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Starving the Beast स्टार्विंग द बीस्ट: जंगली जानवर को भूखा मार दो

Starving the Beast स्टार्विंग द बीस्ट: जंगली जानवर को भूखा मार दो
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मुशर्रफ़ अली

मुक्तबाज़ार की अर्थव्यवस्था के समर्थक, सरकार को बीस्ट यानि जंगली जानवर मानते हैं। उनका विश्वास है कि जो सरकार आर्थिक गतिविधियों में हस्तक्षेप करती है या उनमें खुद शामिल रहती है वह जंगली जानवर के समान होती है जिसे नियंत्रण करने के लिए उसे भूखा मारना ज़रुरी है। जिस तरह जंगली जानवर का भोजन चारा या मांस होता है उसी तरह सरकार का भोजन उसको प्राप्त होने वाले कर और उसकी आमदनी होती है। अगर कर घटा दिए जाएं या सरकारी उद्योग और व्यापार का निजीकरण कर दिया जाए तो सरकार के पास पैसे की कमी पड़ जाएगी और तब वह फ़िज़ूलखर्ची नही कर पाएगी। मुक्तबाज़ारवादियों का मानना है कि सरकार तरह-तरह की कल्याणकारी योजनाओं और सब्सिडी के माध्यम से पैसे को बर्बाद करती है और इस तरह जनता में मुफ़्तख़ोरी की आदत डालती है। अगर इस पैसे को पंूजीपतियों को देदिया जाए तो वह इसे अपने उद्योग-व्यापार में लगाकर इससे रोज़गार पैदा करेंगे और इस तरह यह पैसा जनता के काम आएगा। यह मुक्तबाज़ारवादी, पंूजीपतियों के कल्याण या उनको दी जाने वाली सब्सिडी, कर छूट तथा अन्य रियायतों को सरकार की फ़िज़ूलखर्ची नही मानते, वह केवल आम जनता को दी जाने वाली सरकारी सहायता, सब्सिडी को गलत और फ़िज़ूलख़र्ची मानते हैं। 'स्टार्विंग द बीस्ट' यानि जंगली जानवर को भूखा मार दो मुक्तबाज़ारवादियों का आर्थिक दर्शन है और इस वाक्यांश का इतिहास है। अमरीका के लेखक चाल्र्स एडवर्ड बर्ने ने 1907 में वाशिंगटन पोस्ट में छपे अपने लेख में पहली बार इस वाक्यांश का प्रयोग किया था।

वह अपने लेख में एक घटना का ज़िक्र करते हैं जिसमें एक रेड-इन्डियन किसी जंगल में एक गड्ढा बनाकर उसपर जाल लगाकर एक शेर को फांस लेता है। वह गड्ढे में एक पिंजरा उतारता है और कोशिश करता है कि शेर उस पिंजरे में दाखि़ल हो जाए लेकिन क्रोधित शेर काबू में नही आता, तब वह व्यक्ति उस पिंजरे में थोड़ा सा भोजन रखता है और शेर को रोज़ाना दिया जाने वाला भोजन बंद कर देता है। भोजन न मिलने से धीरे-धीरे शेर की आक्रमकता कम होती जाती है और एक दिन वह भूख से निढाल होकर पिंजरे मे जा बैठता है। इस तरह जंगली जानवर को भूखा मारने से वह अपने शिकारी के नियंत्रण में आ जाता है। उसके बाद से मुक्तबाज़ारवादी इस वाक्यांश का इस्तेमाल कारपोरेट के करों को समाप्त या काफ़ी कम और शिक्षा, चिकित्सा और सामाजिक सुरक्षा के सरकारी बजट में कटौती करने के संदर्भ में करते हैं। इस वाक्यांश का दूसरी बार प्रयोग 1985 में अमरीकी अख़बार 'वाल स्ट्रीट जनरल' में छपे एक लेख में अमरीकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के एक अनाम कर्मचारी के हवाले से किया गया।

