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इतनी असंवेदनशील सरकार इस देश ने पहले कभी नहीं देखी ..

माननीय सर्वोच्च न्यायालय की बार बार फटकार और आदेश के बाद सरकार सभी को टीका लगाने पर सहमत हुई है और टीका लगाने वाले लोगों को सर्टिफिकेट दिया जा रहा है ..

इतनी असंवेदनशील सरकार इस देश ने पहले कभी नहीं देखी ..
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फोटो : प्रतीकात्मक

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चाहे जनता कितनी भी तकलीफ में हो और सरकार के संज्ञान में लाने के लिये कुछ भी कहे या करे लेकिन असंवेदनशीलता से लबालब सरकार उन मुद्दों पर ध्यान नहीं देती है और अपनी मनमानी करती है I उनकी मनमानी में बौध्दिक रूप से बीमार लोगों का भी बहुत बड़ा योगदान है I वह लोग दो रुपये में इस असंवेदनशील सरकार के पक्ष में व्हाट्सएप यूनिवर्सिटीज पर संस्कारहीन, शिष्टाचारहीन, असभ्य और अभद्र अंधभक्त संदेश भेजते हैं।

सरकार से शोषित जनता और बुद्धिजीवी चाहे नोट बन्दी पर विचार विमर्श करने के लिए कुछ कहे, त्रुटिपूर्ण जी एस टी को लागू करने की बात पर पुनर्विचार और इसमें सुधार करने के लिये कहे, यह जड़त्व सरकार के रूख में कोई बदलाव कर ने के लिए तैयार नहीं होती।

बीते सात वर्षों में रोज़गार के लिए दर दर की ठोकरें खाते युवा पीढ़ी की कोई भी सुनवाई नहीं हो रही है I जानबूझकर बार बार लगातार पेपर लीक का मामला हो, नियुक्ति रद्द करने अथवा परीक्षाफल घोषित कर न करने का मामला हो, सरकार अपनी हठधर्मिता से टस से मस नहीं हो रही है I सरकार ने करोडों रुपये असहाय और निर्धन बेरोजगार युवाओं से नौकरी के नाम पर एकत्रित किए हैं I हर बर्ष युवाओं को दो करोड़ नौकरी का वायदा किया लेकिन नौकरी देने के बजाय बारह करोड़ लोगों को बेरोजगार कर दिया है I बेरोजगार युवा और युवतियां नौकरी के स्थान पर लाठियां खा रहे हैं I उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा है I बेरोजगार युवा और युवतियां आंदोलनरत हैं, धरना प्रदर्शन कर रहे हैं, 'महंगाई दिवस', फेंकू दिवस, जुमला दिवस आदि नामों से मना रहे हैं लेकिन असंवेदनशील, जड़त्व, एहसास विहीन, निर्दयी सरकार पर रत्तीभर फ़र्क नहीं पड़ा है I

हमारे अन्नदाता किसान अपने परिवार के साथ पिछले करीब 10 माह से तीन काले कृषि कानूनों के कारण आंदोलनरत हैं I दिल्ली की सीमाओं पर बैठे हुए हैं, किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य (अधिकतम नहीं) की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हैं I कड़कती ठण्ड, तपती गर्मी और घनघोर बरसात में भी हमारे अन्नदाता सड़क पर टेंट, तंबू आदि अस्थायी निवास में रह रहे हैं I हवाओं के थपेड़े खा रहे हैं I धूल मिट्टी में मिला हुआ खाना खाने को मजबूर हैं I सैकड़ों किसान शहीद हो चुके हैं लेकिन यह असंवेदनशील, निर्दयी और जिद्दी स्वभाव की सरकार अपने उद्योग पति दोस्तों की दलाली के कारण किसानों की बलि और उनको बर्बाद करने पर तुली हुई है I यह किसान विरोधी सरकार है I जिनके परिवार के सदस्य सेनाओं में भर्ती होकर देश की सीमाओं की रक्षा कर रहा हो और खुद देशवासियों के पालन पोषण और पेट भरने के लिये अन्न पैदा कर रहा हो उसे सत्तारूढ़ पार्टी देशद्रोही, खालिस्तानी आदि नामों से संबोधित कर उनका अपमान कर रही है I किसानों को पुलिस के भेष में गुंडों और असामाजिक तत्वों की मदद से हमले कर उनके सर फोड़ रही है, घायल कर रही है I सत्तारूढ़ पार्टी की केंद्रीय सरकार ने किसानों के रास्ते में कीलें ठुकाई हैं I उनके रास्तों को खोदकर अवरुद्ध किया गया है, कड़कती ठण्डी में भी पानी की बौछारों से इनको चोटिल किया है I पता नहीं अपने उद्योग पति दोस्तों की दलाली को छोड़कर किसानों के हितों की बात कर रक्षा करेगी!

