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ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स में सुधरती भारत की स्थिति

ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स में सुधरती भारत की स्थिति
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पिछले साल की तुलना में इस साल 5 पायदान ऊपर चढ़कर 135 नंबर पर पहुंच गया है भारत।

सत्यपाल सिंह कौशिक'नारी को नारायणी मानने वाले देश भारत में नारी की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है और यह बात सिद्ध होती है हर साल जारी होने वाले लैंगिक समानता रिपोर्ट में हालांकि पिछले साल की तुलना में इस साल महिलाओं की स्थिति में थोड़ा बहुत सुधार हुआ है।लैंगिक असमानता का तात्पर्य लैंगिक आधार पर महिलाओं के साथ भेदभाव से है। परंपरागत रूप से समाज में महिलाओं को कमज़ोर वर्ग के रूप में देखा जाता रहा है। वे घ...

सत्यपाल सिंह कौशिक"

नारी को नारायणी मानने वाले देश भारत में नारी की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है और यह बात सिद्ध होती है हर साल जारी होने वाले लैंगिक समानता रिपोर्ट में हालांकि पिछले साल की तुलना में इस साल महिलाओं की स्थिति में थोड़ा बहुत सुधार हुआ है।

लैंगिक असमानता का तात्पर्य लैंगिक आधार पर महिलाओं के साथ भेदभाव से है। परंपरागत रूप से समाज में महिलाओं को कमज़ोर वर्ग के रूप में देखा जाता रहा है। वे घर और समाज दोनों जगहों पर शोषण, अपमान और भेद-भाव से पीड़ित होती हैं। महिलाओं के खिलाफ भेदभाव दुनिया में लगभग हर जगह प्रचलित है।

कार्यस्थलों पर महिलाओं को मिले सुरक्षा

महिलाओं का आर्थिक सशक्तीकरण समावेशी आर्थिक विकास के केंद्र में है और सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने के लिए महत्वपूर्ण है। दुनिया की प्रत्येक महिला और बालिका की समानता सुनिश्चित करने वाले परिवर्तनकारी उपायो को एसडीजीज़ ऐतिहासिक मंच प्रदान करते हैं। महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण हेतु निवेश करने से लैंगिक समानता, गरीबी उन्मूलन और समावेशी आर्थिक वृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है। लेकिन अर्थव्यवस्था में महिलाओं और बालिकाओं को समाहित करने और कार्यस्थलों एवं सार्वजनिक स्थानों को सुरक्षित बनाने के साथ-साथ महिलाओं और बालिकाओं के साथ होने वाली हिंसा को रोकने की भी जरूरत है। साथ ही समाज में उनकी पूर्ण भागीदारी और उनके स्वास्थ्य एवं संपन्नता पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।

ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स में भारत की स्थिति सुधरी

बात करें इस साल के ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट की तो भारत की स्थिति पिछले साल की तुलना में पांच पायदान ऊपर चढ़ी है। जिनेवा में जारी वार्षिक लैंगिक अंतराल रिपोर्ट 2022 के मुताबिक आर्थिक भागीदारी एवं अवसर के क्षेत्रों में बेहतर प्रदर्शन कर भारत 146 देशों की सूची में 135 वें स्थान पर पहुंच गया है। रिपोर्ट पर नजर डालें तो आइसलैंड विश्व के लैंगिक रुप में सर्वाधिक समता वाले देश के रुप में शीर्ष पर है। उसके बाद फिनलैंड, नार्वे, न्यूजीलैंड और स्वीडन है। जबकि सूची में भारत से नीचे सिर्फ 11 ही देश हैं जिनमें अफगानिस्तान, पाकिस्तान, कांगो, ईरान और चाड जैसे देश शामिल हैं। विश्व आर्थिक मंच ने चेतावनी दी है कि जीवनयापन के संकट से विश्व में महिलाओं के सर्वाधिक प्रभावित होने की संभावना है। श्रम बल में लैंगिक अंतराल बढ़ने से लैंगिक अंतराल को पाटने में 132 साल लगेंगे। भारत के संदर्भ में विश्व आर्थिक मंच ने कहा है कि इसका लैंगिक अंतराल अंक पिछले 16 वर्षों में इसके सातवें सर्वोच्च स्तर पर दर्ज किया गया है। लेकिन यह विभिन्न मानदंडों पर सर्वाधिक खराब प्रदर्शन करने वाले देशों में शामिल है। यह सही है कि पिछले साल से भारत ने आर्थिक साझेदारी और अवसर पर अपने प्रदर्शन में सकरात्मक बदलाव दर्ज किया है लेकिन श्रम बल भागीदारी 2021 से पुरुषों और महिलाओं दोनों की कम हुई है। विश्व आर्थिक मंच के मुताबिक महिला सांसदों व विधायकों, वरिष्ठ अधिकारियों और प्रबंधकों की हिस्सेदारी 14.6 प्रतिशत से बढ़कर 17.6 प्रतिशत हो गयी है। इसी तरह पेशेवर एवं तकनीकी श्रमिकों के रुप में महिलाओं की हिस्सेदारी 29.2 प्रतिशत से बढ़कर 32.9 प्रतिशत हो गयी है। रिपोर्ट के मुताबिक अनुमानित अर्जित आय के मामले में लैंगिक समता अंक पहले से बेहतर हुआ है। राजनीतिक सशक्तिकरण के उप सूचकांक में अंक का घटना इसलिए प्रदर्शित हुआ है कि पिछले 50 वर्षों में राष्ट्र प्रमुख के तौर पर महिलाओं की भागीदारी के तौर पर कमी आई है। भारत इस सूचकांक में 48 वें स्थान पर है। स्वास्थ्य एवं जीवन प्रत्याशा सूचकांक में भारत का रैंक 146 वां है। जबकि प्राथमिक शिक्षा में नामांकन के लिए लैंगिक समता के मामले में भारत विश्व में प्रथम स्थान पर है। लेकिन कुलमिलाकर देखें तो जीवन के विविध क्षेत्रों में लैंगिक असमानता पाटने की चुनौती बनी हुई है। इसके लिए आवश्यक है कि सभी क्षेत्रों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाया जाए।