भारत में इस नीति को 1991 से व्यवहार में लाया जा रहा है। असल में कांग्रेस के अन्दर और उसके बाहर का दक्षिण पंथ आज़ादी के बाद से ही इस कोशिश में लगा था कि वह सत्ता में पूर्ण बहुमत में आ जाए ताकि वह मुक्तबाज़ार की आर्थिक नीति को अमल में ला सके। पहली बार उसने 1959 में स्वतंत्र पार्टी बनाकर चुनाव के द्वारा आने की कोशिश की भी लेकिन बहुमत न मिलने के कारण वह सफ़ल नही हो पाया। इसके बाद आपात्तकाल के बाद उसको सत्ता हासिल हुई और तब मुक्तबाज़ार की आर्थिक नीतियों को श्री मुरारजी देसाई ने लागू करने की कोशिश की। इसके लिए उन्होनें पंचवर्षीय योजना को बंद कर दिया लेकिन अर्थव्यवस्था में सरकारी हस्तक्षेप की पक्षधर श्रीमति इन्दिरा गाँधी दोबारा सत्ता में वापस आ गई और उन्होने पंचवर्षीय योजना को फिरसे शुरु कर दिया। इसके बाद मुक्तबाज़ारवादियों को अपनी नीतियों को लागू करने का मौका इन्दिरा गाँधी व राजीव गाँधी की हत्या के बाद ही मिला। यह 1991 का वर्ष था और तबसे भारत में पुरानी अर्थव्यवस्था को उखाड़कर उसके स्थान पर मुक्तबाज़ार की अर्थव्यवस्था को स्थापित करने का प्रयोग चल रहा है। इस अर्थव्यवस्था का आवश्यक अंग 'स्टार्विंग द बीस्ट' यानि सरकार नामक जंगली जानवर को भूखा मारना है।

जनता के खिलाफ़ और निजी उद्योगपतियों के पक्ष में स्थापित की जा रही इस नीति को इतनी धीरे-धीरे और चालाकी से लाया जा रहा है कि लोगों को पता ही नही चला कि भारत एक व्यवस्था से निकल कर कब दूसरी व्यवस्था में प्रवेश कर गया है ? कब उनको मिलने वाली सरकारी सहायता में कटौती करके उससे हासिल पंूजी को पंूजीपतियों की ओर स्थानांतरित कर दिया गया है ? जैसे आप मेंडक को एकदम गर्म पानी में डाल देंगे तो वह उस पानी से छलांग लगा देगा लेकिन अगर मेंडक को ठण्डे पानी में डालकर धीरे-धीरे उस पानी का तापमान बढ़ाते रहें तो मेंडक को पता भी नही चलेगा और वह उसमें उबलकर मर जाएगा। बिल्कुल ऐसा ही भारत में किया जा रहा है। सरकार को जंगली जानवर समझकर किस तरह भूखा मारा जा रहा है यह कोई छिपी हुई कार्यवाही नही है। जब 1993 में लोगों का ध्यान, बाबरी-मस्जिद रामजन्म भूमि के साम्प्रदायिक दंगों में लगा हुआ था तब मुक्त बाज़ारवादी अपना काम कर रहे थे। इसी वर्ष में कोयले की खानों की लूट शुरु हुई और उन्हें निजी क्षेत्र को आवंन्टित कर दिया गया। कोल इन्डिया की सम्पत्ति जिसे निकालने बेचने का अधिकार उसके पास था वह अधिकार उससे छीन लिया गया और इस तरह सरकार की आय में कटौती कर दी गई। तभी सरकारी अल्मूनियम कारखाना बाल्को, माडर्न फ़ूड इन्डस्ट्रीज़ लि0, सीएमसी लि0, हिन्दुस्तान ज़िंक लि0, होटल कारपोरेशन के तीन होटल, एचटीएल लि0, आईबीपी कम्पनी लि0, इन्डिया टूरिज्म डेवलपमेंट कार्पोरेशन के 18 होटल, इन्डियन पेट्रोकेमिकल कार्पोरेशन लि0, जेस्सप एण्ड कम्पनी लि0, लगान जूट मशीनरी कम्पनी लि0, मारुती-सुजूकी इन्डिया लि0, पारादीप फ़ास्फेट लि0 आदि निजी क्षेत्र को बेच दिए गए। सन 1991-92 से 2017-18 तक सरकारी कारखानों में जनता की हिस्सेदारी कुल 3 लाख 47 हज़ार 439 हज़ार करोड़ रुपए के एवज में निजी क्षेत्र को बेच दी गई। इस तरह सरकार की आमदनी में बड़ी कटौती कर दी गई। सरकार की आमदनी का बड़ा स्त्रोत सीमा शुल्क होता है। 1991 से पहले सीमा शुल्क की सर्वोच्च दर 355 प्रतिशत तक थी जो अब औसत 10 प्रतिशत पर पंहुचा दी गई है। इसी तरह आयकर की दर कभी 97 प्रतिशत तक थी लेकिन अब उच्चतम दर 30 प्रतिशत कर दी गई है। इसका मतलब है कि अब टाटा-बिरला-अम्बानी को भी अधिकतम 30 प्रतिशत आयकर भरना है। सीमा शुल्क और आयकर में की गई कटौती से सरकार की आमदनी में भारी कमी हुई है।