जान-बूझकर कोरोना कुप्रबंधन के लिए यह सरकार जानी जाती है I कोरोना को लेकर वर्तमान सरकार की कोई स्पष्ट नीति नहीं रही और ना ही उसकी रोकथाम को लेकर सम्वेदनशील कदम नहीं उठाया इससे लाखों लोगों को असीम पीड़ा का सामना करना पड़ा I

कोरोना के कारण अनगिनत, आसामान्य मौतें हुईं जिन्हें सम्मानपूर्वक अंतिम विदाई भी नहीं दी जा सकी, शव गंगा में बहते रहे, कुत्ते और जंगली जानवरों ने उनके शव को क्षति पहुंचायी और बहुत सारे लोगों को गंगा नदी के किनारे रेत में दवा दिया गया

कोरोना वायरस के कारण सामान्य स्थिति नहीं थी I

जनता कर्फ्यू लगा दिया गया और ताली, थाली, घण्टा और शंख बजाने का आदेश जारी हो गया।

कोरोना वायरस के प्रभाव को रोकने और इसे निस्प्रभाव करने के लिये राष्ट्रिय ताला-बन्दी की घोषणा हो चुकी थी इस तरह जो अपना पहले से निर्धारित तिथि में आरिक्षित टिकट से अपने आने जाने की सम्भावना और अधिकार खत्म कर चुके थे।

उपरोक्त आदेशों ने जन-मानस का घण्टा बजा दिया और उनको बन्दी बना दिया। ताला-बन्दी के लगातार अगले आदेशों में ताला-बन्दी के साथ साथ दीपक, मोमबत्ती, टोर्च, और अन्य प्रकार के प्रकाश करने वाली चीजों का इस्तेमाल करने के आदेश भी जारी हुए और लम्बे समय तक एक ही स्थान पर रहना सुनिश्चित कर दिया।

भारत देश की सम्पूर्ण जनता ने बडे हर्षो उल्हास, झुण्ड और जुलुस के साथ अपने घर की छतों, बालकोनीयों गली, मौहल्लों और सड़कों पर ताली थाली घण्टा और शंख बजा कर और दीपक, मोमबत्ती, टोर्च आदि जला कर और अधिकारी गणों ने भी कहीँ कहीँ जुलुस के रूप में शामिल होकर अपने कर्त्तव्य परायणता का सबूत देते हुए कोरोना वायरस को रोकने और खत्म करने के लिये सरकार का साथ दिया।

परन्तु कोरोना वायरस को रोकने और इसे खत्म करने के परिणाम लौकडाउन के लागू करने के बाद अपेक्षित परिणाम जो लौकडाउन लागू करते समय बक्त बताया था, उसके अनुरूप नहीं आये। ऐसा करने से लौकडाउन के बाद भी अपेक्षित परिणाम की उम्मीद करना भी गलत था। क्योंकि टोटका और तान्त्रिक तरीके अपनाने से कोरोना वायरस न तो रुकेगा और न ही छुटकारा पाया जा सकता है।

अपेक्षा के अनुरूप परिणाम पाने के लिये वैज्ञानिक दृष्टिकोण, इस विषय और सम्बन्धित विशेषज्ञयों द्वारा निर्मित रणनीति और उस पर अमल कर ने की जरूरत थी और है।

इन सबका का अभाव दिखा और अवैज्ञानिक तरीका अपनाते हुए नजर आये।

केरल सरकार द्वारा अपनायी गई रणनीति (Tracing, Tracking, Isolation, Testing and Treatment) और अन्य जगहों पर भी अपनाये गये तरीकों (Sanitization) पर भी जहां से अच्छे परिणाम मिले, को अपनाये जाने की जरूरत थी लेकिन देश की सरकार को यह सब मंजूर नहीं था। परिणाम सभी के सामने हैं और अपनी कहानी ख़ुद कह रहे हैं।

