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जब जहाज़ थरथराया, जयपुर का भाषण याद आया, रवीश कुमार का लेख हुआ वायरल

जब जहाज़ थरथराया, जयपुर का भाषण याद आया, रवीश कुमार का लेख हुआ वायरल
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दिल्ली से जब विमान उड़ा तो सब ठीक ही था। उड़ान भरने से पहले एक घोषणा होती है। इसे प्रमोशन कहेंगे या घोषणा मैं नोट कर रहा हूँ। कहा जाता है कि प्रधानमंत्री परीक्षा पर चर्चा करेंगे। उसे सुनकर जीवन मूल्यों का लाभ उठाएँ। इसके बाद सीट बेल्ट बांध लेने का एलान होता है तो लगा कि अब शाहरूख ख़ान की आवाज़ आएगी कि सीट बेल्ट बांध लें। जहाज़ उड़ता है और आराम से सफ़र तय कर रहा है। मेरे बग़ल में दो महिलाएँ बैठी हैं। मैं आयल सीट पर हूँ। कोई किसी से बात नहीं कर रहा है। खाने-पीने के बाद फिर से सवाल सामने आ गया कि अब ये घोषणा है या प्रमोशन!

दो कप कॉफी पी चुका हूँ। दूसरी कॉफी माँग कर ली है। बीच हवा में जहाज़ थरथरा रहा है लेकिन स्थिर भी हो जा रहा है। आशंकाएँ ग़लत साबित हो रही हैं। सर के बालों ने सर छोड़ने का इरादा बदल दिया है। तभी विमान परिचालिका मेरे हाथ में एक पैकेट थमा देती हैं। इस पैकेट पर बालों को मज़बूत करने के दावे लिखे हैं। मुझे लगा कि वह मेरे कमजोर बालों को भाँप चुकी है। शक करने की आदत ने सवाल तैयार कर दिया। मुझे क्यों दिया मैम, मेरे बालों को देखकर ? उसकी हँसी छूट गई और कहा कि प्रमोशन है। तब जान गया कि परीक्षा पर चर्चा सुनने की घोषणा हुई थी। प्रधानमंत्री को प्रमोशन की जरूरत नहीं है।

जहाज़ फिर काँपने लगा है। मैं पैकेट पर लिखे निर्देशों को पढ़ने लगा हूँ। लिखा है कि शैम्पू बार में शिकाकाई, रीठा, आँवला और करी पत्ता मिलाया गया है। इससे बाल मज़बूत होते हैं। बालों का घनत्व बढ़ता है। बालों को लेकर सपने में खोने ही वाला था कि अब मेरे बालों को शिकाकाई और आँवला का सहारा मिल गया है, उन्हें कोई भी ताक़त गिरने नहीं देगी तभी जहाज़ ज़ोर-ज़ोर से काँपने लगता है।

लगता है शैम्पू बार के प्रमोशन की टाइमिंग सही नहीं थी। हाथ में आते ही जहाज़ थरथराने लगा और मेरा मन घबराहटों से भर गया। बाल की चिन्ता बालों में खो गई है। खिड़की वाली सीट पर बैठी महिला ने खिड़की बंद कर दी है। वह काफ़ी घबरा गई हैं। बिल्कुल मेरी तरह। अभी तक वह चुप थीं लेकिन जहाज़ के काँपते ही वह बीच की सीट पर बैठी एक महिला से बात करने लगी हैं। जल्दी-जल्दी काफ़ी कुछ बोल रही हैं। अकेले यात्रा के डर से लेकर परिवार के सदस्यों को याद करने लगीं। बीच की सीट पर बैठी महिला उनकी बातों को सुनने लगी हैं। वे काफ़ी स्थिर लग रही हैं।दूसरे का डर सँभालने में अपना डर भूल गई हैं। यह भी हो सकता है कि वह दूसरे की बात सुनकर अपने डर से उबर रही हो।

लेकिन जहाज़ और अधिक थरथराने लगा है। ये लाइव नोट्स हैं। मेरी सीट से दो क़तार पीछे की सीट पर मेरी जीवनसाथी बैठी हैं। पत्नी। नाम भी है मगर अभी नाम नहीं उनका चेहरा याद आ रहा है। मुझे उनकी चिन्ता हो रही है कि साथ नहीं हूँ। कई चीजें याद आ रही हैं। यह भी कि वह मेरी चिन्ता कर रही होगी, उसे मेरे इस डर के बारे में पता है। बेटियों ने मुझे नहीं पुकारा है। बहादुर हैं !

