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अंततः हो गया दिग्विजय का पुनर्वास

अंततः हो गया दिग्विजय का पुनर्वास
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भोपाल।अपने बयानों को लेकर हमेशा चर्चा में रहने वाले वरिष्ठ कांग्रेस नेता और मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को कांग्रेस नेतृत्व ने अंततः काम दे ही दिया है।अपने ऊपर होने वाले सुनियोजित हमलों की परवाह किये बिना मोदी सरकार और भाजपा पर लगातार हमले करने वाले दिग्विजय अब पार्टी की ओर से मोदी सरकार के खिलाफ आंदोलन के मुद्दे तय करेंगे।कांग्रेस ने दिग्विजय को उनके स्वभाव के अनुरूप काम दिया है।उनके गृहप्रदेश के लोग मान रहे हैं कि यह दायित्व उनका राजनैतिक पुनर्वास है।

उल्लेखनीय है कि कांग्रेस ने गुरुवार को एक 9 सदस्यीय कमेटी बनाई है।यह कमेटी केंद्र सरकार के खिलाफ आंदोलन के मुद्दे और उनकी रूपरेखा तय करेगी।दिग्विजय इस कमेटी के अध्यक्ष हैं।कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी भी इस समिति की सदस्य हैं।

दिग्विजय सिंह कांग्रेस के वरिष्ट नेताओं में से हैं।वे उत्तरभारत में कांग्रेस के एक मात्र ऐसे नेता हैं जिनका अनुभव बहुमुखी है।वे दस साल तक मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे हैं।पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव भी रहे हैं।फिलहाल वे राज्यसभा के सदस्य हैं।

2003 में विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद उन्होंने दस साल का राजनीतिक सन्यास लिया था। बाद में उन्हें पार्टी ने महासचिव बनाया। वे उत्तरप्रदेश के प्रभारी भी रहे।गोवा का भी प्रभार उनके पास रहा है।

निजी कारणों से चर्चा में आने के बाद से वे पार्टी में हाशिये पर चले गए थे। करीब डेढ़ साल पहले वे तब चर्चा में आये थे जब मध्यप्रदेश में कांग्रेस के विधायक पार्टी छोड़ कर भाजपा में चले गए थे।इस बजह से कांग्रेस की सरकार गिर गयी थी।कमलनाथ की मुख्यमंत्री की कुर्सी जाती रही थी।

उस समय ज्योतिरादित्य सिंधिया ने एक बड़ा राजनैतिक निर्णय लेते हुये कांग्रेस छोड़ दी थी।उनके साथ उनके समर्थक विधायक भी उनके साथ भाजपा में चले गए थे।

तब यह कहा गया था कि दिग्विजय सिंह की बजह से सिंधिया ने कांग्रेस छोड़ी।क्योंकि दिग्विजय के साथ लोकसभा चुनाव हारे सिंधिया भी उनकी तरह राज्यसभा जाना चाहते थे।हालांकि कांग्रेस के पास इतना संख्या बल था कि दिग्विजय और सिंधिया दोनों ही आसानी से राज्यसभा पहुंच सकते थे।लेकिन दिग्विजय की पहली प्राथमिकता पाने की जिद ने राज्य की कांग्रेस सरकार बलि चढ़बा दी।यह अलग बात है कि बाद में दिग्विजय और सिंधिया दोनों ही राज्यसभा पहुंचे।अंतर सिर्फ इतना रहा कि राहुल गांधी के सखा सिंधिया भाजपा सदस्य के रूप में सत्ता पक्ष में बैठे और दिग्विजय लगातार घट रहे विपक्ष में।

तब इसे राजा और महाराजा की निजी लड़ाई बताया गया।लेकिन इस लड़ाई में नुकसान न तो सिंधिया को हुआ न दिग्विजय को।सारा नुकसान दिग्विजय को साथ लेकर चल रहे कमलनाथ का हुआ।बड़ी मुश्किल से मिली मुख्यमंत्री की कुर्सी जाती रही।वे अब अपनी कुर्सी वापस पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

कांग्रेसी हलकों में माना जा रहा है कि कांग्रेस नेतृत्व ने दिग्विजय को बहुत ही महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी है।दरअसल कांग्रेस में इस समय विश्वास का संकट है।करीब दो दर्जन बड़े नेता गांधी परिवार के खिलाफ संगठित हो चुके हैं।शीर्ष पर जो बड़े नेता बचे हैं उनकी सबसे बड़ी कमी यह है कि वे हिंदी भाषी नही हैं। कांग्रेस के भीतर तो बड़े नेता हैं लेकिन उत्तरभारत और हिंदी पट्टी में उनका कोई प्रभाव नही है।

जहां तक दिग्विजय का सवाल है वे भाजपा के खिलाफ अपनी मुहिम और अपने बयानों की बजह से पूरे देश में चर्चा में रहते हैं।अगर सोशल मीडिया को पैमाना माना जाय तो भाजपा राहुल के बाद सबसे ज्यादा हमले दिग्विजय पर ही करती है।खास तौर पर आई टी सेल हमेशा उन्हें निशाने पर रखती है।इसके अलाबा वे उत्तर भारत के सभी राज्यों-बिहार,उत्तरप्रदेश, राजस्थान,उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और पंजाब में अच्छी तरह जाने जाते हैं।

भाजपा सरकार के खिलाफ आंदोलन की रणनीति बनाने की जिम्मेदारी देकर कांग्रेस नेतृत्व ने दिग्विजय को उनकी पसंद का काम दिया है।यह भी तय है कि यह काम वे अपने अन्य समकालीन नेताओं से ज्यादा वेहतर ढंग से कर सकेंगे।

बस एक ही सवाल है कि राहुल गांधी के दरबारी दिग्विजय को सफल होने देंगे क्या!क्योंकि एक जमाने में सोनिया गांधी से कांग्रेस अध्यक्ष बनने के लिए अनुरोध करते समय अपनी मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ देने की बात कहने वाले दिग्विजय को राहुल पसंद नही करते हैं,ऐसी आम धारणा है।

देखना यह है कि दिग्विजय इन चुनौतियों से कैसे निपटेंगे!क्योंकि अभी तक अपने नाम के अनुरूप जीतते तो रहे हैं लेकिन उनकी जीत की भारी कीमत कभी कांग्रेस ने तो कभी उन्होने खुद चुकाई है।लेकिन यह तय है कि संकट के दौर से गुजर रही कांग्रेस के लिए दिग्विजय फिलहाल बहुत उपयोगी हो सकते हैं।

अरुण दीक्षित
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