1997-98 में सरकार ने पहली बार तेल और गैस निकालने के लिए निजी क्षेत्र को ठेका देने के लिए ''न्यू एक्सप्लोरेशन एण्ड लाईसेन्सिंग पाॅलिसी'' बनाई जिसमें कहा गया कि सरकारी और निजी क्षेत्र को तेल और गैस निकालने के क्षेत्र में बराबर का अवसर दिया जाएगा और इसके बाद से ही केजी बेसिन में रिलाईंस को गैस ब्लाॅक डी सिक्स यानि धीरुभाई अम्बानी सिक्स ब्लाक आवन्टित कर दिया गया। आवंटन के बाद रिलाईंस इस ब्लाॅक पर कब्ज़ा करके बैठ गया। इस एक ब्लाॅक ने रिलाईंस पर पंूजी की वर्षा कर दी और इससे सरकार की आय में भारी कटौती हो गई। विदेश में की जाने वाली टेलीफ़ोन काल से बीएसएनएस को काफ़ी आमदनी होती थी सरकार ने आमदनी के इस क्षेत्र यानि विदेश संचार निगम को टाटा के हवाले कर दिया और अपनी आमदनी समाप्त कर दी। जो काम सरकारी कर्मचारी करते थे और जिससे नौकरी के स्थाई पदों में लगातार बढ़ौत्तरी होती रहती थी उस व्यवस्था को समाप्त करने के लिए पब्लिक प्राईवेट पार्टनरशिप की नीति को लाया गया। इस तरह सरकारी कर्मचारियों का काम निजी क्षेत्र के पास चला गया। बैंक जानबूझकर साज़िश के तहत घाटे में लाए गए और उनकी हिस्सेदारी बेची जाने लगी। निजी और विदेशी बैंकों और बीमा कम्पनियों को व्यापार की इजाजत देकर सरकार के वित्तीय कारोबार पर हमला किया गया और एनपीए के माध्यम से उनको घाटे में पंहुचा दिया गया। रेल को की जाने वाली डीज़ल की आपूर्ति सरकारी कम्पनी से छीनकर मुकेश अम्बानी को दे दी गई। निजी बीमा कम्पनियों को व्यापार दिलाने के लिए रेलवे में यात्री बीमें की शुरुआत की गई और प्रत्येक आरक्षित टिकट पर 92 पैसे बीमे के काटे जाने लगे। रेलवे में एक साल में 900 करोड़ लोग यात्रा करते हैं उनसे टिकट पर बीमे की किस्त काटकर निजी बीमा कम्पनियों को दिया जाने लगा। जिन तीन कम्पनियों को रेल यात्री बीमें का काम सौंपा गया है वह सभी निजी क्षेत्र की कम्पनिया है। सरकारी क्षेत्र की बीमा कम्पनी को जानबूझकर यात्री बीमे से अलग रखा गया है ताकि सरकार को भूखा मारा जा सके। महाराष्ट्र की भाजपा सरकार ने सरकारी कम्पनी जीवन बीमा निगम से छीनकर अपने कर्मचारियों के बीमें की ज़िम्मेदारी रिलाईंस इन्श्योरेंस को सौंप दी। यह तो अभी की घटना है कि युद्धक विमान राफ़ेल को बनाने का ठेका सरकारी कम्पनी से छीनकर रिलाईंस डिफेंस को दे दिया गया है और सरकारी विश्वविद्यालयों को अपने खर्च का खुद इन्तिज़ाम करने का निर्देश देने वाली मोदी सरकार ने 1000 करोड़ रुपए का आवंटन भविष्य में बनने वाली अम्बानी की यूनीवर्सिटी को कर दिया है।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने अबतक जितनी भी विदेश यात्राएं की है उनमें अपने साथ निजी उद्योगपतियों और व्यापारियों को ले जाया गया है और इस तरह सरकारी खर्च पर उनको विदेश में कारोबार दिलाने की कोशिश की गई है। अगर किसी सरकारी कम्पनी को साथ ले जाया भी गया है तो वह मजबूरी में ले जाया गया है। पिछले दिनों दिल्ली में आर्डीनेन्स फ़ेक्ट्री में कार्यरत तीन मज़दूर संगठनों ने प्रदर्शन किया था। उनके नेताओं का कहना है कि सरकार आयुद्ध कारखानों को बंद करके रक्षा का सारा काम निजी क्षेत्र के हवाले करना चाहती है। सरकार के इस एक कदम से आर्डीनेंस फ़ेक्ट्रीयों के जहां 30 हज़ार कर्मचारी बेकार हो जाएंगे वहीं निजी क्षेत्र को देने से देश की सुरक्षा भी खतरे में पड़ जाएगी।

