तो ये है मायावती की असली कहानी, गरीबी से लड़कर आयरन लेडी बनने तक की सच्चाई
माया का बचपन वह था जिसका उसने कभी चीख चीख कर ढिंढोरा नही पीटा। मेहनत से देश के सबसे बड़े स्टेट की सबसे बड़ी कुर्सी पर बैठकर दिखा दिया।;
वह यूपी के मामूली से गाँव में, बेहद मामूली परिवार में पैदा हुई। बाप घर में बेटा चाहते थे,एक के बाद एक तीन लड़कियो के बाद छ लड़के पैदा हुए जिनमे वह सभी लड़को से बड़ी थी।दिल्ली के इन्द्रपुरी की झुग्गी झोपड़ी में नौ भाई बहनों मे पली बढ़ी।
उस वक़्त दिमागी सीलन,पिछड़ेपन,सामाजी तौर पर अछूत दँश को सहते हुए लड़की होना किसी गुनाह से कम नहीं था। वही लड़की को एक धुन थी की आईएएस बनकर अपने समाज को आगे बढ़ाना है।वह सब दूर करना है जो उसने झेला है। वह आईएएस नही बन सकी। बीएड के बाद साधारण टीचर रहकर लॉ में एडमिशन ले लिया ताकि अपनों के लिए लड़ पाए।वह तमाम मुश्किलो से लड़ी।हर एक गलत को जवाब दिया।
यहां तक उस दौर के वरिष्ठं नेता राजनारायण को उनकी ही सभा में उसने अपने तीखे सवालों से खामोश कर दिया।इतना सख्त विरोध किया उस मामूली सी लड़की ने की राजनारायण वापिस जाओ के नारे से हाल गूँज गया। उसी निर्माण काल में एक गुरु ने उसे गुन सिखाया। वह IAS ना बनकर सिस्टम के सिर्फ एक पेंच की जगह,पूरा सिस्टम ही बन गई। डाकघर में नौकरी करने वाले जिस बाप ने नौ बच्चों में लड़को के मुकाबले लड़कियो को नकारा, उसकी इस बेटी ने इतिहास रच दिया। संसद की चौखट पर जब उसके पसीने की बदबू से एलीट महिलाओ ने नाक पर रुमाल धर कर उसे नीचा दिखाया। तब उसने सियासत और समझ की वह खुशबू बिखेरी की एलीट क्लास ध्वस्त हो गया।
उसका उगना और छा जाना हमारे लोकतन्त्र का जादू ही था। मैं बात कर रहा हूँ मायावती की। उनके संघर्ष की।कभी ना टूटने वाली जीवटता की। सीखे वह लोग जिन्हें समाज को आगे बढ़ाना है। दो चोटी धरकर मायावती ने किसी ज़माने में पैदल और साईकिल से चलकर अगड़ो से जूझकर मिसाल रखी थी। कमज़ोर के गले की आवाज़ बनकर वह मुल्क़ में गूँजी थी।
आज फ़ख्र से हाथ हिलाती माया के पीछे वह संघर्ष है जो ज़्यादा बाहर नही आया। माया का बचपन वह था जिसका उसने कभी चीख चीख कर ढिंढोरा नही पीटा। मेहनत से देश के सबसे बड़े स्टेट की सबसे बड़ी कुर्सी पर बैठकर दिखा दिया। मैं राजनीती की जगह लीडरशिप पर बात कर रहा हूँ। लीडरशिप पैदा करना एक बड़ी कला है। बतौर लीडर मायावती के संघर्ष और विकास की दास्तान इतिहास के सुनहरे वरखों में दर्ज हो चुकी है। आगे बढ़िए। इनसे संघर्ष सीखिये। संगठन की कला सीखिये,कभी कमज़ोर होने का एहसास मत पालिए। तमाम कमियों को दरकिनार कर अच्छी चीज़ों को उतारिये। हो सकता है संघर्ष और महत्वकांछाओ के उस दौर में बहुत सी गलतियां की हों या रास्ते डिगे हों फिर भी मायावती की मेहनत और लगन को दरकिनार नही किया जा सकता।
आज मायावती का जन्मदिन है। हम चाहते हैं माया पीछे मुड़कर देखें उस वक़्त को जब काशीराम उनको दलित समाज की कमज़ोरी को दूर करने के ताबीज़ दे रहे थे और वोह बेलौस,बेधड़क उस दर्द को मिटा देने की चाहत रखती थीं। राजनीती के अवसान से पहले वोह कुछ ऐसा कर जाएँ की उनका संघर्ष ज़बानों पर आ जाए। इस वक़्त उनकी ज़रूरत हमेशा से ज़्यादा है, वक़्त के इस मोड़ को मायावती पहचान लें। जन्मदिन की खूब मुबारकबाद।