राष्ट्रीय

मज़दूरों के पलायन पर बहुत बातें कही जा चुकी हैं, लेकिन यह पंद्रह बातें किसी ने नहीं की!

Shiv Kumar Mishra
16 May 2020 9:51 PM IST
मज़दूरों के पलायन पर बहुत बातें कही जा चुकी हैं, लेकिन यह पंद्रह बातें किसी ने नहीं की!
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मज़दूरों के पलायन पर यह सुशोभित के लेख के अंश हैं।सुशोभित बड़े लेखक हैं।उनका यह लेख काफी लंबा था और मेरी कोई औकात नहीं थी कि मैं उनके लिखे पर अपनी कैंची चलाऊँ।लेकिन बहुत सारे मित्र जो बहुत लंबी पोस्ट नहीं पढ़ना चाहते लेकिन किसी मुद्दे को खुले दिलो-दिमाक से जानना समझना चाहते हैं, उनकी सुविधा के लिये मैंने इसे थोड़ा संक्षेप में और पॉइंट वाइज किया है।अब जिसे पलायन को समझना होगा वो इससे बख़ूबी समझ लेगा, जिसे नहीं समझना उसे मैं क्या हजार सुशोभित भी मिलकर नहीं समझा पायेंगे।

1. मज़दूरों के पलायन पर बहुत बातें कही जा चुकी हैं। जिन्होंने कही हैं, वो स्वयं पलायन नहीं कर रहे थे, और जो कर रहे थे, उन तक वे बातें पहुंची नहीं हैं।

2. मज़दूरों का पलायन सरकार के लॉकडाउन-प्रिंसिपल के विपरीत था और यह इतनी भीषण-दुविधा थी कि इससे पार पाना सरकार के लिए कठिन साबित हुआ है।

3. लॉकडाउन का अर्थ था, देश के लोग सख़्ती से घरों में बंद रहें, ताकि संक्रमण की शृंखला तोड़ी जा सके।

4. पलायन के पीछे भावना यह रही है कि जब जीविकोपार्जन के अवसर ही समाप्त हो गए तो हम शहर में रहकर क्या करें, अपने गांवों को ना लौट जाएं। जब सरकार पूरे सिस्टम को ब्रेक लगा रही थी और रेलगाड़ियां भी रुक गई थीं, उसी समय करोड़ों लोगों के विस्थापन का प्रबंध वह किस नीति और किस मुंह से करे, यह एक भारी दुविधा रही।

5. हम कह सकते हैं कि सरकार को मज़दूरों की व्यवस्था करने के बाद ही लॉकडाउन घोषित करना चाहिए था, किंतु थोड़ा ठहरकर सोचेंगे तो आपको मानना होगा कि यह एक हाइपोथेटिकल बात है। क्योंकि लॉकडाउन जैसा फ़ैसला एक आपातकालीन-निर्णय था और बड़ी आबादी का जीवन दांव पर लगा था। सरकार एक तरफ़ लॉकडाउन की पॉलिसी देश के सामने रखकर दूसरी तरफ़ वैसे किसी पलायन को बढ़ावा नहीं दे सकती थी, जिसका सीधा-सीधा अर्थ संक्रमण का प्रसार शहर से गांव तक करना हो।

6. पॉलिसी क्रियान्वयन के लिए होती हैं, उनका ठोस और नि:शंक होना आवश्यक है। सरकार ने जैसे ही लॉकडाउन की पॉलिसी चुनी, उसके हाथ किसी भी तरह के मूवमेंट्स को बढ़ावा देने के लिए स्वत: ही बंध गए।

7. क्लासिकल-लॉकडाउन तो चीन ने किया। उसने हुबेई प्रांत की सम्पूर्ण तालाबंदी कर दी। चीन ने मानवाधिकारों को कैसे रौंदा, व्हिसलब्लोअर्स की आवाज़ को कैसे कुचला, वायरस के बारे में चेताने वाले डॉक्टर अचानक कहां गुम हो गए, मृत्यु के वास्तविक आंकड़ों को क्या उसने छुपाया और हां तो कैसे- इन सब सवालों के जवाब चाहे जो हों, लेकिन ये सब कर गुज़रना चीन के ही बस का रोग था। चीन कम्युनिस्ट तंत्र है। लोहे के दस्ताने पहनकर स्टेट पॉवर काम करती है, जिसमें को-लैटरल डैमेज तो होगा ही, यह वो मानकर चलते हैं।