शिक्षा मंत्रालय द्वारा जारी सर्वे रिपोर्ट 2019-20 के मुताबिक छात्राओं की मौजूदगी राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों में सबसे कम 24.7 फीसद, सरकारी डीम्ड विश्वविद्यालयों में 33.4 फीसद और राज्य एवं निजी विश्वविद्यालयों में 34.7 फीसद है। वहीं राज्य विधान अधिनियम के तहत आने वाले संस्थानों में छात्राओं की भागीदारी 61.2 फीसद, राज्य की सरकारी विश्वविद्यालयों में 50.1 फीसद और केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 48.1 फीसद रही है। आर्थिक उपक्रमों में भागीदारी की बात करें तो देश के सिर्फ 13.8 प्रतिशत कंपनी बोर्ड में महिला प्रतिनिधित्व है। इसी तरह केवल 14 प्रतिशत महिलाएं नेतृत्वकर्ता की भूमिका में हैं। श्रम के क्षेत्र में नजर दौड़ाएं तो यहां भी पुरुषों के मुकाबले महिलाओं का प्रतिनिधित्व दयनीय है। प्रशासनिक नौकरियों में महिलाओं की भागीदारी के आंकड़े बताते हैं कि आईएएस में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 20 फीसद से कम है जबकि बैंकों में 22 प्रतिशत के आसपास है। नौकरियों के मामले में विश्व बैंक अपनी रिपोर्ट में पहले ही कह चुका है कि दुनिया भर के कई देशों में महिलाओं की आर्थिक उन्नति में कानूनी बाधाएं हैं। अच्छी बात है कि भारत में इस तरह का भेदभावकारी कानून नहीं है। फिलहाल सरकार और स्वयंसेवी संगठनों के प्रयास से देश में महिला सशक्तिकरण को लेकर जागरुकता बढ़ी है और जीवन के कई क्षेत्रों में महिलाएं परचम लहरा रही हैं। गौर करें तो इसका श्रेय भारतीय संविधान और सर्वोच्च अदालत को जाता है जहां भारतीय संविधान स्त्री-पुरुष दोनों को समान अधिकार प्रदान करता है। सर्वोच्च अदालत संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करता है। भारतीय संविधान में शिक्षा, सेवा, राजनीति इत्यादि सभी क्षेत्रों में पुरुषों व महिलाओं को बराबर के अधिकार दिए हैं। भारतीय संविधान में लैंगिक असमानता को मिटाने यानी समानता को बल प्रदान करने के लिए कई प्रावधान किए गए हैं। संविधान में स्पष्ट कहा गया है कि धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर महिलाओं से भेदभाव नहीं किया जा सकता।

सरकार ने महिलाओं के खिलाफ हिंसा को समाप्त करने को अपनी प्राथमिकता बनाया है। साथ ही उनकी तस्करी, घरेलू हिंसा तथा यौन शोषण रोकने के लिए विशेष उपाय किए हैं। नीतिगत कार्यक्रमों में लैंगिकता को प्रस्तावित और एकीकृत करने के लिए प्रयास भी किए गए हैं। जनवरी 2015 में बालिकाओं का संरक्षण और सशक्तीकरण करने वाले अभियान 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' अभियान की शुरुआत की गई जिसे राष्ट्रीय स्तर पर संचालित किया जा रहा है। वित्त पोषण सेवाओं के साथ महिलाओं के दक्षता और रोजगार कार्यक्रम देश के कोने-कोने में सुविधाओं से वंचित ग्रामीण महिलाओं तक पहुंच रहे हैं। यौन शोषण, घरेलू हिंसा और असमान पारिश्रमिक से संबंधित कानूनों को भी मजबूती दी जा रही है।




Satyapal Singh Kaushik
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