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"बा की रसोई" के हुए सौ दिन

बा की रसोई के हुए सौ दिन
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नई दिल्ली। हरिजन सेवक संघ नई दिल्ली के परिसर में गरीबों को खाना खिलाने के लिए कस्तूरबा की याद में बा रसोई की शुरुआत की गई। इस रसोई से सैकड़ों गरीब और जरूरमंद लोग लाभान्वित हुए।

बा रसोई के सौ दिन पूरे होने पर वरिष्ठ समाज कर्मी संजय राय का कहना है कि "बा की रसोई" के आज 100 दिन पूर्ण हो गए। ये केवल भोजन वितरण नहीं है, यह तो "बा"(माता कस्तूरबा) की करुणा और प्रेम का प्रसाद है। लोगों से जुड़ने और उनके दुःख दर्द मे शरीक होने का संकल्प है। बापू के सेवा भाव को जीवन में उतारने का संकल्प है । ये संकल्प हैं, अपने गौरवशाली परंपरा के महान आत्माओं के प्रति कृतज्ञता महसूस करने और उनके विचारों को आत्मसात करने का। जैसा बाबा विनोबा कहते थे कि हमें दिलों को जोड़ना है, तो ये दिलों को जोड़ने का काम है। "बा की रसोई" ख़ुद को सेवा में समर्पित करने का संकल्प हैै।

संजय राय ने बताया कि "बा" के आशीर्वाद से यह प्रकल्प चल रहा है । सोचा नहीं था कि इतना प्यार और सहयोग सबका मिलेगा। कई लोग पूछते हैं कि कब तक चलेगी यह "बा की रसोई" ? मैं कहता हूं जब तक "बा और बापू" की इच्छा होगी तब तक। यह रसोई केवल खाना बांटने का काम नहीं है यह प्यार और कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम है। डॉक्टर एस एन सुब्बा राव और दादा शंकर सान्याल की प्रेरणा से, हरिजन सेवक संघ के दोनों सचिव और उपाध्यक्ष महोदयों के स्नेह से यह आगे बढ़ रहा है। हरिजन सेवक संघ परिवार के देश भर के साथियों, सभी बहनों और भाइयों की मदद से यह काम हो रहा है। रोज करीब 250 लोग भोजन ग्रहण कर रहे है।



सुजीत गुप्ता
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