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मोदी सरकार ने मेरे साथ ऐसा व्यवहार किया - अवधेश कुमार
अवधेश कुमार
मौरिशस में आयोजित विश्व हिन्दी सम्मेलन से लौटकर आए कुछ लोगों से बात हुई है। मैं सम्मेलन में नहीं गया। मैं यह नहीं लिखता लेकिन कई लोगों ने पूछ दिया कि आप क्यों नहीं गए तो उनको बताया और सोचा कि इसे लिख भी दिया जाए। इसका कारण विदेश मंत्रालय की गलत नीति तथा दोहरा व्यवहार था। मेरे पास एक मेल आया। इसमें लिखा था कि आप विश्व हिन्दी सम्मेलन में आमंत्रित है। बहुत अच्छा। किंतु उसके बाद लिखा था कि जाने-आने का खर्च आपको खुद वहन करना होगा। ठहरने का खर्च भी आप खुद वहन करेंगे। हां, ठहरने के स्थान से सम्मेलन तक ले जाने तथा भोजन की व्यवस्था की जाएगी। मुझे ये बड़ा अजीब लगा। क्या मोदी सरकार हिन्दी के लिए इतना नहीं कर सकती कि वह सम्मेलन का पूरा खर्च उठा ले? क्या वह मेरे जैसे हिन्दी सेवियों को अपने खर्च पर नहीं ले जा सकती है? मेरा मत यह बना कि अगर सब कुछ अपने खर्च से ही करना है तो फिर सरकार के इसमें होने की क्या आवश्यकता है? हम लोग संगठित होकर स्वयं हर वर्ष सम्मेलन कर सकते हैं और इसमें हिन्दी की सेवा कुछ बेहतर ही होगी।
किंतु धीरे-धीरे मेरे पास सूचना आने लगी कि वो क्षोभ पैदा करने वाली थी। वहां जाने वालों या ले जाए जाने वालों की दो श्रेणियां बनाई गई। एक, जिसका मेल मेरे पास आया। दूसरा, जिनका सारा खर्च सरकार उठा रही है। उनमें लोगों को निबंधन कराने की भी आवश्यकता नहीं। कुछ लोग व्यवस्था कर रहे थे। उनका दिया गया नाम ही पर्याप्त था। उनसे फोन करके पासपोर्ट नंबर आदि मांगे गए। भारी संख्या में जाने वाले ऐसे ही लोग थे। यह कहना सही होगा जाने वाले सभी इसी श्रेणी के थे। मैं यह नहीं कहूंगा कि उसमें हिन्दी सेवी नहीं थे। किंतु इनकी संख्या अत्यंत कम थी। मोदी सरकार में हिन्दी या शिक्षा से जुड़े संस्थानों में ऐसे-ऐसे लोग डाले गए हैं जिनके बारे में मैं कुछ बोलना नहीं चाहता। पूर्व सरकारों में भी यही होता था। लेकिन इस तरह इतनी संख्या में सम्मानपूर्वक ले जाए जाने वालों मंें से ज्यादा संख्या ऐसे ही लोगों की थी जो आने के बाद कुछ लिखने की भी स्थिति में नहीं।
इसका मतलब हुआ कि मेरे जैसे व्यक्ति का नाम कहीं से विदेश मंत्रालय के अधिकारियों को मिल गया या दे दिया गया। इसलिए उनकी मजबूरी थी कि मुझसे एक बार संपर्क करने की औपचारिकता पूरी कर लें। मैंने निंबंधन नहीं कराया तो सोचा शायद फोन आएगा तो पूछूंगा। कोई फोन आया ही नहीं कि आपने निबंधन क्यों नहीं कराया? तो एक औपचारिकता पूरी की गई। आप जाएं या न जाएं इससे कोई मतलब नहीं। कुछ ने पूछा कि आप क्यों नहीं गए और मैंने जब कारण बताया तो वे आश्चर्य में थे कि आपके साथ ऐसा पत्र क्यों भेजा गया, जबकि हम लोगों के साथ तो ऐसा नहीं था। मेरे जैसा पत्र कुछ और लोगों को भी भेजा गया। यह है मेरे जैसे लोगों के साथ सरकार का व्यवहार।
किंतु विदेश मंत्रालय को इसका जवाब देना चाहिए कि इस तरह का दोहरा व्यवहार क्यों किया गया? क्या वहां मुफ्त में ले जाए जाने वालों से मेरी हैसियत या मेरे तरह अन्य लोग जो नहीं गए उनकी उपयोगिता किसी तरह कम थी? मूल्यांकन का आधार क्या था? कुछ समाचार पत्रों के संपादक या वरिष्ठ प्रतिनिधि ले जाए गए तो कुछ को पूछा भी नहीं गया। किसी का पूरा खर्च वहन करना और किसी को यह कहना कि सारा खर्च आपको अपना ही करना होगा कैसी व्यवस्था है? इसके लिए आधार क्या बनाया गया? इस तरह मनमाने तरीके से फैसला करने वाले कौन हैं? मोदी सरकार बनने के इतने वर्षों में मेरे पास पहली बार कोई निमंत्रण आया था और उसका चरित्र ऐसा थाा। आपलोग तय करिए कि इसका अर्थ क्या है? मुझे इसका जवाब कैसे देना चाहिए?