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खाड़ी युद्ध बहाना, मोदी सरकार की नीतियों की असली कीमत चुका रहा है देश

प्रत्यक्ष मिश्रा, लेखक
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव ने आज दुनियाभर की ऊर्जा व्यवस्था को हिलाकर रख दिया है। तेल, गैस और खाद - तीनों की सप्लाई पर खतरा मंडरा रहा है। भारत जैसे देश के लिए, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, यह स्थिति स्वाभाविक रूप से चिंता पैदा करती है। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह पूरी तरह बाहरी संकट है, या फिर इसके पीछे हमारी अपनी नीतिगत कमज़ोरियां भी जिम्मेदार हैं?
अगर हम गहराई से देखें, तो तस्वीर सिर्फ “वैश्विक संकट” की नहीं है। यह काफी हद तक हमारी अपनी तैयारियों की कमी, प्राथमिकताओं और अधूरी रणनीतियों की परिणीति भी है।
ऊर्जा सुरक्षा में LPG की अनदेखी और बढ़ता जोखिम
भारत आज अपनी एलपीजी जरूरतों का लगभग 60 प्रतिशत आयात करता है, और इसमें से करीब 90 प्रतिशत आपूर्ति मध्य-पूर्व से आती है। वर्ष 2025 में भारत ने लगभग 27 मिलियन टन प्राकृतिक गैस का आयात किया, जिसमें सबसे बड़ा हिस्सा कतर से आता है। कुल आयात का करीब 41 प्रतिशत, जबकि अमेरिका 19 प्रतिशत, यूएई 13 प्रतिशत, ओमान 7 प्रतिशत, नाइजीरिया 5 प्रतिशत और अन्य देशों का हिस्सा 15 प्रतिशत है।
इस निर्भरता की गंभीरता तब और बढ़ जाती है जब हम यह देखते हैं कि भारत में आयातित प्राकृतिक गैस का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा यूरिया (खाद) बनाने में इस्तेमाल होता है। यह निर्भरता रातो-रात ही नहीं बनी। इसके पीछे हमारी नीतियों का बड़ा हाथ रहा है।
यहां सबसे बड़ा सवाल उठता है, जब हमारे पास पर्याप्त रिफाइनिंग क्षमता है, तो हमें एलपीजी आयात करने की जरूरत क्यों पड़ती है? इसका जवाब कच्चे तेल की गुणवत्ता में छिपा है। एलपीजी का उत्पादन सबसे ज्यादा लाइट और स्वीट क्रूड ऑयल से होता है, जिसमें एलपीजी की हिस्सेदारी लगभग 3 से 5 प्रतिशत तक होती है। लेकिन भारत जो कच्चा तेल आयात करता है, उसमें केवल लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा ही लाइट क्रूड का होता है, क्योंकि यह अंतरराष्ट्रीय बाजार में महंगा होता है।
इसके उलट, भारत का लगभग 80 प्रतिशत आयात मीडियम से हेवी और सॉर क्रूड का होता है, जो सस्ता तो होता है, लेकिन उससे एलपीजी का उत्पादन अपेक्षाकृत कम होता है। फिर भी, यह बढ़ोतरी देश की कुल जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं होती। नतीजा यह हुआ कि खपत बढ़ती गई, आज देश में रोज़ करीब 60 लाख सिलेंडर इस्तेमाल होते हैं, लेकिन उत्पादन उसी अनुपात में नहीं बढ़ा। आज करीब 10 करोड़ परिवार अपने रोज़ के खाने के लिए आयातित ईंधन पर निर्भर हैं। यह स्थिति किसी भी मजबूत ऊर्जा सुरक्षा रणनीति के लिए सही नहीं मानी जा सकती।
