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डॉ राजराम त्रिपाठी ने कहा, NH-30 पर 'जोबा' के जंगल में असामाजिक तत्वों ने आग लगा दी, हो जायेंगी जंगली औषधियां नष्ट

आईफा संयोजक डॉ राजराम त्रिपाठी बोले

डॉ राजराम त्रिपाठी ने कहा, NH-30 पर जोबा के जंगल में असामाजिक तत्वों ने आग लगा दी, हो जायेंगी जंगली औषधियां नष्ट
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आईफा के राष्ट्रीय संयोजक डॉ राजराम त्रिपाठी ने आज अपनी घर से आने वाली कहानी सुनाई जो बड़ी ही दिल दहलाने वाली थी,उन्होंने कहा कि इस इस साल की होली पर कोरोना की काली छाया गहरा चुकी थी। पर लोग परंपरागत तरीके से होलिका दहन कर होली खेल रहे थे। इन दिनों असामाजिक तत्वों की बन आती है। हम भी अपने गांव ककनार ( दरभा विकास खण्ड जिला बस्तर) की पारंपारिक होली की पूजा अर्चना कर वापस आ रहे थे।

डॉ राजराम ने कहा कि एन एच 30 ( NH-30) पर 'जोबा' के पास के सड़क के किनारे, जंगल में असामाजिक तत्वों ने आग लगा दी थी। दोनों ओर साल के घने जंगल मौजूद हैं कई जगहों पर वन विभाग ने अकेसिया आदि के वृक्षारोपण भी कर रखे हैं। सड़क पर दौड़ते अन्य वाहनों और यात्रियों की तरह हम भी अपनी गाड़ी में चले जा रहे थे, मेरी नज़रें मोबाइल पर थी, क्योंकि गाड़ी ऋषि ड्राइव कर रहे थे। अचानक उन्होंने गाड़ी धीमी करके रोकी और रिवर्स लेना चालू किया, मैंने प्रश्नवाचक मुद्रा में उनकी ओर देखा। उन्होंने कहा सड़क के किनारे जंगल में आग लगी है, अगर मैं यह बात आपको बाद में बताता तो आप मुझ पर नाराज होते। इसीलिए मैंने सोचा कि आपको बता भी दूं , और दिखा भी दूं। अब आप बताइए क्या करना है । ऋषि को पता है कि हम चाहे कितने ही जरूरी काम से क्यों न जा रहे हो किंतु यदि सड़क के किनारे, हमारी पहुंच में, अगर कहीं भी जंगलों में आग लगी है, और वह हमारे बुझाने के काबिल है, तो हम पूरा जोर लगाकर कर उसे बुझाने की कोशिश करते हैं, और यह कार्य हम सर्वोच्च प्राथमिकता के आधार पर पर करते हैं। हम दोनों ने एक बार उस भड़कती आग व उसकी लपलपाती लपटों की ओर देखा फिर एक दूसरे की आंखों में झांका और तौला , दरअसल हम दोनों ही अब एक दृढ निश्चय पर पहुंच चुके थे।

आग भड़क चुकी थी, और तेजी से फैलते ही जा रही थी। मैंने ऋषिराज और साथ में शिप्रा जी ने ठान लिया कि इसे हर हाल में रोकना ही है। हमने हमारे गांवों की जंगलों में की आग बुझाने की परंपरागत कारगर बस्तरिया तकनीक को अपनाया। लपक कर एक पेड़ की हरी पत्तियों से लदी कुछ टहनियों को तोड़ा , जंगल की आग बुझाने में यह हमारा प्रमुख हथियार होता है। हमने व्यूह रचना कर अलग-अलग तीन छोरों से से आग बुझाने का निर्णय लिया। हमने तेजी से आक्रमण किया , पर अचानक हवा के तेज झोंके आए जिन्होंने आग का भरपूर साथ दिया, आग अब तीन ओर से मुझे घेरते हुए तेजी से आगे बढ़ी, और हालात यहां तक बिगड़े कि एक बारगी तो मुझे लगने लगा की तेजी से गोलाई में मेरी ओर बढ़ती आग कहीं मुझे ही ना घेर ले। यह लैंटाना की झाड़ियां जब जलती है तो पेट्रोल को भी मात कर देती हैं। इस समय मुझे अपने बचपन में अपने आदिवासी भाइयों से मिली सीख काम आई,, कि जंगल की आग में फंसने पर हिम्मत बिल्कुल नहीं खोना है , वरना आग खा जाएगी, बस अपने दोनों और तेजी से आग की लपटों पर तेज प्रहार करना जारी रखो और जिस तेजी से आग आपकी और बढ़े, उससे डेढ़ गुना तेजी से आग बुझाने की रफ्तार को जारी रखो, और लगातार आगे बढ़ते रहो, बस । यह फार्मूला सचमुच काम करता है। इस तरह से लगभग आधे घंटे की जद्दोजहद के बाद अंततः हमने विजय पाई। आग की सारी लपटे शांत हुईं। आधे घंटे और इंतजार किया कहीं कोई चिंगारी फिर से भड़क कर आग ना पकड़ ले। हमारे पास जो पानी था उसका भी उपयोग किया और धूल मिट्टी का भी। आखिरकार आग शांत हो गई।

यह आग लगती तो मीलों-मील करोड़ों अरबों की वनसंपदा , अनमोल जंगल तथा लाखों छोटे बड़े जीव जंतु कीट पतंगों का मरना तय था। आज तो हम ने बचा लिया तो पर कल की क्या गारंटी ??

वन विभाग जिस पर दोनों को आग से बचाने की जिम्मेदारी है, वह तो वनों को बचाने के बजाय उनकी बाउंड्री बनाने तथा हर संभव स्रोतो से प्राप्त नोट गिनने में व्यस्त हैं। हालात यह हैं कि इस विभाग के डीएफओ तक के फोन उठते ही नहीं। चढ़ावा देकर मिली पोस्टिंग में किसी का डर भी भला कहां होता है। कहा जाता है कि, ऊपरी कमाई के मामले में बस्तर का एक सही सटीक रेंज का रेंजर, बस्तर के कलेक्टर को भी पछाड़ सकता है, फिर डीएफओ साहब की तो बात ही जुदा होती है। जानकार कहते हैं कि पुलिस थानों की तर्ज पर डीएफओ तथा रेंजर के पदों की भी नीलामी होती है, बस फर्क यह है कि यह राशि पुलिस थानों की तुलना में कई गुना ज्यादा होती है और हिस्सा बहुत ऊपर तक जाता है। तयशुदा चढ़ावा न पहुंचाने पर तत्काल दुधारू क्षेत्रों से उखाड़ कर बंजर क्षेत्रों में पटक दिया जाता है। इसीलिए, प्रशासनिक फेरबदल के नाम पर हर साल इस तरह की कई पदस्थि लिस्टें निकलती रहती है।

बस्तर के जंगलों में हर साल गर्मियों में लगने वाली आग से लगभग लगभग 70 हजार करोड़ का सालाना नुकसान होता है। मात्र 94 हजार करोड का सालाना बजट पेश करने वाली छत्तीसगढ़ सरकार को तो इसके बारे में सबसे ज्यादा गंभीरता से सोचना चाहिए पर राजनीति का भला पर्यावरण से क्या लेना देना ? आदिवासियों से भी सारा सरोकार उनके वोट लेने तक ही है। इससे जो पर्यावरण की हानि होती है उससे तो आंकना ही मुश्किल है। कितनी ही दुर्लभ वनऔषधीयां सदा सदा के लिए इस दावानल की भेंट चढ़ गई।

Shiv Kumar Mishra
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