अब मैं गहरी साँस लेने लगता हूँ और लिखता जा रहा हूँ। मेरी घबराहट अब संभल रही है मगर जहाज़ और काँपता जा रहा है। बग़ल की सीट पर दो अनजान महिलाओं में रिश्ता बन चुका है। दोनों ने आपस में बातें कर ख़ुद को सँभाल लिया है।

मैं डर तो रहा हूँ लेकिन उसे सार्वजनिक नहीं कर पा रहा हूँ। कैसे कहता कि मैम मैं भी डर रहा हूँ। मुझसे भी बात कीजिए। कमबख्त इसी बीच जयपुर वाला भाषण याद आने लगा है। सोच रहा हूँ कि कहीं दोनों महिलाओं ने मेरा भाषण तो नहीं सुना होगा। तब तो इनके सामने डरता हुआ दिख गया तो भाषण की क्या अहमियत रह जाएगी। शनिवार को जयपुर में जब डरने और डर से उबरने पर भाषण दे रहा था तब कितनी भीड़ जुटी थी। लोग ताली बजा रहे थे। यहाँ तो विमान में सब सहमे हुए हैं। केवल काँपने की आवाज़ आ रही है। तालियाँ ग़ायब हैं।

बीच की सीट पर बैठी महिला शानदार हैं। संकट में किसी का किरदार दिखता है। उन्होंने खिड़की पर बैठी महिला को सँभाल लिया है। उनका हौसला बढ़ा रही है। लेकिन मुझे भी उनकी ज़रूरत महसूस हो रही है। मैं भी तो साथ यात्रा कर रहा हूं। जब एक स्त्री अनजान स्त्री से जुड़ सकती हैं तो वहीं स्त्री एक अनजान पुरुष से क्यों नहीं? मेरे ख़्याल से यह पुरुषों की घोर नाकामी है। क्या अब कह दूँ कि मुझसे ऐसी भी क्या दुश्मनी है। मैं भी डर रहा हूँ। हौसले की ज़रूरत तो मुझे भी है। शनिवार का वह भाषण चुभने लगा है। कुछ हुआ तो लोग बहस करेंगे कि रवीश को डर लगा होगा या नहीं। क्या वह अपने डर को जीत चुका होगा? इस सवाल का जवाब हाँ में देने वाले नहीं होंगे जो हर परीक्षा के बाद अगली परीक्षा की तैयारी ठीक से करने की क़समें खाते हैं।

जयपुर के भाषण की क़सम खाकर मैं नहीं डरने का अभ्यास करने लगा हूँ। मेरा डर कम हो रहा है लेकिन जहाज़ का काँपना कम नहीं हो रहा। खुद को याद दिला रहा हूं कि नहीं डरना है मगर बार-बार यही याद आ रहा है कि जब पूरा जहाज़ ही काँप रहा है तो किसे फ़र्क़ पड़ता है कि मैं काँप रहा हूँ या नहीं। पूरे जहाज़ पर ख़तरा है , डरने वाला और नहीं डरने वाला दोनों इसकी गिरफ़्त में हैं।

आज के भारत में जिसे डर नहीं लगता है वह भी उसी जहाज़ में सफ़र कर रहा है, जिसमें डरने वाले उड़ान भर रहे हैं। यही सब लिख रहा हूँ और लिखते- लिखते हम ख़राब मौसम के भँवर को पार कर चुके हैं। जहाज़ ने काँपना बंद कर दिया है। पायलट ने घोषणा कर दी है कि हम सात हज़ार फ़ीट की ऊँचाई पर हैं और बंगलुरू दो सौ किलोमीटर दूर है।

विमान लैंड होते ही तीनों यात्रियों के बीच डर को लेकर बात होती हैं। जिन्हें मैंने डरा हुआ समझा, उन्होंने कहा कि नहीं मुझे डर नहीं लगा। तो क्या मैं अपना डर लिखने लगा था?

नोट- कृपया मुझसे संपर्क न करें। मैं नितांत निजी यात्रा पर बंगलुरू आया हूँ। उम्मीद है आप मेरी विनती का सम्मान करेंगे। आपका आभार।

रवीश कुमार

About author
रविश कुमार :पांच दिसम्बर 1974 को जन्में एक भारतीय टीवी एंकर,लेखक और पत्रकार है.जो भारतीय राजनीति और समाज से संबंधित विषयों को व्याप्ति किया है। उन्होंने एनडीटीवी इंडिया पर वरिष्ठ कार्यकारी संपादक है, हिंदी समाचार चैनल एनडीटीवी समाचार नेटवर्क और होस्ट्स के चैनल के प्रमुख कार्य दिवस सहित कार्यक्रमों की एक संख्या के प्राइम टाइम शो,हम लोग और रविश की रिपोर्ट को देखते है. २०१४ लोकसभा चुनाव के दौरान, उन्होंने राय और उप-शहरी और ग्रामीण जीवन के पहलुओं जो टेलीविजन-आधारित नेटवर्क खबर में ज्यादा ध्यान प्राप्त नहीं करते हैं पर प्रकाश डाला जमीन पर लोगों की जरूरतों के बारे में कई उत्तर भारतीय राज्यों में व्यापक क्षेत्र साक्षात्कार किया था।वह बिहार के पूर्व चंपारन जिले के मोतीहारी में हुआ। वह लोयोला हाई स्कूल, पटना, पर अध्ययन किया और पर बाद में उन्होंने अपने उच्च अध्ययन के लिए करने के लिए दिल्ली ले जाया गया। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक उपाधि प्राप्त की और भारतीय जन संचार संस्थान से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा प्राप्त किया।
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