विकल्प के तौर पर अमेरिका से एलपीजी लाई जा सकती है, लेकिन वहां से भारत तक पहुंचने में 45 दिन लगते हैं, जिसकी लागत होर्मुज स्ट्रेट के मुकाबले कई गुना महंगी पड़ती है। भारत के सामने ऊर्जा को लेकर दो चुनौतियां तेजी से बढ़ रही हैं। एक तरफ देश का तेल आयात बिल आने वाले समय में दोगुना होने की आशंका है, तो दूसरी तरफ गैस की सप्लाई को लेकर भी चिंता बढ़ गई है।
क्रूड ऑयल: बढ़ती निर्भरता, घटती आत्मनिर्भरता
भारत अपनी जरूरत का 85%–90% कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में एक “इमरजेंसी स्टॉक” होता है जिसे रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) कहते हैं, ताकि अगर कभी सप्लाई रुक जाए या युद्ध/संकट हो, तो देश कुछ समय तक अपने स्टॉक से काम चला सके।
सरकार ने इस वर्ष 2026–27 के बजट में इमरजेंसी स्टॉक के लिए रखा जाने वाला पैसा लगभग खत्म कर दिया। बजट 2025-26 के बजट में इस स्टॉक के लिए ₹850 करोड़ का फंड रखा था, जिसे इस वर्ष सिर्फ ₹0.01 करोड़ रखा गया। यह बताता है कि फिलहाल सरकार ने ऊर्जा सुरक्षा के विस्तार पर “पॉज़” लगा दिया है।
दूसरी तरफ, घरेलू क्रूड आयल का उत्पादन लगातार गिर रहा है। साल 2011-12 में जहां क्रूड आयल का उत्पादन 38 मिलियन टन था, वह 2023-24 में घटकर 29.4 मिलियन टन रह गया। यानी लगभग 23 प्रतिशत की कमी। इस गिरावट का सीधा असर देश की आत्मनिर्भरता पर पड़ा है। 2004 में भारत अपनी कुल खपत का करीब 27 प्रतिशत तेल खुद पैदा करता था, लेकिन आज यह आंकड़ा घटकर महज 13 प्रतिशत रह गया है।
यानी आत्मनिर्भरता 27% से गिरकर 13% पर आ गई। ओएनजीसी (सरकारी तेल कंपनी) , जो कभी कर्जमुक्त और मजबूत कंपनी थी, आज 78,000 करोड़ के कर्ज में है, जबकि 2014 में ओएनजीसी का नकद भंडार 13,000 करोड़ रुपये का था। सवाल उठता है हमने नए तेल खोजने (exploration) में क्या किया ? और ओएनजीसी का 78000 करोड़ कहां गया ? ये पैसा गया गुजरात स्टेट पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन के लगभग 26,000 करोड़ रुपये के डूबे हुए कर्ज़ और बंद पड़े निवेश को बट्टे खाते में, और मजबूरन एचपीसीएल की हिस्सेदारी खरीदने में, जिसमें 36,000 करोड़ रुपये सीधे केंद्र सरकार के बजट में चला गये।
नतीजा ये हुआ कि भारत कच्चे तेल के सोर्स खोजने में पिछड़ गया, और घरेलू कच्चे तेल का उत्पादन लगातार गिर रहा है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार, यदि इस क्षेत्र में बड़े निवेश नहीं किए गए, तो 2030 तक भारत का घरेलू उत्पादन घटकर लगभग 5.4 लाख बैरल प्रतिदिन रह सकता है। यह उस समय की अनुमानित कुल खपत का 8 प्रतिशत से भी कम होगा।
मोदी सरकार की जनता से लूट
मई 2014 में जब नरेंद्र मोदी ने देश की बागडोर संभाली, उस समय वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमत लगभग 107 डॉलर प्रति बैरल थी। भारत जैसे देश के लिए, जो अपनी जरूरत का करीब 85 प्रतिशत तेल आयात करता है, यह एक बड़ी आर्थिक चुनौती थी। यूपीए सरकार के समय पेट्रोल पर ₹9 और डीजल पर मात्र ₹3.50 प्रति लीटर एक्साइज ड्यूटी थी। आज भाजपा सरकार जनता से पेट्रोल पर ₹23 और डीजल पर ₹21 प्रति लीटर टैक्स वसूल रही है।
