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लीपन कला-गुजरात की एक अमूल्य धरोहर

लीपन कला-गुजरात की एक अमूल्य धरोहर
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सीमा सहाय

लीपन कला जैसा कि नाम से ही ज्ञात है लीपना से ही आया है।गुजरात के गांवों में यह कला बहुत ही पुरातन काल से चली आ रही है। इस कला का मुख्य वस्तु मिट्टी, ऊंटों के गोबर थोडा कपड़ा या रुई और छोटे छोटे शीशे आदि होते हैं। इसे मड एंड मिरर आर्ट भी कहा जाता है।

गाँव की महिलाएं अपने घरों की दीवारों में मिट्टी या कीचड़ में ऊंटों के गोबर मिला कर सुंदर सुंदर रचनात्मक चित्रकारी करती हैं। इससे एक तो घर आकर्षक लगता था और दूसरा धूप की गरमी से बचाव भी होता है। कच्छ के स्थानीय ग्रामीण जिन्हें रवारी कहते हैं उनके द्वारा ही यह कला सृजित और विकसित की गई।

पहले दीवारों को मिट्टी गोबर से लीपने के बाद सूखने देती हैं। फिर मिट्टी में गोबर और रंग मिला कर मंडाना बनाती हैं। मंडाना महीन ज्यामितीय रेखाओं वाली कलाकृतियां होतीं हैं। वैसे अब लीपन कला महज गुजरात तक सीमित नहीं होकर विश्व भर में फैल गया है।

अब लोग मिट्टी और गोबर की जगह सफेद सीमेंट ,फेविकोल और रंगों का इस्तेमाल करते हैं। अब तरह तरह की लीपन कलाकृतियां ड्राइंग रूम के सजावटों से लेकर गुलदस्ता, पौट ,आईना हर जगह ही छा गई हैं। लीपन आर्ट बहुत ही खूबसूरत होती है।यह हमारे देश की धरोहर हैं ।

सुजीत गुप्ता
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