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उपेंद्र कुशवाहा जो नीतीश को भाए, लौट के बुद्धू घर को आए

रालोसपा सुप्रीमो उपेंद्र कुशवाहा आज फिर अपने पुराने घर जदयू में वापस आए।

उपेंद्र कुशवाहा जो नीतीश को भाए, लौट के बुद्धू घर को आए
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बिहार : रालोसपा सुप्रीमो उपेंद्र कुशवाहा आज फिर अपने पुराने घर जदयू में वापस आए।वो भी अकेले नहीं पूरी पार्टी का विलय तीर छाप में कर दिया। ये अलग बात है कि नीतीश को बड़े भाई कहने वाले कुशवाहा नीतीश की तीर से जी घायल होकर दो बार पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा और फिर नीतीश के तीर सही निशाने पर लगने के चलते वापस भी आए।

बिहार की राजनीति में कुश का पर्याय बनने की लगातार कोशिश करने वाले कुशवाहा की राजनीति बिहार और देश की कम नीतीश के इर्द गिर्द ही घूमती रही है।यही वजह है की उपेंद्र ने जो भी कुछ राजनीति में पाया है वह नीतीश की बदौलत चाहे नीतीश के आशीर्वाद से या नीतीश के विरोध से।नीतीश से इतर कुशवाहा की राजनीति शून्य के बराबर रही है।

कुशवाहा के राजनीतिक सफर की बात करे तो उन्होंने केवल दो बार यानी एक बार विधान सभा और एक बार लोकसभा का चुनाव जीता है।लेकिन 2000 में विधान सभा में पहली बार जीतकर आने वाले उपेंद्र को नीतीश ने बीजेपी और अपने दलीय नेताओं के विरोध और वरीयता को ताक पर रखकर उन्हें विधान सभा में विरोधी दल का नेता बनाया था।यानी इससे बढ़कर बिहार की राजनीति में जहा जाति यहां के डीएनए में हो उपलब्धि नहीं हो सकती।ठीक उसी तरह पहली बार लोक सभा का चुनाव नीतीश का विरोध कर जीतने वाले कुशवाहा केंद्र में।मंत्री बने।यानी समर्थन और विरोध के केंद्र में नीतीश जी रहे।

लेकिन इसके साथ ही जब कुशवाहा राजनीति के उफान पर होते है तो चुनाव ही नहीं हारते पार्टी को भी छोड़ देते है यानी उनकी राजनीति की ऐसी की तैसी हो जाती है।2005 2014और 15 का चुनाव सामने है।2004 मेविधान सभा में विरोधी दल के नेता रहे कुशवाहा 2005 के दोनो चुनाव हार जाते है।नीतीश कैबिनेट मे बड़ा ओहदा पाने का सपना देखने वाले कुशवाहा को पद कौन कहे पार्टी छोड़ना पड़ता है।फिर एनसीपी के रास्ते 2009 में उनकी वापसी जदयू में होती है।2010 में नीतीश उन्हे राज्यसभा भी भेजते है लेकिन फिर 2011 में नीतीश से पंगा लेने के चलते उन्हें पार्टी छोड़नी पड़ती है।3 मार्च 2013 को उपेंद्र फिर नीतीश के विरोध में नई पार्टी बनाते है।2014 के लोकसभा चुनाव में नीतीश के बीजेपी से अलग होने का लाभ कुशवाहा उठाते है फिर उनकी जय जय होती है।लेकिन केंद्र में मंत्री बनने के बाद भी उपेंद्र नीतीश के विरोध में ही 5 साल लगे रहे।परिणाम सामने है उपेंद्र बेरोजगार तो खुद हुए ही पार्टी का भी नाश हो गया।कुछ लोक सभा चुनाव में रही सही कसर विधान सभा चुनाव में।यानी उनके दल के टुकड़े

हजार हुए कुछ यहां गिरे कुछ वहा गिरे। अब कुशवाहा के सामने नीतीश का दामन और लव कुश की राजनीति के अलावा कुछ बचा भी नही है।यही मजबूरी नीतीश के साथ भी है।यानी लवकुश के बीच जंग का खमियाजा नीतीश भी भोग चुके है।भले ही नीतीश सत्ता में है लेकिन राजनीति में उनकी भी हैसियत बेहतर नहीं रह गई है ऐसे में नीतीश ने लव कुश की गांठ को एक बार फिर मजबूत करने की कोशिश की है।राजनीति में दो कमज़ोर समीकरण मिलकर एक बड़ी राजनीतिक हैसियत वन सकती है।बिहार की राजनीति इसका उदाहरण है।ऐसे में कुशवाहा की जदयू में वापसी नीतीश और उपेंद्र की बेबसी ही सही लेकिन इसका राजनीतिक संदेश बड़ा है।ऐसे भी समाज वादियों के बारे में कहा जाता है की वो जब सत्ता में होते है तो टूटते है और जब बेरोजगार होते है तो जुटते है।देखिए आगे आगे होता है क्या फिलहाल बुद्धू लौट के घर आ गए है।

Shiv Kumar Mishra
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