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भारत तोड़ो रथ यात्रा से भारत जोड़ो यात्रा तक की राजनीति

यात्रा का नाम भारत जोड़ो यात्रा रखा गया है तो ये नाम रखने के पीछे क्या कारण हो सकते हैं इस पर जरूर विश्लेषण किया जाना चाहिए।

भारत तोड़ो रथ यात्रा से भारत जोड़ो यात्रा तक की राजनीति
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कांग्रेसी युवराज राहुल गांधी बड़े जोश के साथ भारत जोड़ो यात्रा लेकर चल निकले हैं, यात्रा कई हजार किलोमीटर की दूरी तय करेगी और इस यात्रा से क्या प्रभाव राजनीति पर पड़ने जा रहा है इसका आकलन तो यात्रा पूरी होने के बाद किया जाएगा फिलहाल तो मिली जुली प्रतिक्रिया सामने आ रही है, भाजपा समर्थक इसे फिजूल की प्रैक्टिस कह रहे हैं जबकि कांग्रेस समर्थक इसे देश की वर्तमान परिस्थितियों में अत्यधिक जरूरत करार दे रहे हैं। यात्रा का नाम भारत जोड़ो यात्रा रखा गया है तो ये नाम रखने के पीछे क्या कारण हो सकते हैं इस पर जरूर विश्लेषण किया जाना चाहिए।

तीन दशक पूर्व देश में एक यात्रा और निकली थी जिसका नेतृत्व भाजपा के वरिष्ठतम नेता लालकृष्ण आडवाणी कर रहे थे और इस यात्रा ने देश की राजनीति की दशा और दिशा बदली थी। इस रथ यात्रा से आडवाणी एक हिंदुत्ववादी आंदोलन खड़ा करने में कामयाब रहे थे जिसका परिणाम बाबरी मस्जिद के विध्वंस के रूप में सामने आया था। इस सारे खेल में तत्कालीन कांग्रेस के भी सहयोग को नकारा नहीं जा सकता। अगर ये भी कहा जाए कि देश में सांप्रदायिक राजनीति को बहुत मजबूती से स्थापित करने का श्रेय भी लालकृष्ण आडवाणी और उनकी रथयात्रा को दिया जाना चाहिए। इस रथयात्रा ने भारतीय जनता पार्टी को तो एक राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर तो स्थापित किया ही साथ ही देश में हिन्दू मुस्लिम सांप्रदायिक विभाजन को भी गहरा कर दिया और यह विभाजन धीरे धीरे इतना बढ़ा कि टीवी मीडिया पर मुसलमानो, इस्लाम और पैगंबर पर बुरी बुरी टिप्पणी शुरू हो गई जिसमें नुपुर शर्मा विवाद को बतौर उदाहरण ले सकते हैं। नुपुर शर्मा की विवादित टिप्पणी के बाद अरब देशों की प्रतिक्रिया ने भारत की छवि को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी नुकसान पहुंचाया है। भारत के विदेश मंत्री सऊदी अरब की यात्रा पर गये और दोनों देशों के संबंधों को अच्छा बनाने की बात कही लेकिन सऊदी अरब की तरफ से कोई मजबूत व्यापार की बात सामने नहीं आई है इसकी वजह भी देश का सांप्रदायिक माहौल ही है।

भारत जोड़ो यात्रा को बहुत से लोग 2024 में कांग्रेस और राहुल गांधी की सत्ता प्राप्ति की कोशिश बता रहे हैं लेकिन राहुल गांधी इस यात्रा के जरिए कांग्रेस को उसकी वास्तविक धर्मनिरपेक्ष छवि के तौर पर स्थापित कर देना चाहते हैं जो छवि पिछले दशकों में नरम हिंदुत्व का समर्थन करने में खराब हो गई थी। राहुल गांधी ये भी अच्छी तरह जानते हैं कि फिलहाल सत्ता प्राप्त कर भी ली जाए तब भी मोदी सरकार द्वारा अर्थव्यवस्था में कर दिए गए गड्ढों को भरना बदलते दुनिया के परिवेश में आसान काम नहीं है। इसके लिए लंबी शासन अवधि दरकार होगी। भारत जोड़ो यात्रा को मेन स्ट्रीम मीडिया कवरेज तो नहीं मिल रहा है और इसकी उम्मीद भी कम ही थी लेकिन सोशल और डिजिटल मीडिया में जो भी वीडियो और खबरें चल रही हैं उनसे पता चल रहा है कि राहुल गांधी को जनसमर्थन अच्छा खासा मिल रहा है।

भाजपा और सत्तापक्ष यात्रा को भले ही हलका बता रहे हैं लेकिन कहीं ना कहीं उनके माथों पर भी चिंता की लकीरें जरूर बन रही हैं। कांग्रेस मुक्त भारत का सपना देखने वाले ये महसूस कर रहे हैं कि यदि कांग्रेस सत्ता में जल्दी भी नहीं आ पाई तब भी सत्ता का विकल्प तो जरूर बनी रहेगी और भारतीय जनता कब जाने भाजपा से मोहभंग करते हुए कांग्रेस में अपना विश्वास जता दे। सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के पास धार्मिक मुद्दों के आलावा कोई मुद्दा सत्ता में आने के लिए नहीं है। ज्ञानव्यापी और मथुरा ईदगाह के मुद्दे को हवा देना इसी सत्ता प्राप्ति एजेंडे का एक हिस्सा है। भाजपा का देश को विकसित बनाने का शौर, दुनिया की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था बना देने का दावा आदि सब जुमलाबाजी है, अगर इसमें सच्चाई होती तो भाजपा को अपने सांप्रदायिक एजेंडे पर वापस आने की कोई आवश्यकता नहीं होती।

देश को यदि धर्मनिरपेक्ष बनाए रखना है तो फिर ऐसी भारत जोड़ो जैसी यात्राओं की और अधिक आवश्यकता होगी। और यदि देश को ऐसे ही विघटनकारी तत्वों के सपूर्द किए रखा तो फिर देश की अखंडता और संपन्नता खतरे में पड़ जाएगी।

माजिद अली खां

About author
माजिद अली खां, पिछले 15 साल से पत्रकारिता कर रहे हैं तथा राजनीतिक मुद्दों पर पकड़ रखते हैं. 'राजनीतिक चौपाल' में माजिद अली खां द्वारा विभिन्न मुद्दों पर राजनीतिक विश्लेषण पाठकों की सेवा में प्रस्तुत किए जाते हैं. वर्तमान में एसोसिएट एडिटर का कर्तव्य निभा रहे हैं.
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