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मध्‍यप्रदेश में जनजातीय गौरव दिवस, आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में होता तो जनजातीय लोगों के अंदर से असुरक्षा का भाव दूर होता

मध्‍यप्रदेश में जनजातीय गौरव दिवस, आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में होता तो जनजातीय लोगों के अंदर से असुरक्षा का भाव दूर होता
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विजया पाठक, एडिटर जगत विजन

मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में 15 नवंबर को देश का पहला जनजातीय गौरव दिवस का आयोजन किया गया। भगवान बिरसा मुंडा की जयंती पर आयोजित हुए इस समारोह के मुख्य अतिथि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रहे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कार्यक्रम के दौरान लगभग चार घंटे से भी अधिक समय भोपाल में गुजारा। इस दौरान उन्होंने जंबूरी मैदान में हुए मुख्य समारोह में शिरकत की। समारोह के लिए तीन लाख से अधिक आदिवासी लोगों को प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों से लाये जाने की बात कही जा रही है। लेकिन कार्यक्रम स्‍थल पर खाली पड़ी कुर्सियों से लगता है कि इतनी संख्‍या में आदिवासी नहीं आये होंगे। कुल मिलाकर इस समारोह के माध्यम से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद को आदिवासी समुदाय का सबसे बड़ा हितैषी तो बता दिया लेकिन क्या इससे भी आदिवासी समुदाय के लोगों की मूलभूत सुविधाओं का अंत होगा, यह अपने आप में बड़ा सवाल है।

आदिवासी इलाके में बढ़ती कार्यक्रम की उपयोगिता

प्रदेश के धार, झाबुआ, मंडला, छिंदवाड़ा, शहडोल सहित कुछ ऐसे क्षेत्र है जहां आज भी बड़ी संख्या में आदिवासी समुदाय के लोग निवासरत हैं। यह लोग आज भी मूलभूत सुविधाओं की कमी से दो-चार हो रहे हैं। कभी नक्सली हमले का डर तो कभी भूख की मार। यह दोनों ही इन आदिवासी समुदाय के लोगों के लिए बड़ी चुनौती है। निश्चित ही शिवराज सरकार ने आदिवासी समुदाय के हित के लिए एक पहल करने का प्रय़ास किया है, लेकिन अगर यह समारोह आदिवासी इलाकों में होता तो निश्चित ही आदिवासी समुदाय के लोगों के अंदर से असुरक्षा का भाव दूर होता। इस कार्यक्रम की उपयोगिता और बढ़ जाती। मैंने खुद कई बार आदिवासी क्षेत्रों का भ्रमण किया है इसलिए मुझे यह पूर्ण विश्वास है कि अगर इस तरह के आयोजन या फिर मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री का दौरा आदिवासी इलाकों में होता रहे तो यह आदिवासी समुदाय भी खुद को मुख्य धारा का हिस्सा समझेगा।

मंच से राज्यपाल की तारीफ

जनजातीय गौरव दिवस समारोह में आदिवासी समुदाय के लोगों को लुभाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मप्र के राज्यपाल मंगू भाई पटेल की यह कहते हुए तारीफ कर दी कि वो मप्र के एकमात्र आदिवासी समुदाय के राज्यपाल हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि न तो राज्यपाल महोदय मध्यप्रदेश से कोई वास्ता रखते हैं और न ही उन्होंने कभी आदिवासी समुदाय के लिए कोई कार्य किया है। ऐसे में फिर आदिवासी समुदाय के सामने उनकी तारीफ करना क्यों जरूरी समझा। वे भले ही आदिवासी समुदाय से आते हों लेकिन उन्‍होंने अपने राजनीतिक जीवन में कभी भी कुछ ऐसा कार्य नहीं किया जिससे कहा जा सके तो उन्‍होंने आदिवासियों की आवाज उठाई है। आदिवासी समुदाय के लिए कार्य किया तो वो हैं मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ। लेकिन कांग्रेस पार्टी के लिए अभी रुकने का समय नहीं है। क्योंकि आदिवासी समुदाय के लोगों के बीच आज भी स्व. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ही चर्चित हैं। वे लोग सिर्फ उन्हीं को जानते हैं और उन्हीं की योजनाओं से लाभान्वित हुए हैं। ऐसे में दोनों ही राजनीतिक पार्टी के नेताओं को यह समझना होगा कि अगर आदिवासी समुदाय के बीच खुद को स्थापित करना है तो बेहतर है कि वो उनके बीच जाकर कार्य करें।

