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क्यों आज भी संघ अस्तित्व में बना हुआ है?

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आरएसएस पर लगाम लगाई जा सकती है। लेकिन उसके लिए भारत के पूजीपतियों की ताकत को कमजोर करना होगा जो संघ की शक्ति का असली स्रोत हैं।

क्यों आज भी संघ अस्तित्व में बना हुआ है?

1947 से पहले अंग्रेज आरएसएस को बढ़ावा देते रहे । 1947 के बाद बिरला, टाटा और वाडिया ने संघ-जनसंघ को जिलाए रक्खा। वाडिया आरएसएस को सबसे ज्यादा चंदा देते थे।

नेहरू ने हिंदुस्तानी पूंजीपतियों और आरएसएस दोनों की नकेल कस कर रक्खी। नेहरू यह अच्छी तरह जानते थे कि दक्षिणपंथी ताक़तों को ज़िंदा रखने के लिये 'निजी पूंजी-ओन्मुख' अर्थव्यवस्था आव्यशक है। इसीलिये, नेहरू ने विकास के लिये, 'निजी पूंजी-ओन्मुख' अर्थव्यवस्था कायम नही की।

नेहरू ने Left-of-Center, नरम वामपंथी, 'राजकीय पूंजीवाद' का रास्ता अख्तियार किया, जिसमे निजी पूंजीपति गौण थे, और तमाम आर्थिक गतिविधियां, राज्य के आधीन थीं। इसको 'मिश्रित अर्थव्यवस्था' भी कहा गया।

नेहरू के दौर मे सीधा फंडा था: अगर पूंजीपतियों की भूमिका अर्थनीती मे कम रहेगी, तो राजनैतिक छेत्र में दक्षिणपंथी ताकतें अपनी औकात में रहेगीं!

नेहरू की राजनैतिक अर्थशास्त्र (political economy) के बदौलत, RSS जैसी ताक़तें देश की राजनीति में हाशिए पर रही ।

इंदिरा गांधी को भी इस बात का अहसास था बड़े पूंजीपति घराने कांग्रेस के भीतर और बाहर मौजूद दक्षिणपंथियों का पोषण करेंगे। यही कारण था कि उन्होनें बैंकों का राष्ट्रीयकरण एवं अन्य कदम उठाए।

क्या कारण है कि मनमोहन-राव के आर्थिक सुधारों के बाद ही भाजपा का ग्राफ तेजी से ऊपर चढ़ा ?

इसका जवाब है इन सुधारों ने भारत की अर्थव्यवस्था में देश के पूंजीपति घरानों को बेहद ताक़तवर बना दिया।

निरंतर सुदृढ़ होते आर्थिक आधार के कारण पूंजीपति घराने अपने स्वाभाविक हमख्याल दक्षिणपंथी ताकतों की और झुकने लगे।

इस प्रकार आर्थिक सुधारों का सीधा फायदा आरएसएस को मिला ।

मग़र पूंजीपति घरानों की भूख इससे शांत नही हुई । एक दौर के बाद, मनमोहन सिंह उनके किसी काम के न रहे । अब उन्हें मनमोहन या आडवाणी नही बल्कि मोदी जैसा व्यक्ति चाहिए था। इसके लिए उन्होंने आडवाणी को लात मारकर मोदी की तरफ कदम बढ़ाए।

अब पूंजीपति घराने पूरे पांच साल तक बेरोकटोक दोनों हाथों से देश की अर्थव्यवस्था को लूटना चाहते थे।

पूंजीपति घराने यह अच्छी तरह से जानते थे कि मोदीराज में संस्थाओं का सिलसिलेवार का खात्मा किया जाएगा, भीड़ की हिंसा चरम पर होगी और देश टुकड़े - टुकड़े हो जाएगा। और यही सब वे चाहते भी थे क्योंकि बेतहाशा पूंजी इकट्ठा करने का रास्ता यहीं से होकर गुजरना था।

दलित राजनीति और अम्बेडकरवादियों की सीमाएं !

दलित राजनीति और अम्बेडकरवादी वर्तमान परिस्थिति का सामना कैसे करें ?

अम्बेडकरवादियों के पास इस बारे में कोई स्पष्ट पालिसी नही है कि हिंदुस्तानी पूजीपतियों के प्रति उनका रवैया क्या हो।

आर्थिक छेत्र में दक्षिणपंथी रुझान को कैसे नियंत्रण में रक्खा जाए इसके बारे में भी उनके पास कोई प्लान नही है। इसके अभाव में राजनीति में भी दक्षिणपंथ के दखल को रोकने में वे असमर्थ हैं ।

आरएसएस विरोधी लिबरलों की सीमाएं!

यहाँ फेसबुक पर सुधीजनों की एक बड़ी संख्या मौजूद है। लेकिन उनमेँ से अधिकांश आरएसएस और फ़ासिस्टों का पृष्ठपोषण करने वाली ताकतों के बारे में अनजान हैं। उनमें से अधिकांश यह भी नहीं जानते कि आरएसएस और फासीवाद भारतीय पूंजीपति घरानों के स्वाभाविक राजनीतिक मित्र हैं।

इसीलिए वे अंधेरे में लाठियां भांजते रहते हैं ।

2019 में भाजपा की हार की कल्पना को लेकर, आप बहुत सारी उम्मीद जगाते हैं।

मगर जब तक मोदीराज में फल-फूल रहे पूंजीपति घरानों पर वार करने के लिए आपके पास कोई वैकल्पिक आर्थिक नीति नही होगी, तब तक आप वह बदलाव नहीं ला सकते जिसका आप सपना देख रहे हैं ।

राफेल घोटाले की जांच और कुछेक नीरव मोदी को जेल भेजना काफी नही है।

आरएसएस से लड़ने के लिए आपको भारतीय अर्थव्यवस्था पर अम्बानी, अडानी और टाटा जैसे पूंजीपति घरानों के वर्चस्व को तोड़ना होगा !

शायद राहुल गांधी एक अकेले ऐसे शख्स हैं जो दक्षिणपंथ और पूंजीवाद के गठजोड़ को समझ रहे हैं और इसलिए वह लगातार इन पूजीपति घरानों और बड़े उद्योगपतियों पर हमले कर रहे हैं।

मेरी बात लिखकर रख लें--2019 में भाजपा की हार के बाद भारत या तो एक नए किस्म की अर्थव्यवस्था से रूबरू होगा या फिर दक्षिणपंथ पूरी ताकत के साथ पलटवार करेगा और आरएसएस व मोदी जैसी ताकतें पुनः सत्ता पर क़ाबिज़ हो जाएंगी।

इसके अलावा कोई और तीसरी संभावना नज़र नहीं आती .

लेखक वरिष्ठ पत्रकार अमरेश मिश्र है. यह उनके अपने विचार है.

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