बगैर सोच विचार के, अनुचित और असमय लौकडाउन लागू करने, सही रणनीति नहीं अपनाने और अतिरिक्त्त सावधानी नहीं लेने के कारण जो कुछ दुश्परिणाम निकले वो भी हमारे सामने हैं।

अर्थव्यस्था चरमरा गई और बहुत ही नाजुक दौर से गुजर रही है और विकास दर शायद दशक के न्यूनतम स्तर और Moody's, Cresil और अन्य क्रेडिट रेटिंग ऐजेन्सीज के आंकलन ने भी भारत की अर्थव्यस्था को निगेटिव श्रेणी में रखा है।

इस लौक डाउन ने जिसे सबसे ज्यादा सताये और प्रताड़ित किये गये वह हैं भारत के गरीब और मजदूर। गरीब और मजदूर स्वतन्त्र भारत देश में अब तक के कठिनतम दौर से गुजर रहे हैं। इस दौर में मजबूर मजदूर असीम पीडा, भूखे, प्यासे, धूप में नंगे पैर पैदल चल कर अपने अपने बच्चों और बुजर्गों के साथ पैतृक गांव की ओर कूंच कर घर पहुँचे। सैकडों लोगों ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया। आप लोगों ने भी उनको रोड़ पर चलते देखा होगा।

लौक डाउन लगाने से पहले मजदूरों और अन्य प्रवासीयों को योजना बद्ध तरीके से उनके घर भेजने की प्रक्रिया पर कार्य किया जाता तो वह लोग भूख प्यास से नहीं तडफते और लाइनों में लगकर अथवा अकेले ही परिवार के साथ मांग कर खाने की घृह्णित और लज्जित करने वाली परिस्थितियों, दुर्दशा, असीम पीडा और पुलिस के बेरहम और संवेदनहीन प्रहारों और बेइज्जती से बच जाते।

पुलिस प्रसासन ने एअरपोर्ट पर अपनी शक्ति का प्रदर्शन नहीं किया और अमीरों के लिए अतिरिक्त संवेदनशीलता दिखाई वहीं मजदूरों के मामले में अपनी शक्ति का क्रूरता की हद तक प्रदर्शन किया और संवेदनशीलता और गरीबों के प्रति एहसास का नाम मात्र का भी परिचय नहीं दिया। मजदूर इस कटु अनुभव को भुला नहीं पायेंगे।

माननीय सर्वोच्च न्यायालय की बार बार फटकार और आदेश के बाद सरकार सभी को टीका लगाने पर सहमत हुई है और टीका लगाने वाले लोगों को सर्टिफिकेट दिया जा रहा है उसमें भी एक ऐसा चेहरा लगा है जो अनावश्यक और अवांछित है और इसी के विदेशों में यात्रा करने वाले लोग शर्मिंदगी उठा रहे हैं I

कोरोना वायरस का दंश लम्बे समय तक झेलना पड़ेगा I मंहगाई अपने चरम पर है I पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में बेशुमार बढ़ोतरी हुई है और सौ रुपये के ऊपर है I रसोई गैस की कीमतें भी एक हजार के करीब है I खाने का तेल भी दो सौ रुपए के आसपास है I

सरकार इन आवश्यक वस्तुओं की कीमतों को लेकर सम्वेदना का परिचय नहीं दे रही है और इनकी कीमतों को कम करने का कोई भी सार्थक प्रयास नहीं कर रही है I गरीब नागरिकों को अपने हाल पर छोड़ दिया है I

कांग्रेश पार्टी का यह कथन अक्षरशः सत्य है कि 'जब प्रधानमंत्री मोदी की उपलब्धियों पर नज़र डालते हैं तो बीते सात वर्षों में रोज़गार के लिए दर दर की ठोकरें खाते युवा, शोषित किसान, बंद उद्योग, ऑक्सीजन के बिना तड़प तड़प कर दम तोड़ते लोग, महंगाई से जूझती जनता, गैस छोड़ चूल्हा फूंकती महिलाएं, बड़े सरकारी उपक्रमों की बिक्री, भाजपा के सहयोगी संगठन बनी ईडी, सीबीआई एवं आयकर विभाग और कुछ ख़ास चिर परिचित बड़े पूंजीपतियों के चेहरे ही आंखों के सामने आते हैं।''

Desk Editor
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