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मुद्दे पर आइए... ताकि इंसान बन सकें आप !

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- कोरोना के आने के बाद से ही दुनिया लड़ रही पृथ्वी पर इंसान के सरवाइवल की लड़ाई

- जबकि भारत में लोग अभी भी धर्म, जाति जैसे सवालों में ही हैं उलझे

- इंसान के अस्तित्व पर आए ऐसे संकट के वक्त भी अगर हमने इस लड़ाई की गंभीरता को नहीं समझा तो हो जाएगा भारी नुकसान

जीवन और देश के लिए सबसे जरूरी और वास्तविक मुद्दों पर कम, धर्म/जाति/प्रान्त/भाषा के गैर जरूरी मुद्दों पर ज्यादा जोर देने वाले लोग अभी भी एक ऐसी काल्पनिक दुनिया में ही जी रहे हैं, जहां कोरोना कोई खतरनाक समस्या या तो है नहीं...और अगर है तो उसका इलाज उनके मोदी जी/ योगी जी/ सोनिया/ राहुल जैसे नेता के पास मौजूद है। इसलिए शायद उन्हें अभी भी अपने या देश के वर्तमान और भविष्य, किसी की चिंता नहीं है।

वैसे भी, चिंता तो केवल दो ही श्रेणी के लोगों को नहीं होती। एक वे, जो अत्यन्त दार्शनिक स्वभाव के होते हैं और होइये सोई जो राम रची राखा टाइप बुद्धिमानी भरी बातें करके वर्तमान में ही जीते हैं... और दूसरे वे, जो इसलिए चिंता नहीं करते क्योंकि दुनिया के लाख आगाह करने या समझाने पर भी उनमें इतनी समझ नहीं होती कि वे वर्तमान या भविष्य के हालात को समझ सकें। ऐसे लोग वही समझ पाते हैं, जो उन्हें कोई और समझदार इंसान समझा ले जाता है।

पत्रकारिता में मेरे एक सीनियर जीतेन्द्र कुमार जी अक्सर हमसे बातचीत के दौरान हिंदी के एक बेहद मशहूर साहित्यकार राजेन्द्र यादव जी के एक अनुवाद को दोहराया करते थे कि "चूतिये धंसे पड़ते हैं वहां, फरिश्तों की भी फटती है जहां..." यह अद्भुत अनुवाद राजेन्द्र जी ने एक अंग्रेजी कहावत 'फूल्स रश इन व्हेयर एन्जिल्स फियर टु ट्रेड' का किया था...

अब देखिए, जिस कोरोना के आने से अमेरिका, यूरोप, चीन जैसे वे देश और उनके नेता त्राहि माम् कर रहे हैं, जो आज आधुनिक विज्ञान, सैन्य ताकत, हेल्थकेयर सिस्टम, उन्नत समाज, अत्याधुनिक उपकरण, ईमानदार व अभेद्य राजनीतिक/ प्रशासनिक सिस्टम, व्यापार और अर्थव्यवस्था के मामले में न सिर्फ दुनिया के अग्रणी देश हैं बल्कि यूं कह लीजिए कि यह सब कुछ उन्हीं की देन ही है। लेकिन कोरोना को लेकर उनकी भी हालत इस कदर खस्ता और पतली हो चुकी है कि जहां एक तरफ वे कोरोना की वैक्सीन खोजने को जीवन मरण का प्रश्न बनाये हुए हैं, वहीं दूसरी तरफ वे इस बात के लिए भी खुद को तैयार कर रहे हैं कि अगर वैक्सीन न मिली तो कम से कम मौतों का लक्ष्य कैसे प्राप्त किया जा सकता है।

जबकि यहां कोरोना आने के बाद से जनता, वह भी खास तौर पर मोदी / राहुल समर्थक लोग इसे किसी आम घटना की तरह मानकर अभी भी अपने नेता की भक्ति और उन्हीं मुद्दों में उलझे हैं, जिनका इस संकट से कोई लेना देना ही नहीं है। फिलहाल जहां दुनिया सिर्फ और सिर्फ कोरोना और उससे बचाव या कोरोना के साथ साथ जीवन को आगे बढ़ाते हुए कम से कम नुकसान पर माथापच्ची कर रही है, यहाँ लोग हिन्दू-मुसलमान, पाकिस्तान, धर्म, जाति आदि मुद्दों पर बदस्तूर अपने नेता यानी मोदी जी / राहुल गांधी का समर्थन/विरोध करने और एक दूसरे को गालियां बकने में लगे हुए हैं।

जाहिर है, वर्तमान और भविष्य की चिंता उन्हें तब भी नहीं हो रही, जबकि वे देख रहे हैं कि किस तरह बाकी दुनिया कोरोना को लेकर जीवन मरण के क्षण की तरह केवल कोरोना पर ही ध्यान केंद्रित करके चिंतित है। दुनिया के ताकतवर देश भी खौफजदा हैं कि आखिर कैसे वे कोरोना से हो रही मौतों के बीच अपना जीवन आगे बढ़ाएंगे?

