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चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत की पुण्यतिथि पर विशेष: सत्ता हुंकार सुनती है, आवाज नहीं: डॉ. राजाराम त्रिपाठी

चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत की पुण्यतिथि पर विशेष: सत्ता हुंकार सुनती है, आवाज नहीं: डॉ. राजाराम त्रिपाठी
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देश कोरोना की भयावह दूसरी लहर से हलाकान है। अब क्या शहर और क्या गांव हर कहीं त्राहिमाम व्याप्त है. श्मशान तथा कब्रिस्तानों में जगहें नहीं बची सो मुर्दे नदियों में पनाह ले रहे हैं। लेकि मौत के इस तांडव में भी जिंदा 'पापी पेट' कहां मानता है। इसलिए मंडराती मौत के साए में आज भी, गांवों में एक दृश्य आम रहा है. गांव की जनवितरण प्रणाली की दुकानों पर सरकार द्वारा निःशुल्क वितरण किये जाने वाले अन्न के लिए कतारबद्ध वे लोग दिखे, जिनकी बदौलत सबका पेट भरता है. निःसंदेह, आभी इस पंक्ति में कोई बड़ा किसान नहीं था, लेकिन कम जोत वाले बहुसंख्य अन्नदाता किसान स्वयं अन्न के लिए सरकारी खैरात के भरोसे कतार में खड़ा था. यह दृश्य है 21वीं सदी के उभरते भारत की. ऐसे में सवाल उठता है कि आजादी के 7 दशक बाद भी देश का अन्नदाता सबल नहीं हो पाया तो इसके क्या कारण रहे हैं. क्या सरकारी नीतियां जिम्मेवार है? क्या किसान अपनी स्थिति के लिए स्वयं जिम्मेवार है? या फिर कोई तीसरा कारण भी है?

अगर गहराई से देखें तो ये तीन चीजें समान रूप से जिम्मेवार है. देश की लगभग सत्तर फीसदी आबादी आज के दौर में भी आजीविका के लिए परोक्ष अपरोक्ष रुप से खेती-किसानी पर ही निर्भर है. लेकिन सरकारें इस बहुसंख्यक आबादी के कल्याण के लिए कभी पर्याप्त गंभीर नहीं दिखीं. ऐसा नहीं है कि सरकारों ने किसानों के हित के लिए नीतियां नहीं बनायी, आधारभूत ढांचे का सृजन नहीं किया, नये नवोन्मेष को प्रोत्साहित नहीं किया. यह सबकुछ हुआ लेकिन सिर्फ कागजों पर. जिसकी वजह से किसान आज भी फटेहाल है.

एक बानगी पेश है, इसी अक्षय तृतीया के दिन,जबकि किसान मानसून की खेती का शुभारंभ बीजपूजन तथा बीजारोपण प्रारंभ करते हैं, और संयोग से ईद का त्यौहार भी था, सो मौके और दस्तूर के अनुसार प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी विशिष्ट शैली में तामझाम व भाषण के साथ किसान सम्मान निधि की 8 वीं किस्त, रुपए 2000 (दो हजार) की दर से 9.5 करोड़ (साढ़े नौ करोड़) किसानों के लिए जारी किया। एक बार फिर सोशल मीडिया में तथाकथित टैक्सदाताओं, कार्पोरेट के दलालों ने किसानों पर तंज कसने शुरू कर दिए कि हमारी गाड़ी पसीने की कमाई निकम्मे किसानों पर लुटाई जा रही है, बेवजह खैरात बांटी जा रही है वगैरा-वगैरा। जबकि इसी बीच डीएपी की बोरी 1200 रूपए से बढ़कर 1800 रूपए की हो गई है तथा यूरिया व अन्य खाद के दामों में भी भारी बढ़ोतरी हुई है। वही खेती के लिए बेहद जरूरी डीजल ₹100 प्रति लीटर पहुंच गया है। इसके अलावा बीज तथा खेती की दवाइयों के भावों में भी भारी वृद्धि के कारण प्रति एकड़ खेती की लागत सीधे सीधे 6 -7 हजार बढ़ गई है। अर्थात देश के 84% सीमांत किसान , जो कि 3- 4 एकड़ की खेती करते हैं, खेती की उपरोक्त जिंसों की कीमत बढ़ने के कारण उनकी खेती की लागत में एक झटके में 25 हजार प्रति किसान बढ़ोतरी हुई है। जबकि कृषि उत्पादों के समर्थन मूल्य में कोई राहतप्रद बढ़ोतरी भी नहीं हुई है, वैसे भी यह समर्थन मूल्य देश के किसानों के लगभग 7 फीसदी उत्पादन को ही मिलते हैं, 93 फीसदी उत्पादन, किसानों को मजबूरी में औने पौने दाम पर ही बेचना पड़ता है।

