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पुलिसकर्मियों की बुनियादी सुविधाओं पर भी ध्यान दें सरकारें

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पुलिसकर्मियों को न तो साप्ताहिक अवकाश मिलता है और न ही आराम, जर्जर हो चुके मकानों में रहने को मजबूर हैं पुलिसवाले ऐसे में सरकारों को उनकी इन बुनियादी समस्याओं पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है।

सत्यपाल सिंह कौशिकजबहम पुलिस की बात करते हैं तब हमारे सामने समाज द्वारा पेश किया गया एक रौबदार खलनायक का चेहरा सामने आता है। समाज के रूढ़िवादी, पूर्वाग्रहों से ग्रसित पुलिस की जो छवि पेश की गई है सच में वह चिंतनीय है। क्या पुलिस के बिना हम एक सुदृढ़,मजबूत कानून व्यस्था की बात कर सकते हैं? शायद नहीं, यह पुलिस ही है जो हमें चैन की नींद सोने देती है। जरा सोचिए अन्य विभागों की तरह केवल एक दिन पुलिस भी...

सत्यपाल सिंह कौशिक

जबहम पुलिस की बात करते हैं तब हमारे सामने समाज द्वारा पेश किया गया एक रौबदार खलनायक का चेहरा सामने आता है। समाज के रूढ़िवादी, पूर्वाग्रहों से ग्रसित पुलिस की जो छवि पेश की गई है सच में वह चिंतनीय है। क्या पुलिस के बिना हम एक सुदृढ़,मजबूत कानून व्यस्था की बात कर सकते हैं? शायद नहीं, यह पुलिस ही है जो हमें चैन की नींद सोने देती है। जरा सोचिए अन्य विभागों की तरह केवल एक दिन पुलिस भी धरने पर बैठ जाए तो क्या होगा? कानून व्यस्था की धज्जियां उड़ जाएंगी, लूट- खसोट, हत्या की घटनाएं इतनी बढ़ जाएंगी की हम सोच भी नहीं सकते।

समाज द्वारा रचित पुलिस के अमानवीय चेहरे से बाहर निकलने की जरूरत है और हमें यह जानने की भी जरूरत है कि कैसे कम संसाधन और मुश्किल हालातों से गुजरते हुए भी पुलिस वाले हमेशा अपने कर्तव्यपथ पर पूरी तन्मयता के साथ डटे रहते हैं।

क्या हम कभी यह जानने की कोशिश करते हैं कि उनका परिवार किन मुसीबतों का सामना करता है। अत्यंत कम तनख्वाह में भी अपना गुज़र बसर करने वाले पुलिसकर्मियों को सप्ताह में एक दिन की छुट्टी भी नसीब नहीं होती, इनके सरकारी आवासों की दशा तो इतनी बुरी है कि पूछिए मत। क्या सरकारों को उनके इन मुसीबतों के बारे में पता नहीं है।

निश्चितरूप से सरकारें सब जानती हैं लेकिन इस विषय पर कोई प्रभावी कदम उठाने पर विशेष ध्यान नहीं देती हैं।

आइए जान लेते हैं 2019 में प्रकशित पुलिस स्थिति रिपोर्ट के बारे में

सन 2019 में कॉमन कॉज एंड सेंटर ऑफ द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज के लोकनीति कार्यक्रम द्वारा तैयार "स्टेटस ऑफ पुलिसिंग इन इंडिया" पर रिपोर्ट जारी की गई। इसे 21 राज्यों के 12,000 पुलिसवालों और उनके परिवार के 10,595 सदस्यों से बातचीत के आधार पर तैयार किया गया है। रिपोर्ट में लैंगिक विषयों और पुलिस इन्फ्रास्ट्रक्चर पर बात की गयी है। रिपोर्ट से पुलिस विभाग के भीतर महिलाओं और ट्रांसजेंडर्स को लेकर 'पुरुष' पुलिसकर्मियों के पूर्वाग्रह, अपराध से निपटने के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर की जर्जर हालत, आधुनिक तकनीकों की कमी के बारे में पता चलता है।