50 करोड़ से अधिक किये खर्च

इस पूरे समारोह में ब्रांडिंग, परिवहन, आयोजन स्थल, खान-पान सहित अन्य मदों में 50 करोड़ से अधिक की राशि खर्च होना बताया जा रहा है। ऐसे में यदि सरकार इस पूरे आयोजन आदिवासी क्षेत्र में जाकर करने की योजना बनाती तो निश्चित ही खर्च भी कम होता और आदिवासियों के बीच कार्यक्रम होने से आदिवासी समुदाय के लोगों का हौंसला भी बढ़ता।

शिवराज को किया अनदेखा

जनजातीय गौरव दिवस समारोह के आयोजन के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले तो मंच से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की तारीफ की। लेकिन कार्यक्रम के बाद वे मुख्यमंत्री को अनदेखा करते दिखाई दिये। प्रधानमंत्री ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को जंबूरी मैदान से रानी कमलापति रेलवे स्टेशन तक अपनी गाड़ी में बैठाना भी जरूरी नहीं समझा। निश्चित ही यह कहीं न कहीं इस बात की ओर इशारा करता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शिवराज सिंह चौहान के बीच कुछ ठीक नहीं चल रहा है।

मीडिया की रही भूमिका

आज भले ही भाजपा और प्रदेश सरकार जनजातीय गौरव दिवस की सफलता का श्रेय खुद को दे रहे हों। लेकिन इसका श्रेय मीडिया को जाता है। जिस तरह से सरकार ने मीडिया को मैनेज किया, निश्चित ही वह इस समारोह की सफलता के लिए एक बड़ा और प्रमुख सूत्र था। क्योंकि मीडिया कवरेज में ही बताया गया है कि इतनी बड़ी संख्या में लोग यहां पहुंचे हैं।

पिछले 10 वर्षों में हजारों एकड़ जमीन छिनी

पिछले 10 वर्षों में आदिवासियों की जमीनें सरकारों ने छीनी है। जंगलों में रहने वाले इन आदिवासियों से इनके जंगल छीन लिए गए। कभी विकास के नाम पर जंगलों को काटा तो कभी उदयोगपतियों को खनिज संपदा को लूटने के लिए औने पौने दामों में जंगल की जमीनों को दिया गया। जिससे इनकी न केवल रोजी-रोटी छिनी बल्कि प्राकृतिक संपदा को भी भारी नुकसान पहुंचाया।

पलायन करने पर मजबूर हैं आदिवासी बहन-बेटियां

प्रदेश सहित देश के अधिकांश आदिवासी बाहुल्य जिलों में रहने वाले जनजातीय लोग आज भी पलायन करने को मजबूर हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है स्थानीय स्तर पर रोजगार का अभाव और नक्सलियों का डर। सिर्फ पुरूष ही नहीं बल्कि महिलाएं भी अपने जिलों को छोड़ अन्य जिलों में जाकर छोटी-छोटी राशि पर मजदूरी करने को मजबूर हैं। गांव के लोग अपनी लड़कियों को शहरों में काम करने को भेजने के लिए मजबूर है। इन आदिवासियों की अधिकतर लड़कियां दिल्ली, मुंबई, आगरा, गोवा सहित मेट्रो सिटीज में जाकर काम करती है। जहां काम के बदले मिलने वाली राशि को वे अपने घरों में भेजती है जिससे उनके परिवार के अन्य सदस्यों का पालन पोषण होता है। इतना ही नहीं आदिवासियों के मन में नकसलियों से सुरक्षा का भय इतना अधिक है कि वो अपनी बहन-बेटियों को अपने साथ रख ही नहीं पाते। छत्तीसगढ़ में लगभग नक्सलियों के भय से लगभग 700 गांव खाली हो गए हैं। मध्यप्रदेश में बालाघाट, डिंडौरी, मंडला, धार आदि क्षेत्रों में रहने वाले बैगा, सहरिया, गोंड जनजाति से जुड़े लोग हो या फिर छत्तीसगढ़ के बस्तर, नरायणपुर, दंतेवाड़ा, बीजापुर, सुकमा, सूरजपुर, बलरामपुर, कोंडागांव, कांकेर, सरगुजा, कोरिया, कोरबा एवं जशपुर, झारखंड में निवासरत उरांव, कोरवा, आदिम, सैरिया, असुर, लोहरा, संथाल जनजाति से जुड़ी महिलाएं हो या पुरूष सभी अपना घर-परिवार छोड़ आर्थिक तंगहाली को दूर करने के लिए पलायन करने को मजबूर हैं।

Shiv Kumar Mishra
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