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"तिरे वादे पर जिए हम तो ये जान झूठ जाना, कि ख़ुशी से मर न जाते गर ऐतबार होता."

तिरे वादे पर जिए हम तो ये जान झूठ जाना, कि ख़ुशी से मर न जाते गर ऐतबार होता.
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मिर्ज़ा ग़ालिब का बस यह एक शेर ही काफी है, मोदी जी के 20 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज और भारत की उन्नति की बड़ी-बड़ी बातों- इरादों पर देश के बहुत से लोगों की प्रतिक्रिया जानने के लिए। इतना बड़ा पैकेज मोदी जी ने दे दिया और देश में कहीं कोई खुशी जाहिर नहीं कर रहा। सोशल मीडिया पर तो एकदम सन्नाटा ही पसरा है। शायद इसकी वजह यह है कि खुद मोदी के कट्टर समर्थकों को भी अब मोदी की बड़ी-बड़ी बातों, वादों-इरादों और सपनों-जुमलों पर कोई भरोसा नहीं रहा।

जबकि हैरत और बेहद दिलचस्पी की बात है कि सपनों और जुमलों के इस नए पैकेज पर भी मुंह में दही जमाये बैठे मोदी समर्थकों ने साल 2014 में और 2019 में दो- दो बार मोदी जी को प्रधानमंत्री की कुर्सी दी ही इसीलिए है क्योंकि मोदी जी ने जुमलों, सपनों, वादों- इरादों और अपनी लुभावनी घोषणाओं से उन पर जादू कर दिया था। उसके बाद शायद सभी को यह लगने लगा था कि मोदी जी देश में विकास की जो गंगा बहाएंगे, उससे देश के ऐसे अच्छे दिन आएंगे कि विदेश में जमा भारत का सारा काला धन न सिर्फ भारत आ जायेगा बल्कि हर किसी को उसमें से 15- 15 लाख भी मोदी जी दे देंगे। फिर उस 15 लाख की तो बात ही कभी नहीं हुई और अब तो यह आलम है कि सबकी नौकरी/व्यापार, जमा पूंजी पर भी तलवार लटक रही है।

हो सकता है कि देश में लगभग हर आदमी मोदी जी के पिछले छह बरसों के राजकाज में हुई इसी आर्थिक बर्बादी की आंच थोड़ा बहुत खुद भी महसूस करने लगा हो। या उसे इतना ही समझ आ गया हो कि मोदी जी जो कहते हैं, वह करते नहीं... और जो करते हैं, वह पहले कभी कहते नहीं...बस अचानक आकर 8 PM पर ऐलान कर देते हैं।

हालांकि मोदी के विरोधी अगर यह सोच रहे हैं कि मोदी समर्थक इस बार मोदी की लच्छेदार बातों में आकर खुश नहीं हो रहे, जश्न नहीं मना रहे या सोशल मीडिया पर गाली गलौच नहीं कर रहे तो इसका अर्थ यह है कि अब मोदी की लोकप्रियता भी घट गई है। ऐसा कतई नहीं है। मोदी समर्थक भले ही मोदी के भाषण को मोदी विरोधियों की तरह छलावा या लॉलीपॉप मानकर चुपचाप बैठे हों मगर मोदी आज भी उनके दिलों पर राज करते हैं।

आर्थिक मसलों पर या देश के विकास आदि मुद्दों पर उनमें पहले भी मोदी को लेकर कोई नाराजगी, कोई शिकवा-शिकायत कभी नहीं रहा। क्योंकि हिन्दू-मुसलमान, राष्ट्रवाद, पाकिस्तान, कश्मीर, आतंकवाद आदि मसलों पर मोदी पहले से ही उनका दिल एक नहीं बल्कि कई-कई बार जीत चुके हैं। इसीलिए तो आज भी मोदी जी उतने लोकप्रिय हैं, जितने वह 2014 में थे।

अब जिन्हें मोदी के अनापशनाप फैसलों से कुछ दिक्कत है या असहमति है, जैसे कि मैं... या मेरे जैसे कुछ और लोग...तो उनके कुछ कहने-सुनने से पहले भी कुछ फर्क नहीं पड़ा है...और आगे भी नहीं ही पड़ेगा। बस इतना ही कर सकते हैं हम अपने दिल की तसल्ली के लिए कि मोदी जी के लच्छेदार भाषणों की छलावे भरी खुशी और देश में बढ़ती जा रही आर्थिक बर्बादी के गम के बीच ग़ालिब के शेरों से यूं ही अपने उदगार व्यक्त करके अपनी रोजी रोटी के संघर्ष में जुट जाएं।

देश के ज्यादातर लोग अगर मोदी जी पर अटूट भरोसा करके उनकी जय जयकार कर रहे हैं तो हमें भी इंतजार करना ही होगा कि देखें मोदी जी 2024 तक क्या- क्या गुल खिलाएंगे और बर्बादी की किस हद तक जाकर उनके समर्थक आर्थिक मसलों या विकास पर यूं ही चुप्पी साधे रहेंगे...

कितना अजीब लगता है कि 2014 में जिस नेता ने पहली बार अपनी सरकार बनने के बाद अच्छे दिन , विकास और आर्थिक उन्नति आदि के अपने अधिकांश चुनावी वादों को दूसरे टर्म में आकर भी पूरा न किया हो.... और भारत के भविष्य के जिसके हर आर्थिक प्लान ने या तो शुरू होते ही दम तोड़ दिया हो या शुरू ही न हो पाया हो, उसके मुंह से एक बार फिर 20 लाख करोड़ का आर्थिक पैकेज और भारत के भविष्य के लिए तरह-तरह के प्लान सुनना... ऐसे हतप्रभ कर देने वाले हालात में तो ग़ालिब से शुरू हुई बात को ग़ालिब से ही खत्म करके बाकी सब भविष्य पर छोड़ देना ही बेहतर होगा....

"हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन,

दिल को खुश रखने को ग़ालिब ये ख्याल अच्छा है."

अश्वनी कुमार श्रीवास्त�
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