
लंदन के म्यूजियम से भारत वापस आएगा शिवाजी का खास हथियार 'बाघ नख', इसी से एक झटके में चीर दिया था अफजल खान का पेट!

शिवाजी महाराज का खास हथियार बाघ नख की अब घर वापसी होगी, यूनाइटेड किंगडम के अधिकारियों ने इसे वापस करने पर सहमति जता दी है. यह वही हथियार है जिससे शिवाजी ने बीजापुर सल्तनत के धोखेबाजी सेनापति अफजाल खान को मौत के घाट उतारा था. फिलहाल ये बाघ नख लंदन के विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूजियम में रखा है. महाराष्ट्र के कल्चर मिनिस्टर इसी माह के अंत तक लंदन जाकर बाघ नख को वापस लाने के लिए एक समझौता पत्र साइन करेंगे. इस साल के अंत तक बाघ नख स्वदेश वापस आ जाएगा.
टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक महाराष्ट्र के सांस्कृतिक मामलों के मंत्री सुधीर मुनगंटीवार इस माह के आखिर में लंदन (London Tour) यात्रा करेंगे. इस यात्रा के दौरान विक्टोरिया और अल्बर्ट संग्रहालय में प्रदर्शित इस वाघ नख को वापस लाने के लिए एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए जाएंगे.
बताया जाता है कि अगर सब कुछ ठीक ठाक रहा तो प्रसिद्ध वाघ नख (Wagh Nakh) की इस साल ही घर वापसी हो सकती है. मुनगंटीवार ने कहा, ‘इस बाबत ब्रिटेन के अधिकारियों से एक पत्र प्राप्त हुआ है. जिसमें कहा गया है कि वो छत्रपति शिवाजी महाराज (Chhatrapati Shivaji Maharaj) का ‘वाघ नख’ वापस देने पर सहमत हो गए हैं. हिंदू कैलेंडर के आधार पर हम इसको उस घटना की सालगिरह वाले दिन वापस पा सकते हैं जब शिवाजी महाराज ने अफजल खान को मार डाला था. इसके अलावा वाघ नख को वापस लाने के तौर-तरीकों और कुछ अन्य तारीखों पर भी विचार विमर्श किया जा रहा है.’
क्या होता है बाघ नख
बाघ नख स्टील का बना एक हथियार है जिसमें बाघ के पंजों के नाखून की तरह नुकीली छड़ें लगी होती हैं. यह व्यक्ति के हाथ की मुट्टी में फिट बैठ जाता है. इसके दोनों तरफ रिंग होता है जिसे हाथ की पहली और चौथी उंगली में पहन लिया जाता है. इससे यह हाथ में फिट बैठ जाता है. इसके बाद हमला करने पर यह सामने वाले व्यक्ति को लहूलुहान कर देता है. इससे किसी की हत्या भी की जा सकती है. बताया जाता है कि वीर शिवाजी अपनी सुरक्षा के लिए इस विशेष हथियार को हमेशा अपने साथ रखा करते थे.
देश से ब्रिटेन कैसा पहुंचा
शिवाजी का बाघ नख एक रिपोर्ट के मुताबिक शिवाजी महाराज का ये विशेष हथियार आजादी से पहले मराठा राज्य की राजधानी सतारा में ही था. अंग्रेजों के भारत आने के बाद मराठा पेशवा के प्रधानमंत्री ने इसे ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी जेम्स ग्रांट डप को बतौर तोहफा दे दिया था. इसके बाद जब अधिकारी 1824 में अपने देश ब्रिटेन पहुंचे थे तो उन्होंने इस वहां के विक्टोरिया और अल्बर्ट म्यूजियम को दान कर दिया था. ये उस वक्त से वहीं था.