आइए रिपोर्ट की कुछ प्रमुख बातें जान लेते हैं

यह रिपोर्ट उन कार्य-परिस्थितियों के बारे में बताती है जिन स्थितियों में भारतीय पुलिस कार्य करती है।

*एक तिहाई पुलिस अफसरों ने यह माना है कि यदि उन्हे समान वेतन और सुविधाओं वाली कोई अन्य नौकरी दी जाए तो वे अपनी पुलिस को नौकरी छोड़ देंगे।

*तीन में से एक पुलिसवाले का मानना है कि धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ पुलिस फोर्स के भीतर भेदभाव होता है।

*जाति के मामले में, पांच में से एक पुलिसवाले का मानना है कि दलितों/आदिवासियों द्वारा दर्ज कराई जाने वाली शिकायतें झूठी होती हैं।

*कर्नाटक और उत्तर प्रदेश में ऐसे पुलिसवालों का औसत ज्यादा है जो मानते हैं कि दलितों में अपराध की प्रवृत्ति ज्यादा होती है।

*24 फीसदी पुलिसवाले मानते हैं कि शरणार्थी अपराध की तरफ अधिक बढ़ते हैं।

*पांच में से दो पुलिसवालों का मानना है कि अपराध के मामले में 16 से 18 साल के नाबालिगों को बालिग की तरह ट्रीट किया जाना चाहिए।

*मानवाधिकार, जातीय मुद्दे और भीड़ नियंत्रण की ट्रेनिंगः रिपोर्ट का कहना है कि इनमें से ज्यादातर पुलिसवालों को मानवाधिकार और जातीय विषयों से ज्यादा भीड़ नियंत्रण की ट्रेनिंग मिली हुई थी। बड़ी संख्या में इन पुलिसवालों को नियुक्ति के समय ट्रेनिंग मिली।

*राज्यों की बात करें तो बिहार में ऐसे पुलिसवालों की संख्या सबसे ज्यादा है जिन्हें मानवाधिकार की कभी ट्रेनिंग नहीं मिली। बिहार, असम, गुजरात, उत्तर प्रदेश, नगालैंड, छत्तीसगढ़ में पांच में से एक पुलिसवाले को इसकी ट्रेनिंग नहीं मिली।

*पुरुष पुलिसकर्मी महिलाओं को मानते हैं कमतर: रिपोर्ट कहती है कि पुलिस विभाग में महिला पुलिसकर्मियों को अधिकतर पुलिस स्टेशन के भीतर के काम दिए जाते हैं। जैसे- रजिस्टर और डेटा मेंटेन करना जबकि पुरुष अधिकतर फील्ड के काम जैसे पैट्रोलिंग, जांच, लॉ एंड ऑर्डर संभालने का काम करते हैं।

*पचास फीसदी से ज्यादा महिला पुलिसकर्मियों का मानना था कि पुलिस विभाग के भीतर महिला और पुरुष में भेदभाव होता है। यह भेदभाव ऊंची पोस्ट पर बैठी महिला के साथ भी होता है।

*बिहार, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल में महिलाओं को लेकर पुलिस फोर्स में पूर्वाग्रह अधिक है। इन राज्यों में 'पुरुष' पुलिसकर्मियों का मानना था कि महिलाओं के पास कम क्षमता होती है उन्हें घर के कामों पर ध्यान देना चाहिए।

*पांच में से एक महिला पुलिसकर्मी ने माना कि पुलिस स्टेशन में उनके लिए अलग टॉयलेट नहीं है।

*चार में से एक महिला का कहना था कि यौन शोषण से जुड़े मामलों के लिए उनके कार्यस्थल पर कोई समिति नहीं है।

पुलिस इन्फ्रास्ट्रक्चर की जर्जर हालत पर सीएसडीएस की रिपोर्ट के मुताबिक, पुलिसवालों ने खुद माना कि उन्हें मिलने वाली सुविधाओं की स्थिति बुरी है।

