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अपना एमपी गज्जब है..15, जी हां अब चीते "छोड़े" जाते हैं...

अपना एमपी गज्जब है..15, जी हां अब चीते छोड़े जाते हैं...
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अरुण दीक्षित

यूं तो एमपी को आदिवासियों का राज्य कहा जाता है।यहां किसी अवतारी पुरुष का अवतरण भी नही हुआ है। बस भगवान राम कुछ समय के लिए चित्रकूट में रुके थे।उनके लंका जाने का रास्ता भी एमपी से होकर गुजरा था।

कुछ भी हो पर एक बात पक्की है कि इसके इलाके में आकर बड़े बड़े लोग अक्सर अपने "मन" की बात कह ही जाते हैं।इसकी ताजा मिसाल हैं अपने प्रधानमंत्री!

अपने 72 वें जन्मदिन पर वे कुछ घंटे के लिए एमपी के दौरे पर आए थे।शनिवार का दिन था और तारीख थी 17 सितंबर!राज्य सरकार ने जन्मदिन के जश्न को ऐतिहासिक बनाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी।अफ्रीकी देश नामीबिया से आए दुर्लभ चीतों ने इस जश्न में चार चांद लगा दिए।

यह कड़वा सच है कि देश पिछले 74 साल से चीता विहीन था।शिकारियों ने चीते की नस्ल ही खत्म कर दी थी।ऐसे में बाहर से चीतों को मंगाकर उन्हें श्योपुर के जंगल में "स्थापित" करना बड़ी बात है।यह काम खुद प्रधानमंत्री ने किया!तारीफ तो बनती है।

नामीबिया से हवाई जहाज में बैठकर आए चीतों में से एक को अपने साथ गाड़ी में बैठाकर उनके लिए बनाए गए विशेष बाड़े तक ले जाना!फिर पूरे लाड़ से उसे पिंजड़े से रिहा करना! उसकी तस्वीर खींचना!सब काम प्रधानमंत्री जी ने खुद किया।उन्हें ऐसा करते सबने देखा भी।

प्रधानमंत्री ने बाद में एक जनसभा को संबोधित भी किया!हमेशा कुछ अलग करने की अपनी आदत के चलते उन्होंने यहां भी एक नया जुमला गढ़ा!उन्होंने मुस्कराते हुए कहा - पहले कबूतर छोड़े जाते थे।अब चीते छोड़े जाते हैं....!सच में बहुत बड़ी बात कह गए प्रधानमंत्री!अपने मन की बात!ऐसी बात जो सालों से प्रभावी तो थी पर उसका ऐसा प्रमाण उपलब्ध नहीं था।

आगे की बात करने से पहले कबूतरों की बात कर लेते हैं।सब जानते हैं कि पुराने जमाने में कबूतर संदेश वाहक का काम करते थे।वे प्रेमी प्रेमिकाओं के बीच संवाद का माध्यम थे।लेकिन इनमें सफेद रंग के कबूतर शांति का प्रतीक माने जाते थे।इसलिए जब दो पक्षों में दुश्मनी के बाद दोस्ती होती थी तब दोनों ही पक्ष सफेद कबूतरों को पिंजड़े से निकाल कर आसमान में उड़ा देते थे। आसमान में उड़ते कबूतर

देख लोग समझ जाते थे कि दुश्मनी दोस्ती में बदल गई है।और भी बहुत किस्से हैं कबूतरों के।

अब चीतों की बात!बताते हैं कि अफ्रीकी देशों में लोग चीतों का इस्तेमाल शिकार पकड़ने के लिए करते थे।इन चीतों को खास किस्म की ट्रेनिंग दी जाती थी।जिसकी वजह से ये हिरण व अन्य जानवरों का शिकार करके उसे अपने मालिक के पास ले आते थे।बदले में मालिक उन्हें कुछ मांस के टुकड़े खिला देता था।

अफ्रीका से चल कर यह कला हिंदुस्तान तक पहुंची।बताते हैं कि मुगल शासक शिकार के लिए चीते पालते थे।शाहनामा के मुताबिक अकबर के पास एक हजार पालतू चीते थे।शिकार के समय वह इन चीतों को छोड़ता था।चीते शिकार करते थे! लाकर मालिक के सामने छोड़ देते।अकबर और उसके दरबारी आनंद लेते थे।कहा यह भी जाता है कि उस समय देश में हजारों चीते थे।अकबर ही नही अन्य राजाओं और बादशाहों द्वारा चीते पाले जाने का जिक्र इतिहास में मिलता है।राजा चीते छोड़ते थे।चीते शिकार करके उनके पास ले आते थे।अपना इनाम पाते थे।

अब प्रधानमंत्री की बात! उन्होंने एक दम सच कहा है कि पहले कबूतर छोड़े जाते थे।अब चीते छोड़े जाते हैं।

बात पर गौर करिए।पिछले कुछ सालों के हालात पर गौर फरमाइए!आप पाएंगे कि अब सच में चीते छोड़े जा रहे हैं।ये चीते कुछ समय तक अदृश्य रहकर काम करते रहे।कश्मीर से कन्या कुमारी तक और कच्छ से तवांग तक इन चीतों ने सभी राजनीतिक दलों के भीतर घुस घुस कर नेताओं का शिकार किया।इनके द्वारा किए गए "शिकार" इनके "मालिक" की देहरी पर पड़े दिखाई देते हैं।

अगर "अदृश्य" चीते सफल नही हुए तो दो खास सरकारी "चीते"

छोड़े जाते हैं।ये चीते इतने बड़े शिकारी साबित हुए हैं कि अब आम आदमी भी इनको पहचानने लगा है।इनका नाम जानने लगा है। इन्होंने देश में घूम घूम कर रोज "शिकार" किए हैं।कुछ सालों में ही इनके शिकार का आंकड़ा हजारों में पहुंच चुका है।

दरअसल इन दिनों ये "चीते" सूंघ सूंघ कर शिकार कर रहे हैं।मालिक की पसंद से भली भांति वाकिफ हैं।कई बार तो इनकी खबर पाकर शिकार खुद आकर पांव पर गिर जाता है।जो इशारों को नही समझा उसका तमाशा पूरा देश देखता है।

अब यह तो एमपी की मिट्टी का कमाल है जिसने चीतों के छोड़े जाने को सार्वजनिक करा दिया!वह भी सीधे श्रीमुख से!

यह अलग बात है कि जिन चीतों को छोड़े जाने की बात कही गई है वे न जाने कब देखने को मिलेंगे!लेकिन यह सच है कि अब परंपरा बदल गई है।अब शांति के प्रतीक कबूतर नही हिंसा के प्रतीक "चीते" छोड़े जाते हैं। हां यह जरूर है कि हिंसा की परिभाषा बदल गई है।यह अलग बात है कि अब जो चीते छोड़े गए हैं कि भीतर और बाहर किसी को नहीं छोड़ते हैं।वे बस उन्हीं को सूंघ कर अभयदान देते हैं जिन्हें मालिक ने खुद आशीर्वाद दे रखा है।

कुछ भी हो एमपी की धरती का करिश्मा जोरदार है।सच कहलवा ही लेती है।मुंह भले ही किसी का हो।आखिर अपना एमपी गज्जब जो है!है ना?

Shiv Kumar Mishra
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