इसके बावजूद, उस दौर में आम लोगों पर इसका पूरा बोझ नहीं डाला गया। सरकार ने पेट्रोल की खुदरा कीमतों को करीब 72 रुपये प्रति लीटर से नीचे बनाए रखा। इसमें सरकार ने सीधे बजट से सब्सिडी दी, सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों को कुछ बोझ उठाने को कहा और तेल बांड जैसे विकल्पों का इस्तेमाल किया। इसका मकसद साफ था, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें चाहे जितनी भी ऊंची हों, आम आदमी पर उसका पूरा असर सीधे न पड़े।
लेकिन कुछ ही महीनों में वैश्विक परिस्थितियां बदलीं और कच्चे तेल की कीमतों में तेज गिरावट शुरू हो गई। जनवरी 2016 तक इंडियन बास्केट की कीमत घटकर लगभग 28 डॉलर प्रति बैरल रह गई। यानी करीब 74 प्रतिशत की ऐतिहासिक गिरावट। आर्थिक दृष्टिकोण से देखें तो यह भारत के लिए एक बड़ा अवसर था। उम्मीद की जा रही थी कि इस गिरावट का फायदा आम उपभोक्ताओं तक पहुंचेगा और पेट्रोल-डीजल की कीमतों में राहत मिलेगी, अफ़सोस ऐसा कुछ नहीं हुआ।
सरकार ने इस अवसर का लाभ लोगों को राहत देने के बजाय अपने राजस्व को बढ़ाने के लिए किया। पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क में भारी बढ़ोतरी की गई। पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी करीब 350 प्रतिशत और डीजल पर लगभग 380 प्रतिशत तक बढ़ा दी गई। लेकिन, कच्चा तेल सस्ता होने के बावजूद खुदरा कीमतों में कोई कमी नहीं की गई। कोविड-19 महामारी के दौरान भी ऐसा ही देखने को मिला। अप्रैल 2020 में जब कच्चे तेल की कीमतें 20 डॉलर प्रति बैरल से नीचे चली गईं, तब भी लोगों को राहत नहीं दी गई। इसके उलट, मई 2020 में सरकार ने एक ही दिन में पेट्रोल पर 10 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 13 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी कर दी।
इसका सीधा असर सरकारी राजस्व में देखने को मिला। साल 2020-21 में पेट्रोलियम उत्पादों से मिलने वाला उत्पाद शुल्क बढ़कर 3.71 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 69 प्रतिशत अधिक था।
आने वाले वर्षों में भी यह रुझान पूरी तरह बदला नहीं। अप्रैल 2025 में जब ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 63 डॉलर प्रति बैरल थी, तब भी पेट्रोल और डीजल पर 2 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई। यदि पूरे दशक पर एक नजर डालें, तो 2014-15 से 2025-26 के बीच पेट्रोलियम उत्पादों से कुल टैक्स कलेक्शन 67 लाख करोड़ रुपये से अधिक होने का अनुमान है। इसमें से लगभग 44 लाख करोड़ रुपये केंद्र सरकार के हिस्से में चले गए।
आज आयल मार्केटिंग कंपनियां 2014 के मुक़ाबले 500 से 800% ज़्यादा मुनाफे के पहाड़ पर बैठी हैं। यहीं से आज की बहस शुरू होती है, जब उस समय ऊंचे दामों के बावजूद राहत दी जा सकती थी, तो क्या आज सस्ते कच्चे तेल के दौर में भी वैसी राहत नहीं मिलनी चाहिए थी?