रिपोर्ट के मुताबिक, 46 फीसदी पुलिसवालों ने कहा कि उन्हें जब सरकारी वाहन की जरूरत थी तब वाहन मौजूद नहीं था। 41 फीसदी मानते हैं कि वे क्राइम सीन पर इसलिए नहीं पहुंच सके क्योंकि उनके पास स्टॉफ नहीं था।

42 फीसदी पुलिसवालों के मुताबिक, पुलिस स्टेशन पर फोरेंसिक टेक्नोलॉजी से जुड़ी सुविधाएं नहीं थीं। तीन में से एक पुलिसवाले को फोरेंसिक की कोई ट्रेनिंग नहीं दी गई।

17 फीसदी ने कहा कि उनके पुलिस स्टेशन पर क्राइम एंड क्रिमिनल ट्रैकिंग सिस्टम मौजूद नहीं है।

पश्चिम बंगाल में 30 फीसदी और असम में 28 फीसदी पुलिसवालों ने कहा कि फंक्शनल कंप्यूटर उनके पुलिस स्टेशन में कभी नहीं रहा।

सर्वे के अनुसार देश में पुलिसकर्मी औसतन 14 घंटे प्रतिदिन काम करते हैं, जबकि 80 फीसदी पुलिसकर्मी आठ घंटे से ज्यादा ड्यूटी करते हैं। देश भर में 50 फीसदी पुलिसकर्मी ओवरटाइम करते हैं। पुलिसकर्मियों के पांच में से तीन परिवार वालों को लगता है कि उन्हें रहने के लिए दिया गया सरकारी मकान घटिया है।

पुलिस बल की कमियों को दूर करने के लिए समय-समय पर अनेक प्रयास किए गए हैं। अलग-अलग राज्यों ने इससे संबंधित आयोगों का गठन किया है। दुर्भाग्यवश किसी भी आयोग ने पुलिस बल पर पड़ने वाले अवांछित दबावों से उसे बचाने के लिए कोई उपाय नहीं किए।

सन् 1977 में तत्कालीन केन्द्र सरकार ने राष्ट्रीय पुलिस आयोग का गठन किया था। 1979-81 के बीच आयोग ने आठ विस्तृत रिपोर्ट सौंपी। लेकिन भारत की केन्द्रीय सरकार ने इन रिपोर्टों में प्रस्तावित सुधारों का उपयोग केवल दिखावे के लिए किया।

रिपोर्ट में इस बात पर भी चिंता जताई गई है कि अपराध के बदलते तरीकों से निपटने के लिए भारतीय पुलिस उतनी सक्षम नहीं है जितनी कि आर्थिक अपराध, डेटा चोरी और साइबर अपराध।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, एक लाख की जनसंख्या पर 222 पुलिसकर्मी होने चाहिए जबकि भारत में इसका अनुपात सिर्फ 192 प्रति एक लाख व्यक्ति है।

स्टेटस ऑफ पुलिसिंग इन इंडिया पर जारी रिपोर्ट न सिर्फ चौकाने वाली है बल्कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश के लिए ठीक नहीं है। पुलिस जिसपर की नागरिकों की सुरक्षा के जिम्मेवारी है वे खुद अपनी सुरक्षा को लेकर परेशान है। आधारभूत संरचनाओं की कमी की वजह से पुलिस प्रशासन के समक्ष चुनौतियाँ दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। कई दफा इनके समाधान के लिए प्रयास तो किये गये लेकिन सफलता कुछ खास प्राप्त नहीं हुई। पुलिस सुधार को लेकर कई समितियाँ बनीं तथा उन्होंने अपनी रिपोर्ट भी जारी की लेकिन सरकार की उदासीनता की वजह से उनपर कार्य नहीं हो सका। अतः अब समय आ गया है कि पुलिस सुधार के लिए आवश्यक कदम उठाये जायें जिससे कि समय के साथ पुलिस आधुनिक हो सके और अपना कर्तव्य सही तरीके से निभा सके।

Satyapal Singh Kaushik
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