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वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह बोले, मीडिया पर मेरी दूसरी पुस्तक की यह भूमिका

फिर भी संपादकों के सेंसर का आलम यह है सीमा विवाद पर सीमाई क्षेत्र के सत्तारूढ़ दल के सांसद का वह बयान प्रमुखता से नहीं छपा जो एजेंसी से चली थी।

वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह बोले, मीडिया पर मेरी दूसरी पुस्तक की यह भूमिका
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लद्दाख से भाजपा सांसद जमयांग सेरिंग नामग्याल ने सीमा इलाके का दौरा किया। इसके बाद उन्होंने जो कहा वह नवोदय टाइम्स में पहले पन्ने पर छपा लेकिन दूसरे कई अखबारों में मुझे यह खबर पहले पन्ने नजर नहीं आई। ढूंढ़ने पर जो खबर मिली और सोशल मीडिया पर जो सब हुआ उससे आप जान जाएंगे कि इमरजेंसी में खबरें सेंसर की जाती थीं तो झुकने के लिए कहने पर रेंगने वाले संपादकों में कुछ अखबार की जगह खाली छोड़ देते थे यानी वहां की खबर सेंसर हो गई। अब इमरजेंसी के विरोधियों की सरकार है और इमरजेंसी नहीं लगी है। फिर भी संपादकों के सेंसर का आलम यह है सीमा विवाद पर सीमाई क्षेत्र के सत्तारूढ़ दल के सांसद का वह बयान प्रमुखता से नहीं छपा जो एजेंसी से चली थी।

ऐसा नहीं है कि अखबार खासकर हिन्दी के एक्सक्लूसिव खबरें ही पहले पन्ने पर छापते हों और एजेंसी की खबरों से परहेज करते हैं। हाल ही मैं मैंने लिखा था कि हिन्दी के ज्यादातर अखबारों में पहले पन्ने की खबरें एजेंसी की हैं और ज्यादातर अखबारों में एक जैसी खबरें ही हैं। अपनी पुस्तक, "पत्रकारिता : जो मैंने देखा जाना समझा" में मैं लिख चुका हूं कि हमलोग एक दिन के अखबार के अलग एडिशन देखकर समझ जाते थे कि अखबार किसने बनाया होगा और अब हालत यह है कि कई अखबारों में एक ही खबर लीड होती है और शीर्षक भी लगभग एक होता है। अब सेंसर सरकार नहीं करती है, संपादक ही सेंसर अधिकारी है और जहां नहीं है वहां यह काम मालिक करता है और सेंसर रोज खबरें देखकर करने की जरूरत ही नहीं पड़ती मोटा सा नियम है सरकार के खिलाफ कुछ नहीं छापना है और इसमें सत्तारूढ़ दल के सांसद का बयान या रिपोर्ट भी शामिल है जो अखबारों को वैसे दुर्लभ है।

ऐसी एक खबर द टेलीग्राफ ने 11 जून को पहले पन्ने पर खबर छापी थी, "लेह में भाजपा नेता ने कहा, चीनी हमारे सीमा क्षेत्र में घुस आए हैं। इस खबर के अनुसार, लद्दाख स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषद, लेह के एक्जीक्यूटिव कौंसिलर, कोनचोक स्टैनजिन ने अखबार से फोन पर कहा, 'चीनी सैनिक हमारी सीमा में हैं'। कितना यह उन्हें पता नहीं था।" लेकिन 'निष्पक्ष' और 'स्वतंत्र' अखबारों में पूर्व सैनिकों के एक समूह की खबर छपी। जाहिर है यह बयान राहुल गांधी के ट्वीट पर था लेकिन खबरों का शीर्षक था, राहुल गांधी फंसे, मचा तूफान , चिन्ता जताई आदि। इंडिया टीवी डॉट इन ने लिखा, सशस्त्र बलों के 71 सेवानिवृत्त अधिकारियों के एक समूह ने लद्दाख सीमा विवाद से निपटने को लेकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा केंद्र सरकार की आलोचना किए जाने को 'अवांछनीय एवं निंदनीय' करार दिया है।

