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- व्यंग : दूल्हे के लिए...

संजय कुमार सिंह
वर्षों से ढूंढ़ रहा था। जनसत्ता की नौकरी करते हुए मजा नहीं आया तो एक विकल्प मैंने मर्सिडीज टैक्सी के रूप में खुद चलाने का विचार बनाया था। बाद में बिहार के लोगों ने सलाह दी कि एक लगन में दाम निकल जाएगा तो मैंने टाल दिया था। खुद चलाने का उत्साह ठंडा पड़ गया। फिर दूल्हे के लिए ढंग की गाड़ी नहीं मिली। वो तलाश आज पूरी हुई। मुझे वैकल्पिक रोजगार मिल गया।
बिहार में दूल्हों के लिए गाड़ी की कई किस्से हैं। एक से एक गांव और वैसे ही शौक। तब जब फोर व्हील ड्राइव वाली जीप (महिन्द्रा की नहीं) और ट्रैक्टर के अलावा गांव में कोई दूसरी गाड़ी नहीं पहुंच सकती थी तबसे लेकर अब तक। कई गांवों में तो गाड़ी ले जाने के लिए एक ट्रैक्टर ट्रॉली मिट्टी, कुदाल के साथ कुछु मजदूर आगे चलते थे। वो भी क्या दिन थे और दूल्हों के क्या ठाठ थे। हर लड़के की तरह बचपन में मुझे भी गाड़ियों का खूब शौक था और अच्छी (या विशेष) गाड़ियां शादियों में ही दिखती थीं। पर अभी तक दूल्हे के लिए विशेष लाइट का इंतजाम किसी गाड़ी में नहीं मिला, ना हुआ।
विकल्प के रूप में पेट्रोमैक्स जलाने से लेकर बैंड बाजा की लाइट जैसे अस्थायी उपाय होते रहे हैं। अंधेरे में दरवाजा लगना और बैंड की लाइट दूल्हे के दोस्तों के नाचने के लिए भी जरूरी हो और गांव में एक जेनरेटर मतलब एक गाड़ी साथ में। इसलिए नाच के समय दूल्हा जी अक्सर अंधेरे में बैठते थे। नई गाड़ियों में अंदर की लाइट जला देने पर ड्राइवर भी चमकता है। इस गाड़ी में जो व्यवस्था है वह अभी तक नहीं दिखी। पता नहीं आजकल बिहार में दहेज का क्या रेट और बाजार कैसा है वरना दरवाजा लगाने के लिए इस गाड़ी का मुंहमांगा किराया मिलेगा।
आपदा में अवसर - पता लगाता हूं बिहार में शादी का बाजार क्या चल रहा है। कैसी कमाई हो सकती है। ये सुझाव मत दीजिएगा कि दिल्ली में भी चल जाएगा। ऐसा सोचने वाले लोग जान लें कि बिहार के बाजार का उन्हें अनुमान ही नहीं है। और मैं ऐसे ही नहीं चहक रहा हूं इस फोटो को देखकर। जरूरतमंद लोग ऑफर भेजना शुरू करें तो विचार करूं।
लेखक के अपने निजी विचार है स्पेशल कवरेज न्यूज इसके लिए जिम्मेदार नहीं है




