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मुस्लिम समाज में महिलाओं का शोषण : शारिक रब्बानी

आवश्यकता इस बात की है, कि मुस्लिम समाज में प्रगतिशील और व्यवहारिक दृष्टिकोण का प्रचार-प्रसार हो। मुस्लिम समाज में सम्पत्ति के अधिकार की जगह महिलाओं को बेहतर और उच्च शिक्षा, कठोर पर्दा-प्रथा से छूट और उनको समाज में वास्तविक समानता पर अधिक बल दिया जाये

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मुस्लिम समाज में महिलाओं के शोषण का मुख्य कारण शिक्षा का अभाव कठोर, पर्दा-प्रथा, बाल-विवाह, अनुचित तलाक ,हलाला और मुताह जैसी शर्मनाक और असामाजिक कु- प्रथाएं हैं। जिससे मुस्लिम महिलाएं अपनी समस्याओं को पितृसत्तात्मक दबाव अथवा समाज में बदनामी के कारण खुलकर परिवार या समाज के सामने प्रस्तुत नहीं कर पाती हैं। तथा शौषण का शिकार होती रहती है।

जबकि इस्लाम धर्म में शिक्षा और महिलाओं के साथ अच्छे व्यवहार पर जोर भी दिया गया है।

उदाहरण स्वरूप

1. मुहम्मद साहब ने फरमाया - हर मुसलमान मर्द और औरत पर इल्म हासिल करना फर्ज है।

2. तुममे से श्रेष्ठ इंसान वह है जो अपनी पत्नी के लिए सबसे अच्छा है। इससे सपष्ट है कि मुस्लिम समाज में शिक्षा का अभाव और प्रचलित विभिन्न कु-प्रथाएं, कट्टरपंथी मौलवी हजरत और रूढ़िवादी मुस्लिम धर्मावलम्बियो की देन है जिसे उन्होंने यह मुस्लिम समाज में लागू कर रखा है।

और इन्हीं सब कारणों से मुस्लिम महिलाओं का शोषण होता रहता है तथा समाज की बदनामी भी। रूढ़िवादी परिवार में रह रही मुस्लिम महिलाएं बेबस, सहमी, डरी-डरी सी अपनी समस्याओं को परिवार और समाज के सामने उजागर नहीं कर पाती हैं।

आज जबकि विश्व मे स्त्री-विमर्श पर अधिक चर्चा हो रही है महिलाओं की आजादी उनके बराबरी के हक तथा महिलाओं पर होने वाले अत्याचार, बलात्कार, घरेलू हिंसा आदि पर अनेक महिला और पुरूष मानवतावादी साहित्यिकारो और समाजसेवियों ने महिलाओं के पक्ष में आवाज उठाई है तथा पूरी दुनिया में मुस्लिम स्त्रियों का रूझान स्त्री मुक्ति आंदोलन की ओर बढ़ रहा है तथा अनेक मुस्लिम महिलाएं भी अपनी आजादी व मौलिक अधिकारो की रक्षा के लिये प्रयासरत हैं और विभिन्न समाज की महिलाओं के साथ मिलकर काम कर रही हैं।

आवश्यकता इस बात की है, कि मुस्लिम समाज में प्रगतिशील और व्यवहारिक दृष्टिकोण का प्रचार-प्रसार हो। मुस्लिम समाज में सम्पत्ति के अधिकार की जगह महिलाओं को बेहतर और उच्च शिक्षा, कठोर पर्दा-प्रथा से छूट और उनको समाज में वास्तविक समानता पर अधिक बल दिया जाये। जिससे मुस्लिम महिलाएं खुद इस लायक हो जाये, जिससे उन्हें अपने पिता की सम्पत्ति में किसी हिस्से की आवश्यकता ही न हो ।

वह अपने परिवार या समाज से कुछ लेने के बजाय परिवार और समाज को आर्थिक राजनीतिक तथा समाजिक सहयोग देने की क्षमता रखे।और मुस्लिम समाज में महिलाएं मात्र घरेलू कार्य तक सीमित रहकर तथा मात्र भोग्य की वस्तु न बनी रहे। और मुस्लिम समाज की महिलाओं के मुद्दों पर जो विभिन्न समाजों और अनेक मानवता वादी मुस्लिम महिला और पुरूष बुद्धिजीवियों के द्वारा मुस्लिम महिलाओ की दयनीय स्थिति पर सवाल उठाये जाते हैं उन पर भी विराम लग सके। तथा मुस्लिम समाज की महिलाओं की अनेक समस्याओं का समाधान भी हो सके। और वह अपने धर्म के पालन के साथ मुस्लिम तथा अन्य समाजो मे भी अपनी विशिष्ट पहचान बना सके।

: शारिक रब्बानी, वरिष्ठ उर्दू साहित्यकार

नानपारा, बहराईच (उत्तर प्रदेश)

Desk Editor
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