जहां भी नजर डालेंगे चारों तरफ ऊंची-ऊंची 6 मंजिला इमारत आपको नजर आएंगी. जानकार बताते हैं गांव में निर्माण कार्य पर रोक है बावजूद इसके धड़ल्ले से ऊंची इमारतें बन रही हैं और फिर उन्हें फ्लैट के आधार पर बेच दिया जाता है, शाहबेरी में घटनास्थल के पास उपस्थित समाजसेवी इकलाख अबब्बसी ने यह बताया कि सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि छह मंजिला इमारत बनाने में कम से कम 15 से 18 महीने लगते हैं लेकिन अवैध प्रोजेक्ट बनाने वाले ज्यादा मिस्त्री मजदूरों को लगाकर मात्र तीन से चार महीनों में ऐसे प्रोजेक्ट पूरा कर देते हैं, किसी भी बहुमंजिला इमारत की बुनियाद पर बहुत रुपयों की लागत लगानी पड़ती है, टाई बीम, के साथ साथ भूकम्परोधी तकनीक से बुनियादी ढांचा तैयार करने में लापरवाही बरतने का काम करते हैं लालची बिल्डर, एक लेंटर को डालने के बाद कुछ समय देना चाहिए लेंटर पक्का होने देने के लिए लेकिन पैसे कमाने की अंधाधुंध भूख वाले बिल्डर नियम कायदे दरकिनार कर लगातार काम चलवाते रहते हैं, पहली बात तो साइट पर मौजूद कोई लेबर ठेकेदार सुझाव देते नही है कि यह गलत है अगर कोई देने की कोशिश भी करे तो समझदारी के सुझाव हर कोई मानता भी नहीं है, समझदार ठेकेदार मिस्त्री मजदूर वो ही है जो सही बात सही तरीके से समझाये और जनहित में बात मनवाए, काम कराने वाले बिल्डर को अनुभवी व्यक्तियों की बात सुननी समझनी चाहिए, छोटी बड़ी साइट्स पर सेफ्टी ऑफिसर होना चाहिए, निर्माण कार्य को कराने के एक दो या जरूरत अनुसार अनुभवी इंसान होने चाहिए, असली नकली सीमेंट की पहचान की समझ रखनी चाहिए।

अब सवाल उठता है, क्या सभी बिल्डिंग मानकों के अनुसार बन रही हैं ? ऐसा कतई नहीं लगता क्योंकि एक 6 मंजिला निर्माणाधीन बिल्डिंग में जब हम पहुंचे तो हमें घटिया क्वालिटी का निर्माण दिखा. इतनी ऊंची इमारत बावजूद इसके निर्माण कार्य में इस्तेमाल होने वाली सामग्री घटिया क्वालिटी की नजर आई. बिल्डिंग के बेसमेंट में जहां तहां पानी भरा था तो वहीं सरिया बेहद कमजोर क्वालिटी की थी, साइट पर इस्तेमाल हो रहा सीमेंट भी मिलावटी दिख रहा था, बदरपुर डस्ट, रोड़ी, रेत के साथ साथ कमजोर सेंटरिंग यह बताने के लिए काफी है कि लालच में छोटे छोटे प्रोजेक्ट पूरा करने में लगे छोटे बड़े बिल्डर की प्राथमिकता अंधाधुंध पैसा कमाना है सिर्फ, ब्रांड वैल्यू क्या होती है इन्हें नहीं पता, छह मंजिला इमारत को बनाने में हल्का बिल्डिंग मैटीरियल अकुशल मिस्त्री मजदूरों व बिना इंजीनियर की देखरेख में बनवाने से बिल्डर पांच छह लाख रुपये बचा सकता है लेकिन पांच छह लाख बचाने के चक्कर में अपने साथ साथ फ्लैट खरीदने वाले अनेक परिवारों की जीवनभर की जमा पूंजी डूबने का खतरा रहता है।
गुणवत्तापूर्ण सुरक्षित निर्माण कार्य, लेबर व फ्लैट खरीददार की सेफ्टी से कोई लेना देना नही है, समय समय पर कुछ पत्रकारों व राजनीतिक कार्यकर्ताओ सामाजिक व्यक्तियों ने आवाज़ उठाई है लेकिन सम्बंधित अधिकारियों के कान पर कोई जु नही रेंगी, विभागों में शक्तियों का बटवारा इस प्रकार किया हुआ है कि अगर कोई पूरे मन से प्रयास भी करे शिकायत करने का तो एक विभाग दूसरे विभाग पर टाल मटोल कर देता हैं कि यह हमारा काम नहीं है यह कार्य तो वो विभाग देखेगा, अगर कार्यवाही निर्णायक स्तर पर पहुंच भी जाये तो साम, दाम, दंड, भेद, के आधार पर आवाज़ चुप करने का काम किया जाता है, आम आदमी की पहली व आखिरी उम्मीद पुलिस ही होती है लेकिन पुलिस विभाग को अभी बहुत सारे अधिकार दिए जाने की जरूरत है, जिला प्रशासन या न्याय पालिका के अंदर भी आसान नहीं है भरष्टाचारीयो से कानूनी लड़ाई लड़ना।

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