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साहित्य विमर्श: सआदत हसन मंटो का स्त्री विमर्श के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान

अधिकांश कहानियां मुस्लिम पात्रों पर आधारित हैं मंटो पर हमेशा अशलीलता के आरोप लगते रहे, लेकिन मंटो सच्चाई पेश करने में कभी पीछे नहीं रहे

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शारिक रब्बानी, वरिष्ठ उर्दू साहित्यकार

नानपारा, बहराईच (उत्तर प्रदेश)

सआदत हसन मंटो उर्दू साहित्य के ऐसे कहानीकार हैैं जिन्होंने हमेशा स्त्री-पुरूष समानता की बात की है। उर्दू साहित्य में स्त्री विमर्श करने वाले लेखकों मे मंटो का साहित्य बेमिसाल है। मंटो ने अपनी कहानियों के माध्यम से महिलाओं और उनसे जुड़े तमाम पहलुओं को बेबाकी के साथ समाज के सम्मुख प्रस्तुत किया है जिसे सभ्य समाज में छिपी हुई घिनौनी सच्चाई माना जाता है।

अधिकांश कहानियां मुस्लिम पात्रों पर आधारित हैं मंटो पर हमेशा अशलीलता के आरोप लगते रहे, लेकिन मंटो सच्चाई पेश करने में कभी पीछे नहीं रहे। मंटो की कहानी शरीफन देश के बँटवारे व हिन्दू-मुस्लिम दंगों में महिलाओं की उस उपस्थिति को दर्शाती है जिसमें समाज की मानवता भी हैवानियत और वहशीपन में परिवर्तित हो जाती है। कहानी ठंडा गोश्त पँजाबी समाज के एक परिवार पर आधारित है जिसमें महिलाओं की कामुक्ता और कमजोर पुरूष के प्रति उनकी मानसिकता को दर्शाया गया है। काली शलवार एक देह व्यापार से जुुड़ी सुल्ताना नामक वैश्या की आत्म पीड़ा और वैश्याओं की वास्तविक स्थिति पर आधारित है। कहानी ब्लाउज में मंटो ने जवान महिलाओं के युवाअवस्था के प्रारंभ में शरीर में होने वाले परिवर्तनों का श्रेष्ठ उल्लेख किया है। इसके अलावा बू-खोलदो, टोबा टैक सिह आदि लघु कथाएं भी बहुत चर्चित हैं।

सआदत हसन मंटो का जन्म 11मई 1912 को हुआ था और इनकी मृत्यु 18 जनवरी 1955 में हुई, फिर भी मात्र 43 वर्ष के छोटे से जीवन काल मेें उन्होंने 22 लघु कथा संग्रह‌ एक उपन्यास, रेडियो नाटक के 5 संग्रह सहित अन्य कई संग्रह भी प्रकाशित किये । मंटो की कुछ अन्य रचनाएं, सरकंडों के पीछे, शिकारी औरतें, रत्ती माशा तोला, तीन खामोश औरतें, वो आँखें, पर्दे के पीछे, बगैर इजाजत, बुर्के आदि भी अपने में एक बेहतरीन मिसाल है तथा सआदत हसन मंटो की कुछ रचनाओं का अन्य भाषाओं में भी अनुवाद हो चुका है।

कुल मिलाकर मंटो की कहानियां और लेख समाज को आईना दिखाने में पूरी तरह सफल रहे हैं और मंटो के साहित्य को अश्लीलता की नजर से देखना सच्चाई से इंकार करना है। मँटो का साहित्य आज के युग में खूब पढ़ा जाता है और उन पर अनेक बुद्धिजीवियों और साहित्यकारों ने मंटो के समर्थन में अपने विचार और लेख भी लिखे है।

Desk Editor
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