सबसे बड़ा खतरा किसानों पर
ऊर्जा संकट का सबसे बड़ा असर कृषि पर पड़ने वाला है। देश में बुवाई का सीजन आने वाला है और किसानों को बड़े पैमाने पर खाद की जरूरत पड़ने वाली है। लेकिन 10 मार्च तक जो स्टॉक हमारे पास है, वो आने वाले महीनों की जरूरत के मुकाबले काफी कम दिख रहा है। भारत अपनी यूरिया और जटिल उर्वरकों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। और इनमें से ज्यादातर सप्लाई सऊदी अरब, ओमान, कतर और यूएई जैसे पश्चिम एशियाई देशों से आती है। जो युद्धग्रस्त हैं।
सबसे बड़ी चिंता यूरिया को लेकर है। भारत 75% यूरिया, 32% डीएपी , 65% सल्फर आयात करता है। और इनका बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है। मौजूदा स्टॉक स्थिति की बात करें तो हालात और भी चिंताजनक हैं। हमारे पास अभी यूरिया स्टॉक लगभग 6.15 मिलियन टन है, जबकि पिछले बुवाई सीजन में 19.3 मिलियन टन यूरिया की खपत हुई थी (अप्रैल-सितंबर 2025). यही हाल डीएपी और एनपीके का भी है। पिछले साल खरीफ सीजन में हमने 4.6 मिलियन टन डीएपी की खपत की, जबकि अभी हमारे पास महज 2.51 मिलियन टन डीएपी उपलब्ध है। इसी तरह पिछले बुवाई सीजन में 8.1 मिलियन टन की खपत हुई थी, आज हमारे पास 5.63 मिलियन टन उपलब्ध है।
संयुक्त राष्ट्र की संस्था ‘यूएनसीटीएडी' के मुताबिक, हर महीने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते लगभग 13.3 लाख टन खाद का निर्यात किया जाता है। दुनिया भर में व्यापार होने वाली प्रमुख खादों, जैसे कि अमोनिया, फॉस्फेट और सल्फर का 20 फीसदी हिस्सा अकेले खाड़ी देशों से आता है। पिछले साल के आंकड़े देखें तो पता चलता है कि भारत ने 56.4 लाख टन यूरिया का आयात किया था। इसमें से 70 फीसदी आयात सिर्फ ओमान, सऊदी अरब, यूएई और बहरीन से किया गया था। डीएपी की बात करें तो पिछले साल सिर्फ सऊदी अरब ने ही भारत को 45.6 लाख टन डीएपी का निर्यात किया था, जो हमारे कुल आयात का करीब 41 फीसदी है फिलहाल ईरान युद्ध की वजह से इन क्षेत्रों से आयात आसान नहीं रहा है।
होर्मुज का रास्ता व्यापारिक जहाजों के लिए जितने लंबे समय तक बंद रहेगा, खाद की वैश्विक आपूर्ति उतनी ही ज्यादा ठप होने लगेगी। भारत पर इस संकट का गंभीर असर हो सकता है, क्योंकि यह अपनी जरूरत की दो-तिहाई नाइट्रोजन खाद के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर है। इसमें यूरिया का एक बड़ा हिस्सा शामिल है। खाद की कमी आने वाले मानसून में बुवाई पर असर डाल सकती है, जिससे चावल, गेहूं और अन्य मुख्य अनाजों की खेती की लागत बहुत बढ़ जाएगी। यह संकट ऐसे समय में पैदा हुआ है जब पहले से ही बाजार में खाद की कीमतें सप्लाई की कमी के कारण ऊंची चल रही थीं। अगर किसी वजह से बाहर से सप्लाई रुक गई, चाहे युद्ध हो, तनाव हो या ट्रांसपोर्ट में दिक्कत, तो इससे फ़ूड चेन में बाधा आएगी।
ऊर्जा संकट में बाकि देशों से क्यों मजबूत दिख रहा है चीन?