किसानों की जेब में "सम्मान निधि" की तीनों किस्त मिलने के बावजूद किसानों की जेब में तामझाम और बैंड बाजे के साथ कुल मिलाकर ₹6000 आएंगे जबकि हर सीमांत किसानों की जेब और गर्दन बड़ी ख़ामोशी और शाइस्तगी से औसतन लगभग ₹25000/ (पच्चीस हजार रूपए) से काटी जा रही है।अब ऐसी दुर्वस्था में किसानों की आय को दुगने करने की बात मात्र लफ्फाजी ही मानी जाएगी। अभी एक और गणित समझना भी जरूरी है,वह यह कि देश में कुल मिलाकर लगभग 16 करोड़ किसान हैं, जबकि यह सम्मान निधि केवल 9.5 करोड़ किसानों को ही दी जाती है, अर्थात देश के , 6.5 करोड़ किसान,‌यानी कि,लगमग 40 फीसदी किसान इस इस 'सम्मान-निधि' दान के दायरे से यत्नपूर्वक बाहर कर दिए गए हैं। यह अभागे किसान वोट के गणित में फिट नहीं बैठते, सो वैसे भी सरकार की अधिकांश योजनाओं के लाभ से वंचित हैं, जबकि देश के सकल कृषि उत्पादन में इनका योगदान लगभग 61 फीसदी है । इनकी गंभीर समस्याओं की एक अलग महागाथा है, (इस पर फिर कभी विस्तार से )।

दरअसल आजादी के बाद से ही सरकारें देश की विकासगाथा का गुणगान करते हुए जीडीपी समझाने में लगी रहीं और किसान अपनी फसलों को सड़ते-गलते देखने को मजबूर होता रहा. फसल नहीं हुई तो मुसीबत, और अगर फसल अच्छी हुई तो भी मुसीबत. हालांकि इन सभी चीजों से हुक्मरान भलीभांति परिचित रहे हैं बावजूद इसके किसानों के लिए आज भी खाद-बीज-मंडी, सिंचाई, बिजली आदि बुनियादी समस्याओं का भी समाधान नहीं हो सका. हाल ही में कृषि सुधार के नाम पर केंद्र सरकार ने चुपके से तीन नये कृषि कानून पास किये जो कि पूरी तरह से कारपोरेट के पक्ष में भरे गए हैं तथा जिनमें गंभीर खामियां हैं, इसे लेकर किसान सड़क पर उतर गये. बीते छह माह से दिल्ली की सीमा पर किसान डटे हैं, तो कई किसान कोविड-19 प्रोटोकॉल को मैनेज करते हुए, जहां हैं, वहीं से आंदोलन का बिगुल फूंके हुए हैं.

वक्त है कि देश के किसानों को बचाने और उनकी आवाज को तेज करने के लिए किसानों को उनके ही मुद्दों को समझाने की और संगठित करने की. किसानों को इतना जागरूक किया जाए कि देश का किसान भी बगैर किसी नेतृत्व के अपनी बात स्वयं सत्ता के शीर्ष तक पहुंचा सके. जब-जब हम किसान आंदोलन को लेकर बातें करते हैं, जेहन में 25 अक्टूबर 1988 का दृश्य घूमने लगता है, जब चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में बड़ी संख्या में किसान दिल्ली के वोट क्लब पर पहुंच गए. तब उन्होंने कहा था - खबरदार इंडिया वालों, दिल्ली में भारत आ गया है. तब दिल्ली थम सी गई थी. राजीव गांधी सरकार को उनकी मांगें मानने पर मजबूर होना पड़ा था. इसकी वजह थी कि तब सारे किसान और किसान संगठन टिकैत के नेतृत्व में एक छतरी के नीचे एकजुट थे. लेकिन वर्तमान में तीन नये कृषि कानूनों को लेकर किसान आंदोलित तो है, लेकिन एकजुट है. यह दावे से कहना फिलहाल संभव नहीं है. लगभग हर संगठन की निष्ठा किसी न किसी राजनीतिक दल या नेता के साथ जुड़ी है, और जो राजनीतिक दलों के दल-दल में नहीं है, उनकी कोई पूछ नहीं है.

