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क्या मध्यप्रदेश के नेताओं का "भाव" गिर गया है?

क्या मध्यप्रदेश के नेताओं का भाव गिर गया है?
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भोपाल।भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व द्वारा तीन राज्यों में चुनाव प्रभारी और सहप्रभारियों की नियुक्ति के ऐलान के साथ मध्यप्रदेश में यह सवाल उठ रहा है कि क्या प्रदेश के नेता इस लायक नही रहे कि उन्हें चुनावी जिम्मेदारी दी जाए। कहीं यह बंगाल की करारी हार का परिणाम तो नही है?

भाजपा नेतृत्व ने आज तीन राज्यों के लिए कुल 15 प्रभारी - सहप्रभारी घोषित किये हैं। इनमें उत्तरप्रदेश के लिए 8,पंजाब के लिये 4 और उत्तराखंड के लिए 3 नेताओं को चुना गया है। इन प्रभारियों और सहप्रभरियों में केंद्रीय मंत्री,राज्यों के मंत्री,सांसद-विधायक और पार्टी पदाधिकारी शामिल हैं। उल्लेखनीय बात यह है कि इन 15 नामों में एक भी नाम मध्यप्रदेश से नही है। जबकि छत्तीसगढ़ की सरोज पांडे को उत्तरप्रदेश का सहप्रभारी बनाया गया है।

तकनीकी रूप से केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को मध्यप्रदेश से जोड़ा जा रहा है। ओडिशा के रहने वाले प्रधान मध्यप्रदेश से राज्यसभा सांसद हैं। लेकिन प्रदेश की राजनीति में उनकी भूमिका नगण्य है।

मध्यप्रदेश के नेताओं को एकदम किनारे किये जाने को पार्टी की बंगाल में करारी हार से जोड़ के देखा जा रहा है।करीब 4 महीने पहले हुए बंगाल विधान सभा चुनावों में मध्यप्रदेश के नेताओं ने अहम भूमिका निभाई थी।पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय बंगाल के प्रभारी थे। उनके साथ प्रदेश के कई नेताओं को लगाया गया था। इनमें शिवराज सरकार के प्रवक्ता और गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा को अहम भूमिका दी गयी थी। जहाँ तक प्रचार की बात है,प्रदेश के कई नेता- मंत्री बंगाल की गलियों में घूमे थे। खुद मुख्यमंत्री भी प्रचार करने गए थे। यही नही चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद,पार्टी की हार होने पर भी,उन्होंने यह बताया था कि जिन विधानसभा सीटों पर वे प्रचार करने गए थे उन सभी पर भाजपा प्रत्याशी जीते थे।

उधर कैलाश विजयवर्गीय के करीबी नेता भी यह दावा कर रहे हैं कि उनकी बजह से ही बंगाल में पार्टी 77 सीटें जीती है। जबकि पहले उसके कुल 3 विधायक ही थे। एक तथ्य यह भी है कि कई भाजपा विधायक वापस ममता बनर्जी के खेमे में पहुंच गए हैं। कैलाश विजयवर्गीय हरियाणा के चुनाव प्रभारी भी रह चुके हैं।

पार्टी के नेताओं की खुली उपेक्षा पर राज्य के नेता भौचक्के तो हैं।लेकिन "डर" के मारे प्रतिक्रिया देने से बच रहे हैं। एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर कहा-राज्य के एक भी नेता का नाम प्रभारियों की सूची में न होना सामान्य बात तो नही है।क्योंकि मध्यप्रदेश भाजपा की नर्सरी कहा जाता है। पर जरूर कोई बात रही होगी जो हाईकमान ने ऐसा किया है। इस पर हम क्या कहें! एक अन्य नेता ने धर्मेंद्र प्रधान को मध्यप्रदेश का बता कर पल्ला झाड़ लिया तो एक बड़े नेता ने अरविंद मेनन को मध्यप्रदेश से जोड़ दिया।

उम्र के छठे दशक के पूर्वार्ध में चल रहे मेनन इस समय पार्टी के राष्ट्रीय सचिव हैं।वह मध्यप्रदेश के संगठन महामंत्री रहे हैं। पिछले महीने ही उन्होंने संघ की व्यवस्था से हटकर गृहस्थ जीवन में प्रवेश किया है।मेनन खुद को बनारस के निवासी बताते हैं। उन्हें उत्तरप्रदेश के गोरखपुर इलाके का प्रभार दिया गया है।

कहा यह भी जा रहा है कि असली जिम्मेदारी तो चुनाव के समय दी जाती है।लेकिन मध्यप्रदेश के किसी भी नेता को शामिल न किया जाना चर्चा का विषय बना हुआ है। तरह तरह के कयास लगाए जा रहे हैं।

अरुण दीक्षित
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