सीमा पर विवाद को लेकर राहुल गांधी सवाल पूछ रहे हैं तो गलत नहीं कर रहे हैं। उनका काम है और सवाल हम सबका है। लेकिन सरकार जवाब नहीं दे रही है। मीडिया इसे बताने की बजाय लिखता है, कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी लगातार भारत-चीन सीमा विवाद को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साध रहे हैं। इसी बीच लद्दाख से भाजपा सांसद जमयांग सेरिंग नामग्याल ने उन्हें जवाब दिया है। भाजपा सांसद ने ट्वीट में दावा किया कि चीन ने कांग्रेस कार्यकाल में भारतीय जमीन पर कब्जा किया था। बता दें कि राहुल गांधी ने ट्वीट कर पूछा था कि क्या चीन ने लद्दाख में भारतीय जमीन पर कब्जा किया है (अमर उजाला)। इस ट्वीट को सोशल मीडिया पर राहुल गांधी के ट्वीट के जवाब के रूप में पेश किया गया लेकिन क्या यह "खबर" है।

आइए, देखें इसमें आगे क्या लिखा है, "जमयांग ने ट्वीट कर कहा- हां, चीन ने भारतीय जमीन पर कब्जा किया है, लेकिन कांग्रेस के कार्यकाल में। सांसद का कहना है कि उम्मीद है राहुल और कांग्रेस तथ्यों के आधार पर मेरे जवाब से संतुष्ट होंगे। उन्होंने साथ ही उम्मीद जताई कि वे फिर से गुमराह करने की कोशिश नहीं करेंगे।" बेशक यह राजनीति है पर ना तो यह जवाब है ना खबर फिर भी यह खबर के रूप में छपी और जो खबर थी वह गायब है। इसे नवोदय टाइम्स ने छापा था, "लद्दाख के डेमचोक गांव के सामने चीन ने बसाया नया डेमचोक गांव"। इस खबर में कहा गया था कि चीन ने वहां 13 मकान बनाए हैं और सड़क और सड़क व टेलीकॉम की सुविधा भी शुरू कर दी है। तनाव और चीन पीछे गया जैसी बिना स्रोत वाली सूत्रों की खबर के मुकाबले यह खबर कितनी महत्वपूर्ण है, कोई भी समझ सकता है। पर अखबार क्या कर रहे हैं? देखिए मेरी आने वाली पुस्तक में - यह उसकी भूमिका भी हुई।

पेड न्यूज के जमाने में ऐसे कॉलम की जरूरत महसूस हुई थी। पर अब दुनिया काफी आगे निकल गई है। चुनाव में पूरा का पूरा चैनल शुरू हो जाता है। अखबार और पोर्टल तो हैं ही। मकसद सबकी निष्पक्षता खत्म करके सबको खानों में बांट देना है। पत्रकार नौकरी बचाने के लिए सरकारी सहायता मांग रहे हैं। यही काम मालिकान कर रहे हैं। सबको जीना है, सबको घर चलाना है। अपने से फुर्सत मिले तो दूसरों की सोंचे। इस बीच हाथी की मौत पर चिन्ता करना और आदमी की मौत पर चुप रहना नया नॉर्मल है। 30 अगस्त 2018 से शुरू मेरा यह कॉलम करीब दो साल चला। बीच में तीन चार हफ्ते नहीं लिखा पाया। तब इंटरनेट पर सभी अखबार मुफ्त थे अब लगभग कोई नहीं है। भाजपा राज और नरेन्द्र मोदी के चुनाव के बीच मीडिया की भूमिका का यह दस्तावेज है। 100 पन्ने की छोटी सी किताब होगी – भावी पत्रकारों को सस्ते में पत्रकारिता का हाल बताएगी। चाहता हूं पुस्तक के रूप में आ जाए। अगली सूचना का इंतजार कीजिए।

Shiv Kumar Mishra
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