नहीं बढ़ाएंगे तो देश की अर्थव्यवस्था इस कदर तबाह हो जाएगी कि बड़ी तादाद में लोग भूख से मर जायेंगे, अराजकता और लूटपाट मच जाएगी। अगर कोरोना को इग्नोर करके जीवन को आगे बढ़ाएंगे तो न जाने कितने लाख/करोड़ लोग मारे जाएंगे, जिससे कमोबेश उसी तरह की अराजकता और लूटमार की स्थिति बन जाएगी, जो कोरोना से डर कर बैठने पर बननी तय है।

यानी भविष्य में दोनों तरफ दुनिया को सिर्फ तबाही, मौत, अराजकता ही नजर आ रही है इसलिए वे खौफजदा हैं... जबकि हमारे देश को देखिए। यहां लोगों को अपनी हर समस्या का हल मोदी जी, योगी जी, अमित शाह, डोभाल आदि के पास दिखाई दे रहा है। उन्हें लगता है कि इन नेताओं के पास कोई अलादीन का चिराग है या जादुई शक्तियां हैं, जिसके बल पर ये देश और जनता को किसी न किसी तरह से उस कोरोना से भी बचा ले जाएंगे, जिससे दुनिया के दिग्गज नेता ट्रम्प या पुतिन भी दुनियाभर की ताकत और पैसा रखकर भी अपनी जनता को नहीं बचा पा रहे हैं।

अमेरिका और यूरोप की तरह बहुत जल्दी यहां के लोगों को भी यह अंदाजा लग ही जाना है कि भारत में जैसे- जैसे कोरोना बढ़ कर बाकी देशों की तरह विकराल हो जाएगा, उनके ये चमत्कारी नेता या दिव्य पुरुष किसी लाचार इंसान की तरह लोगों को मरते हुए देखने के अलावा कुछ खास नहीं कर सकेंगे। अगर कर सकते होते तो आज नहीं कर लेते, जब एक लाख से भी कम लोगों में कोरोना होने की पुष्टि होने के इस शुरुआती दौर में न जाने कितने लोग कोरोना या पलायन, भूख, अन्य बीमारियों का इलाज न मिलने या बदइंतजामी/ गलत फैसलों के अन्य कारणों से रोज ही मर रहे हैं। अमेरिका जैसे देश, जहां लाखों लोग कोरोना से संक्रमित हो चुके हैं, अब हमारा देश भी हर रोज बढ़ते संक्रमणों के कारण उन्हीं देशों जैसी दुर्गति की तरफ बढ़ रहा है।

लॉक डाउन का मोदी का ब्रह्मास्त्र कोरोना को बढ़ने से रोकने में पूरी तरह से नाकाम हो चुका है। कोई और अस्त्र अब मोदी, शाह, योगी, डोभाल आदि के पास है नहीं। यह कोई हिन्दू, मुसलमान, कश्मीर, पाकिस्तान जैसा मुद्दा नहीं है, जिसे आईटी सेल, मीडिया, आकर्षक भाषण शैली, धुँवाधार चुनाव प्रचार और भक्तों की फौज मिलकर मोदी, योगी, शाह और डोभाल को सुपरहीरो या दिव्य पुरुष बना देगा। यह तो इंसान का सीधे सीधे प्रकृति से आमना सामना है... पृथ्वी पर जीवन यानी सरवाइवल की लड़ाई है। इस लड़ाई को वही सही से लड़ पायेगा, जो खुद को और बाकी दुनिया को बिना किसी भेदभाव और नफरत/ अलगाव के बिना एक जैसा इंसान मानेगा... और धरती पर अब इंसानों का सुपरहीरो भी वही होगा, जो सभी इंसानों यानी इंसान के अस्तित्व को बचाने की लड़ाई सबको साथ लेकर लड़ेगा..

अश्वनी कुमार श्रीवास्त�
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