भारत समेत दुनिया में आज जिस युद्ध संकट की वजह से अच्छी से अच्छी अर्थव्यवस्थाएं लड़खड़ा चुकी हैं ऐसे में, चीन डटकर मुकाबला कर रहा है क्योंकि उसने वर्षों पहले से वैश्विक ऊर्जा संकट जैसी स्थिति के लिए तैयारी शुरू कर दी थी। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग लंबे समय से इस बात पर जोर देते रहे हैं कि देश की ऊर्जा आपूर्ति “अपने ही हाथों में” होनी चाहिए। 2021 में एक बड़े तेल क्षेत्र के दौरे के दौरान उन्होंने इसी दिशा में आत्मनिर्भरता की जरूरत पर बल दिया था। आज जब वैश्विक हालात तनावपूर्ण हैं, उनकी यह रणनीति काफी हद तक सही साबित होती दिख रही है।
दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक स्ट्रेज ऑफ़ हॉर्मुज़ लगभग बंद पड़ा है, और पूरे क्षेत्र में ऊर्जा ढांचे पर हमले हो रहे हैं। इसके चलते मध्य पूर्व से तेल निर्यात में हाल के हफ्तों में करीब 61 प्रतिशत की गिरावट आई है। एशिया के कई देश, जो अपनी जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से पूरा करते हैं, अब ऊर्जा बचाने और वैकल्पिक स्रोत खोजने की होड़ में हैं, लेकिन चीन की स्थिति बाकी एशियाई देशों से अलग दिखाई देती है। ऑक्सफोर्ड इंस्टीट्यूट फॉर एनर्जी स्टडीज की विशेषज्ञ मिशल मेदान के अनुसार, चीन के ऊर्जा तंत्र में “मजबूत सुरक्षा कवच” मौजूद हैं। इसमें विशाल तेल और LNG भंडार, घरेलू उत्पादन और पवन व सौर जैसे वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत शामिल हैं।
हालांकि चीन भी आमतौर पर अपने कच्चे तेल का लगभग आधा हिस्सा मध्य पूर्व से आयात करता है, लेकिन उसकी निर्भरता जापान, भारत या दक्षिण कोरिया जैसे देशों की तुलना में कम है। उदाहरण के लिए, जापान अपनी लगभग 95 प्रतिशत तेल जरूरतें इसी क्षेत्र से पूरी करता है। संघर्ष के बावजूद, ईरान से चीन को तेल की आपूर्ति जारी है। आंकड़ों के अनुसार, फरवरी में जहां चीन ने ईरान से 1.57 मिलियन बैरल प्रतिदिन तेल आयात किया, वहीं मार्च में यह थोड़ा घटकर 1.47 मिलियन बैरल प्रतिदिन रह गया, यानी गिरावट बहुत मामूली है।
चीन की सरकारी कंपनियों के जहाज भी इस संकट के बीच वैकल्पिक रास्तों से तेल लाने में जुटे हैं। उदाहरण के तौर पर, “काई जिंग” नामक एक सुपरटैंकर ने हाल ही में अपना रास्ता बदलकर लाल सागर के एक बंदरगाह से सऊदी तेल उठाया और अप्रैल की शुरुआत में चीन पहुंचने वाला है।
अगर बाहरी आपूर्ति में बड़ी बाधा आती भी है, तो चीन ने इसके लिए पहले से ही बड़ा भंडार तैयार कर रखा है। भले ही चीन अपने आधिकारिक भंडार का आंकड़ा सार्वजनिक नहीं करता, लेकिन अनुमान है कि उसके पास करीब 1.4 अरब बैरल तेल का स्टॉक मौजूद है। युद्ध शुरू होने के बाद, चीन ने अपने रिफाइनरियों को निर्यात रोकने के निर्देश भी दिए, ताकि घरेलू जरूरतें पहले पूरी की जा सकें। चीन रोज़ाना लगभग 14–15 मिलियन बैरल तेल इस्तेमाल करता है। इस हिसाब से देखें तो अगर चीन तेल का आयात बंद कर दे तो चीन करीब 3 महीने तक अपने स्टॉक के सहारे काम चला सकता है।
इसके साथ ही चीन ने जीवाश्म ईंधन पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए भी बड़े कदम उठाए हैं। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार, चीन में हर साल जितने इलेक्ट्रिक और हाइब्रिड वाहन बिकते हैं, वह दुनिया के बाकी हिस्सों से भी ज्यादा हैं। वहीं, पवन, सौर और जल ऊर्जा का हिस्सा भी तेजी से बढ़ा है, 2024 में इनसे चीन की लगभग 31 प्रतिशत बिजली बनी।
कुल मिलाकर, चीन इस वैश्विक ऊर्जा संकट से निपटने के लिए कई देशों की तुलना में बेहतर स्थिति में है।
(लेखक पब्लिक पॉलिसी रिसर्चर हैं।)




