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#Durgapuja मैं, बचपन और 20 रुपये वाली दुर्गा मेला, बचपन की यादों का खजाना

अलोक सिंह वरिष्ठ पत्रकार
ऑफिस में खबरों के बीच उलझा हूं। काम पूरा करने के लिए अंगुलियां कीबोर्ड पर सरपट दौड़ रही हैं। लेकिन आज मन को संभालना मुश्किल हो रहा है क्योंकि आज महा अष्टमी जो है। यह वह दिन है जिसका इंतजार हम बचपन में एक महीने पहले ही करने लगते थे क्योंकि अष्टमी, नवमी और विजय दशमी लगतार तीन दिन नॉनस्टॉप मेला देखने का सिलसिला जो शुरू होता था। वह मेला जहां हम 20 रुपये में ही अपने को सबसे अमीर और पुरी दुनिया खरीदने का जज्बा रखते थे। वैसे इतनी छोटी रकम जुटाने में भी हमें महीनों लग जाते थे। और हां, हमारे लिए दुर्गा पूजा नहीं बल्कि दर्गा मेला होता था क्योंकि हम पूजा नहीं बल्कि मेला घूमते थे।
आज जेहन में फिर मेला देखने की यादें ताजा हो गई है। कैसे हम झुंड बनाकर अपने गांव के सुपना चौक पर दुर्गा मेला देखने जाते थे। उस मेले में बड़े-बड़े झुले नहीं होते थे न ही भव्य पंडाल। लेकिन, दुर्गा मां की भव्य मूर्ति के पास बताशे और मूरी की दुकान, उसके बगल में गरम-गरम जलेबी-समोसा और गुलाब जामुन से पटे दुकान ही सबसे बड़ा आकर्षण का केंद्र होता था। मिठाई की खुशबू से पूरा मेला परिसर महका था। हमारे गांव के मेले में बड़े-बड़े खिलौने भी नहीं मिलते थे। हमारे लिए तो मिट्टी का हाथी, घोड़ा, राजा, रानी ही सबसे बडा खिलौना होता था। रंग-बिरेंगे फुलौना को एक से दो रुपये में खरीद कर ही हम खुश हो जाते थे।
पापा ने जलेबी खिला दी और घर लाने के लिए मीठाई पैक भी करवा दी इससे अधिक हमें कुछ चाहिए ही नहीं होता था। एक रुपये में मिलने वाला सीटी (पीपही) और उससे निकलने वाला किस्म-किस्म का आवाज हमें सबसे बड़ी खुशी देता था जो आज बड़ा से बड़ा गजट नहीं दे पाता है। हमारा वह मेला शायद इसलिए भी सबसे अलग और दिलचस्प था कि उसमें भाई-बहन की टोली से लेकर चाचा, पापा, मां, चाची, दोस्त, औैर आस-परोस के सभी शामिल होते थे। सब के साथ अलग-अलग झुंड में मेला देखने औैर कचरी-पयजुआ से लेकर जलेबी खाने का मजा ही कुछ और था।
हमारे चौक पर लगने वाले मेले का दायरा भी बड़ा नहीं होता था लेकिन फिर भी छोड़ कर लौट आने का मन नहीं करता था। न जाने क्या था। दिन से रात तक मेला देखने और घूमने के बाद भी मन नहीं भरता था। मेला देखने के दौरान ही पता कर लेना कि कहां नाच और नौटंकी की व्यवस्था है जानकारी मिलते पहुंच लेना। मेले में लगने वाली नौटंकी, तेज आवाज में बजने वाले लाउड स्पीकर, दुकानों की बहुत तेज रोशनी और मीना बाजार में 10 रुपय में मिलने वाला हरके माल खरीदने का अपना ही मजा था। उस दौड़ में हर वो चीजन जाने क्यों उतनी खुशी देती थी जो अब गायब हो गई है।
गांव के मेले का जिक्र करूं और फाइटर चचा उर्फ मुकेश चचा का जिक्र न हो तो नाइंसाफी होगी। उनका भी किस्सा बड़ा दिलचस्प है। शरीर में करेंट समान फूर्ति और हमारे चौक पर लगने वाले मेला का सुचारू प्रंबंधन और मुख्य रूप से मिना बजार को संभालने में इनको महारत हासिल थी। मीना बाजार को किसी भी मेले में संभालने का बड़ा ही टफ टास्क होता था क्योंकि उसमें लड़कियां और महिलाएं खरीदारी करती थीं। वहीं कुछ उच्चके लड़के में उसमें घुस जाते हैं। हमारे मुकेश चचा एक सेकेंड में उसको बाहार निकालते। ऐसे कई वाक्या हुए जब चाचा ने कईयों को दिन में ही तारे दिखा दिए। खैर जो भी होता था वो बड़ा ही दिलचस्प होता था।
मेले से जब हम लौट आते औैर सुबह जल्दी उठकर अपने खरीदे मिट्टी के खिलौने और कुछ फुलौने से हवा निकल चके को देखते तो यह अजीब सी खुशी होती थी। अफसोस की मेले का चलन अब गांव औैर कस्बों में भी खत्म होने की ओर है। मॉल और डिज्नीलैंड, वाटरपार्क जैसे में दिलचस्पी बढ़ी है। दिल्ली-एनसीआर में भी मां दुर्गा का भव्य पंडाल लगा है। पॉकेट में पैसे भी हैं लेकिन न जाने क्यों ये सब कुछ फीका है। आज यह सबकुछ छोड़कर भाग जाने का मन कर रहा है। खैर, आप सभी को हैप्पी दुर्गा अष्टमी। मां आप सभी पर कृपा बनाएं रखें।