महामारी से परे भी, आज किसान अभूतपूर्व कठिन काल खण्ड से गुजर रहे हैं। ऐसे समय में किसान नेता तथा भारतीय किसान यूनियन के संस्थापक चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत को याद करना प्रासंगिक हो जाता है.पंद्रह मई उनकी पुण्यतिथि है. वे आज भी किसान नेताओं के लिए प्रेरक बने हुए हैं. चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत के आंदोलन में न कोई नेता था, न कोई पदाधिकारी, हर कोई किसान था. चौधरी टिकैत भी कभी मंच से किसानों को संबोधित नहीं करते थे. वे किसानों के बीच, किसानों से सीधे संवाद करते थे. लेकिन आज बस कुछ किसानों के हुजुम को लेकर बहुतेरे किसान नेता खड़े हैं. इस प्रकार अगर किसान कुनबो-खेमों में बंटा रहा तो किसानों की आवाज कभी भी सत्ता को सुनाई नहीं देगी. इतिहास गवाह है कि सत्ता हुंकार सुनती है. आवाज नहीं. कुनबो-खेमों में बंटे समुदाय की हुंकार नहीं होती.

मोदी सरकार तीनों कानून को कृषि सुधार में अहम कदम बता रही है, लेकिन देश के किसान संगठन इसके खिलाफ हैं. सरकार का कहना है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य औऱ सरकारी खरीद जारी रहेगी, लेकिन किसानों को इस आजमाए झूठ पर भला कैसे विश्वास होगा? किसानों को लग रहा है कि सरकार उनकी कृषि भूमि कृषि मंडियों को छीन कर चुनिंदा कारपोरेट को देगी. आखिर सरकार और किसानों के बीच इतना अविश्वास का रिश्ता क्यों है? जाहिर है कि किसान अतीत में ऐसे कई सरकारी वादों और नीतियों से नुकसान उठा चुका है. अब आवश्यकता है कि सरकार सिर्फ कानून और वादों तक स्वयं को न रखें बल्कि जमीनी स्तर पर काम कर किसानों की स्थिति में सुधार लाने का यत्न करें. दूसरी ओर किसान नेता अपनी निजी महत्वकांक्षा को त्याग कर सामुहिक हित को आगे रखें औऱ देशके तमाम छिटके छोटे बड़े सभी किसान संगठनों को सप्रयास एकजुट कर, अपने मोर्चे को और ठोस तथा मजबूत बनाएं । सरकार से सुनिश्चित एजेंडे पर ठोस वार्तालाप करें,और किसानों की मांगे मानने पर मजबूर करें. किसान भी अपने स्वाभिमान को मरने ना दें और एकजुट हो कर अपनी आने वाली पीढ़ियों के हितों के लिए अभी से कमर कस लें.

चौधरी टिकैत की पुण्यतिथि पर आज देश के किसानों को पुनः उनकी गौरवशाली परंपरा के तहत एक छतरी के नीचे लाने के लिए चौधरी टिकैत की विरासत को आगे बढ़ाया जाना चाहिए। पर यह जिम्मेदारी केवल नरेश टिकैत व राकेश टिकैत की ही नहीं है, बल्कि आज देश के सभी किसान नेताओं के कंधों पर इस विरासत की जिम्मेदारी है ,और इसे आगे बढ़ाने के लिए सभी को, एक दूसरे को समुचित सम्मान देते हुए, मिलकर नये सिरे से काम करना होगा. अतीत की गलतियों से सीख लेते हुए, देश भर के किसानों को एकजुट करना होगा. यह भी सच है कि अगल-अलग राज्य के किसानों की अलग-अलग प्राथमिकताएं है. लेकिन सभी किसानों की एक प्राथमिकता है कि उनकी उपज बढ़े, उपज का उचित मूल्य मिले, कृषि के आधारभूत ढांचा का विकास हो, नवोन्मेष को प्रोत्साहन मिले, कृषि सामग्री और उपकरणों तक सहज पहुंच सुनिश्चत हो. यह सब तभी होगा जब सत्ता को लगेगा कि किसान एक बड़ा वोटबैंक है. अब तक राजनीतिक दलों को जाति-धर्म आधारित वोटबैंक ही दिखते रहे हैं, उन्हें देश का सबसे बड़ा 'वोट बैंक' किसानों का 'वोटबैंक' भी दिखाना होगा. किसानों को हिंदू-मुस्लिम, अगड़े-पिछड़े, दलित-सवर्ण के मकड़जाल से निकल कर किसान होने के गर्व से गर्वान्वित होते हुए अपनी एक नई जमात तैयार करनी होगी. तभी चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत को हम किसान अपनी सच्ची श्रद्धांजलि देने के हकदार माने जाएंगे.

लेखक डॉ राजाराम त्रिपाठी राष्ट्रीय संयोजक , अखिल भारतीय किसान महासंघ (आईफा)

Shiv Kumar Mishra
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