सरकार देश के महामार्गो को पहले ही निजी क्षेत्र को सौंप चुकी है जहां से टोल वसूली के नाम पर उनपर दौलत की बारिश हो रही है। सरकार के इस एक काम से निजी क्षेत्र को मुफ़्त में हज़ारों किलामीटर लम्बे मार्ग मिल गए। उनके निर्माण पर उन्होनें सारा पैसा बैंकों से उधार लेकर लगाया और अब उन सड़कों के मालिक बन बैठे हैं। अगर यही काम सरकार करती तो सरकारी आमदनी में वृद्धि होती जो जनता के काम आती दूसरे जनता को देना भी पड़ता तो रियायती टोल टैक्स देना पड़ता।

इस बार स्वास्थ्य क्षेत्र में निजी बीमा कम्पनियों को उतारा गया है जो मात्र दो हज़ार करोड़ रुपए में 10 करोड़ परिवारों को प्रति परिवार 5 लाख रुपए की चिकित्सा सुविधा उपलब्ध करायेंगी। बीमा कम्पनी अस्पताल नही खोलती है और न ही उसके लिए चिकित्सा कर्मियों की भर्ती करती हैं वह सारा काम पहले से मौजूद निजी अस्पतालों को दे देती हैं। सरकार के इस एक कदम से स्वास्थ्य बजट में भारी कटौती हो गई है जबकि निजी बीमा कम्पनियों की इससे लाटरी खुल गई है। कुल मिलाकर इन मुक्तबाज़ारवादियों के कारण जनता भारी मुसीबत में फंस गई है।

Shiv Kumar Mishra
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