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सुभद्रा कुमारी चौहान की रचनाओं में स्त्री-विमर्श व राष्ट्र प्रेम

सुभद्रा कुमारी चौहान आजादी से पहले स्त्री-विमर्श से जुड़ी कहानियां लिखने वाली पहली हिन्दी कवियत्री व साहित्यकार हैं

सुभद्रा कुमारी चौहान की रचनाओं में स्त्री-विमर्श व राष्ट्र प्रेम
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सुभद्रा कुमारी चौहान हिन्दी साहित्य की वह महान कवयित्री और कहानीकार हैं जिनका जन्म 1904 में प्रयागराज के निकट निहालपुर गांव में हुआ था। उनका परिवार रूूढ़िवादी सोच रखता था। छुआछूत उनके परिवार में आचरण सहिता का एक हिस्सा थी और कठोर प्रथा का भी रिवाज था।

15 वर्ष की छोटी आयु में ही उनका विवाह ठाकुर लक्ष्मण सिंह से कर दिया गया था, जो जबलपुर मे रहते थे‌‌ तथा असहयोग आन्दोलन से भी जुड़े थे। बाद मेें सुभद्रा कुमारी चौहान खुद भी महात्मा गांधी के आंदोलन से जुड गई थी।

सुभद्रा कुमारी चौहान को बचपन से ही साहित्य से लगाव था तथा इनकी पहली कविता मात्र 9वर्ष की आयु में प्रकाशित हुई थी। सुभद्रा कुमारी चौहान की रचनाओं में राष्ट्र प्रेम और स्त्री- विमर्श का समावेश है। सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता "झाँसी की रानी" तथा "सभा का खेल" आदि कविताएं राष्ट्र प्रेम से ओतप्रोत हैं।

सुभद्रा कुमारी चौहान आजादी से पहले स्त्री-विमर्श से जुड़ी कहानियां लिखने वाली पहली हिन्दी कवियत्री व साहित्यकार हैं। सामाजिक रूढियों और विसंगतियो को लेकर गहरा क्षोभ उनकी रचनाओं में व्याप्त है। स्त्री स्वतंत्रता की बातेंं, उन्होंने बहुत स्पष्टता और दृढता के साथ अपनी कहानियों में रेखांकित की हैं।

सुभद्रा जी की कहानी तीन बच्चे, पुरूष अत्याचार से मुक्ति की कहानी, कल्याणी, मछुए की बेटी तथा कैलासी नानी आदि कहानियां नारी केन्द्रित कहानी व दृष्टिकोण कहानी स्त्री स्वतंत्रता पर आधारित हैं। इसके अलावा भी सुभद्रा जी ने भग्नावशेष होली, पापीपेट, मछली रानी, परिवर्तन, कदम्ब के फूल, किस्मत, एकादशी, आहुति, थाती, अमराई, ग्रामीणा नारी, हृदय, वेश्या की लड़की आदि भी कहानियां लिखी हैं।

सुभद्रा जी ने अपनी कहानियों में वही कुछ लिखा है जो उन्होंने समाज में या अपने आस पड़़ोस मेें खुद देखा । प्रेमचन्द, माखनलाल चतुर्वेदी व अन्य लेखकों से प्रभावित सुभद्रा जी की देशप्रेम की रचनाएं, जहाँ राष्ट्र प्रेम के लिए प्रेरित करती हैं। वहीं स्त्री-वमर्श से सम्बंधित कहानियां समाज में पाई जाने वाली कुरीतियों, स्त्रियों पर लगाये जाने वाले बँधनों, बहुओं और अन्य महिलाओं पर होने वाले अत्याचार को समाप्त करने के लिए समाज मेें जागरूकता लाती है।

सुभद्रा जी के राजनीतिक सिद्धांत, अहिंसा, असहयोग आंदोलन और असांप्रदायिकता , गांधीवादी दर्शन पर आधारित रहे हैं। कविता संकलन, मुकुल और कथा संग्रह, बिखरे मोती सुभद्रा जी‌ के प्रसिद्ध ग्रन्थ हैं। सुभद्रा जी ने अनेक बाल कविताएं भी लिखी हैं। उनके लेखन ने हिंदी साहित्य पर अमिट छाप छोड़ी है। सुभद्रा जी का 27 सितंबर‌ 1949 को एक कार दुघर्टना मे देहांत हुआ।

: शारिक रब्बानी , वरिष्ठ उर्दू साहित्यकार

नानपारा, बहराईच (उत्तर प्रदेश)

Desk Editor
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