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"सृजन संसार" के तत्वावधान में आयोजित हुई काव्य, गोष्ठी

कवियों ने बहाई काव्य - रस की गंगा, "हर तरफ आग है बारूद बिछा रखे हैं, कहीं तो कोई जगह, प्यार के लिए रखिए"

सृजन संसार के तत्वावधान में आयोजित हुई काव्य, गोष्ठी
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रांची। "सृजन संसार" साहित्यिक एवं सांस्कृतिक मंच की सितंबर माह की काव्य- गोष्ठी सफलतापूर्वक मंच के सम्मानीय सदस्य चंद्रिका ठाकुर " देशदीप" जी के आवास मोरहाबादी एदलहातू स्थित सत्यम अपार्टमेंट में आयोजित की गई। गोष्ठी की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार श्री वासुदेव प्रसाद ने की।

विशिष्ट अतिथि रामकुमार तिवारी तथा मुख्य अतिथि डॉ सुरेंद्र कौर नीलम रहे। कार्यक्रम की शुरुआत डॉ सुरिन्दर कौर ' नीलम' द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना से हुई। तत्पश्चात मंच के संस्थापक व अध्यक्ष कवि एवं लोक गायक सदानंद सिंह यादव ने अपने मंच के बारे में बताते हुए कहा कि - पिछले दो वर्ष पूर्व 'सृजन संसार' का गठन सृजनात्मक और मौलिक लेखन की साधना को अक्षुण्ण बनाए रखने के उद्देश्य किया गया। गठन के बाद कई कार्यक्रम होते रहे हैं।

उन्होंने कहा कि- " सृजन है श्रृंगार, सृजन बिन दिखे मुझको ,सूना यह संसार"। अंगिका में स्वागत गीत गाकरआमंत्रित रचनाकारों का उनके द्वारा स्वागत भी किया गया। उसके बाद कामेश्वर सिंह 'कामेश' ने अपनी रचना पढ़ते हुए कहा कि- दिल की बातें न होती, दिल को सतानेवाली,

पर न हर बात होती, सबको बतानेवाली। चंद्रिका ठाकुर 'देशदीप'ने कहा कि-

हरतरफ आग है बारूद बिछा रखे हैं!

कहीं तो कोई जगह प्यार के लिए रखिए!!...। सूरज श्रीवास्तव ने अपनी रचना पढ़ते हुए कहा- तिनके जैसा ख्वाब है कोई आँखों की अंगनाई में

जाने कब से ढूंढ़ रहा हूं पलकों की परछाई में। डॉ सुरेंद्र कौर 'नीलम' ने- हवा ने जाने क्या कहा है,बादल के कानों में

जोड़ा आंखों का अनुबंध

छलके यौवन के तटबंध। मीनू मीना सिन्हा 'मीनल' ने-अंगदेश की बिटिया हूँ मैं ,मीनू मेरा नाम

करूँ नमन ,वंदन ,अभिनंदन, सभी को है प्रणाम। डॉ रजनी शर्मा "चंदा" ने-मुझे तुझसे बिछड़ कर हमनशीं

तुमसा कोई फिर मिला नहीं। रामगढ़ से पधारे सरोज झा "झारखंडी" ने अपनी प्रस्तुति देते हुए कहा कि - बड़ा पागल है वो खुद में गुमान करता है।

मुस्कुरा कर वो सारा जहान करता है।।

उन्हें तो बस इफ्तारी से मतलब है

परेशां वो है जो रोज़ा रमज़ान करता है। पुष्पा सहाय "गिन्नी" ने- पूर्णता को तलाशती,

पूर्णता की ओर भागती,

आठों याम चलती रही,

सरगम सांँसों की बजती रही। संध्या चौधरी 'उर्वशी'

ने अपनी रचना-तेरे और मेरे होने के बीच कुछ नहीं बहुत फासले थे

एक दो नहीं कई शहर गांव और कस्बे थे

नदियां और वादियां थी कई अपने तो कई बेगाने थे।पढीं। डॉ निराला पाठक ने - लुटा बैठे हम अपनी जवानी ,

बड़े ही सस्ते-सस्ते में ।

दाम नहीं थे पास मेरे ,

लौट गयी वो रस्ते में।

राजीव थेपड़ा ने- जीवन सबका मुश्किल ही है , कौन यहां है जो उलझा नहीं है। रामकुमार तिवारी जी ने अपनी रचना प्रस्तुत करते हुए कहा - सोचा था सरगम गाकर मैं हर गम को भूल जाऊंगा। तो रंगोली जी ने अपनी रचना -धीरे-धीरे धरती पर आने लगी चांदनी की प्रस्तुति देकर कार्यक्रम में वाह वाही लूटी। डॉ सुषमा केरकेट्टा ने -छुप गया है बादलों में वह पंछी कहां उड़ते उड़ते क्षितिज को छूने गया क्या वो। वरिष्ठ कथाकार एवं साहित्यकार पंकज मित्र ने- मेरी साँस घुट रही है दैरो-हरम में आके।

रहे-इश्क पे अमल को मेरी बन्दगी बना दे। रेनू झा रेणुका ने- मुझको धड़कन कहते कहते सांसों में गैरों को बसा लिया। प्रणव प्रियदर्शी ने - आज सुबह मेरी हथेली पर रखी मिली, उतनी ही रोशनी ,जितनी रख छोड़ी थी मैंने कभी अनजान राहों पर।कार्यक्रम में कई अन्य रचनाकारों

ने भी अपनी - अपनी शानदार रचनाओं की प्रस्तुति कर कार्यक्रम में चार चांद लगा दिए। मौके पर श्री ए के सिन्हा तथा मीना सिन्हा जी की भी उपस्थिति रही।। कार्यक्रम का सफल संचालन चंद्रिका ठाकुर देशदीप जी ने किया । अंत में धन्यवाद ज्ञापन सदानंद सिंह यादव ने किया।

सुजीत गुप्ता
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