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मासिक धर्म के नाम पर अनेक अंधविश्वास, विदेशों में भी अंधविश्वास से जूझती हैं महिलाएं

मासिक धर्म के नाम पर अनेक अंधविश्वास, विदेशों में भी अंधविश्वास से जूझती हैं महिलाएं
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ज्योति अग्रवाल

शर्म नहीं सम्मान है यह औरत की पहचान है महावारी का होना। प्रत्येक महिला के लिए शर्म नहीं बल्कि गौरव की बात है क्योंकि सृष्टि का सृजन इससे ही हुआ है। धरती पर आज भी माता की योनि की असम के कामाख्या मंदिर में पूजा की जाती है। इस जगह पर मां का योनि भाग गिरा था जिस वजह से यहां पर माता हर साल 3 दिनों के लिए रजस्वला होती है इस दौरान मंदिर को बंद किया जाता है 3 दिनों के पश्चात मंदिर को बहुत ही उत्साह उत्साह के साथ खोला जाता है।

यहां पर भक्तों को प्रसाद के रूप में एक गिला कपड़ा देते हैं जिसे अंबुबाची वस्त्र कहते हैं। कहा जाता है कि देवी के रजस्वला होने के दौरान प्रतिमा के आसपास सफेद कपड़ा बिछा दिया जाता है 3 दिन बाद जब मंदिर के दरवाजे खोले जाते हैं तब वह वस्त्र माता के रज से लाल रूप से भीग जाता है। बाद में इसी वस्त्र को भक्तों में प्रसाद के रूप में बांटा जाता है।

फिर क्यों महावारी के दौरान महिलाओं को हेय दृष्टि से देखा जाता है। क्यों उनके लिए इतनी सारी पाबंदियां लगाई हुई है कि वह मंदिर नहीं जा सकती, खाना नहीं बना सकती और पेड़ पौधों को नहीं छू सकती। लेकिन आपको यह जानकर हैरानी होगी कि यह प्रतिबंध केवल हिंदुस्तान में नहीं बल्कि पूरे विश्व में लगे हुए हैं।

अमेरिका जैसे शिक्षित देश में भी यह माना जाता है कि अगर कोई लड़की पीरियड्स के दौरान आचार को छूती है तो वह खराब हो जाता है। जापान में भी इन दिनों महिलाओं को वहां की मशहूर डिश सूशी को बनाने पर प्रतिबंध है। वहां ऐसा माना जाता है कि इन दिनों उनके मुंह का स्वाद असंतुलित हो जाता है।

इटली में भी ऐसा माना जाता है कि महिलाओं को मासिकधर्म के दौरान पौधों को हाथ नहीं लगाना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से पौधे ठीक से बढ़ नहीं पाते हैं। साथ ही वहां पर भी महिलाओं के खाना पकाने पर भी प्रतिबंध है उनका मानना है कि वह कुछ भी पकाएगी वह भोजन किसी के लिए भी सेहतमंद नहीं होगा।

आज भी पूरी धरती पर अलग-अलग रूपों में फैले हुए हैं ,लेकिन समाज का बुद्धिजीवी वर्ग इन धारणाओं के होने के पीछे यह तर्क देता है कि पहले महिलाओं को बहुत ही परिश्रम करने वाले कार्य करने पड़ते थे जैसे कुआं पर से पानी भरना चक्की चलाना और ऐसे समय में महिलाओं को इतने परिश्रम वाले कार्य नहीं करने पड़े वह आराम कर सके इसके लिए नियम बनाए गए थे लेकिन बाद में यह नियम अंधविश्वास में बदल गए

धीरे धीरे इन अंधविश्वासों की जड़ इतनी गहरी होती गई कि वह सामाजिक नियमों में तब्दील हो गई प्रकृति के द्वारा प्रदत नियम को घृणा के रूप में देखा जाने लगा। आज चारों ओर नारी सशक्तिकरण की बातें की जा रही हैं लेकिन उसी समाज में लड़कियों व महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान शारीरिक दर्द का सामना करते हुए अपवित्र होने का एक दर्द सहना पड़ता है आज भी उनके साथ अछूतों जैसा व्यवहार किया जाता है । वह मंदिरों में जा नहीं सकती। घर के बिस्तरों पर बैठ नहीं सकती। उनके सोने में बैठने के लिए अलग स्थान होता है।

इस बारे में स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉक्टर रक्षा शर्मा कहती हैं कि भगवान के बाद यदि किसी का नाम आता है तो वह मां ही है जब भी किसी लड़की को पहली बार महावारी आती है तो वह सूचना देती है कि उसके अंदर मां बनने की क्षमता है यह तो एक प्राकृतिक क्रिया है जब एक महिला की अंडे दानी में अंडा बनता है और वह शुक्राणु से नहीं मिल पाता इस दौरान हमारे शरीर में बच्चे के पोषण के लिए एक झिल्ली बनाई होती है लेकिन बच्चा ना लगने की स्थिति में वह फूट जाती है और माहवारी के रूप में निकल जाती है

इसलिए मासिक धर्म के बारे में जो अवधारणाएं फैली हुई हैं उसको तोड़ने के लिए महिलाओं का शिक्षित होना बहुत जरूरी है ताकि वह अपनी बेटियों को इसके बारे में अच्छे से बता सके और विद्यालय में भी शिक्षिका अपने स्टूडेंट को अच्छे से समझा सके कि यह एक नेचुरल प्रक्रिया है

इस बारे में समाजसेवी मीना बंसल कहती है कि इस धारणा को बदलने के लिए बच्चों के पाठ्यक्रम में इसे एक जरूरी विषय के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए ताकि लड़कियों के साथ लड़कों को भी यह पता चल सके कि यह तो एक प्राकृतिक क्रिया है और इसके बिना स्त्री का अस्तित्व अधूरा है यह कोई घृणा करने की चीज नहीं है

लेकिन बदलते सामाजिक परिवेश में अब कामकाजी महिलाओं को देखते हुए समाज के एक शिक्षित वर्ग ने इस अवधारणा को पुरजोर बदलने की कोशिश की है और ऐसे घृणा की दृष्टि से ना देख कर सामान्य रूप से लेने की कोशिश करने लगा है लेकिन मेरा तो अभी भी यही मानना है कि महामारी के दिनों में महिलाओं के साथ सामान्य व्यवहार किया जा सके इसके लिए घर घर जाकर महिलाओं को शिक्षित करने के साथ जागरूकता शिविर लगाए जाने चाहिए और उनके मन में अच्छी तरह की सोच को खत्म करना चाहिए क्योंकि यह तो प्रकृति की सूचना है कि एक महिला में सृजनकरने की क्षमता है।

प्रसून लतांत
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