8. किंतु भारत में लोकतंत्र है। लोकतंत्र का अर्थ है- बहुत सारी आवाज़ें। भारत के विशेष संदर्भ में आज लोकतंत्र का अर्थ हो गया है- बहुत सारे विलाप, बहुत सारे कटाक्ष, बहुत सारे ओपिनियन, और बहुत सारे चुटकुले। भारत में मीडिया और सोशल मीडिया बहुत सजग और मुखर है। भारत वह सब नहीं कर सकता, जो चीन करता है।

9. 24 मार्च को जब हमारे हुक्मरान ने लॉकडाउन की घोषणा की, तो धड़कते दिल और हज़ार शक़ो-शुब्हा से ही की होगी। जो भी भारत की रीति-नीति को जानता है, उसको मालूम है कि ना तो इस देश को आसानी से ताले में बंद किया जा सकता है, और ना ही परिणामों की चिंता किए बिना तालाबंदी इस पर थोपी जा सकती है।

10. पलायन शुरू हुआ। होना ही था। सरकार ने अपनी आंखों के सामने अपने लॉकडाउन-प्रिंसिपल की धज्जियां उड़ते देखीं, किंतु पलायन में सहयोग करने का अर्थ था, दो नावों पर सवार होना, और एक साथ करोड़ों की देखभाल की ज़िम्मेदारी लेने का मतलब था, पहले ही प्रस्तुत आपातकाल में एक और हिमालयी चुनौती को अंगीकार करना।

11. दुविधा विकट थी। निर्णय लेने में जहां देरी हुई, उस अंतराल में पुलिस की लाठियां चलीं। लाठियां चलीं तो ज़ालिम हुकूमत का चित्र निर्मित हुआ। उसके सामने करुणाजनित दृश्यों का काफ़िला था। घर बैठे जनमत ने चलचित्र की तरह इन्हें देखा है, और दर्शक की तरह टिप्पणी की है। किंतु सच कहूं तो उत्तर और समाधान किसी के पास नहीं हैं।

12. शायद यह होने से रोका जा सकता था, लेकिन तब सरकार के सामने सारे काम छोड़कर करोड़ों मज़दूरों को अपने हालमुक़ाम पर भोजन-सुविधा मुहैया कराने की चुनौती थी। किंतु इतनी बड़ी आबादी की निशानदेही और उस तक सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लाभों का प्रसार बिना किसी पॉलिसी फ्रेमवर्क के कैसे होता और फ्रेमवर्क बनाने का समय किसके पास था?

13. भारत में हर्षोल्लास से होली का पर्व मनाया जा रहा था, और इसके महज़ बीस-पच्चीस दिन बाद सभी ने स्वयं को अपने घरों में क़ैद पाया। दुर्भाग्य दबे पांव आया और तेज़ी से आया। कोई इसके लिए तैयार नहीं था। ना देश में, ना दुनिया में। बेमौसम बारिश की तरह कोरोना-संकट आया है। जिनके सिर पर छत थी, वे अभी बच गए हैं। जो रास्ते में थे, वो उसकी चपेट में हैं। उनके सिर पर आफ़त टूटी है। बचने का रास्ता नहीं मिला है। त्रासदियां सबसे पहले कमज़ोर-वर्ग का शिकार करती हैं।

14. ऐसा आख्यान सामने आया कि अमीरों को एयरलिफ़्ट करा लिया गया, ग़रीबों को मरने को छोड़ दिया गया। किंतु वैसा क्यों हुआ? कहीं ऐसा तो नहीं कि आईडी, पासपोर्ट, वीज़ा की प्रणाली के चलते इन चंद हज़ार लोगों की निशानदेही आसान थी? उन्हें एक सुचिंतित नीति के तहत देश लाना सुविधाजनक था। जबकि देश के कोने-कोने में फैले असंख्य मज़दूरों को घर भेजने की प्रणाली बड़ी दुष्कर थी।इसमें भी सत्तर प्रतिशत मज़दूर तो दिहाड़ी और असंगठित क्षेत्र के हैं।

15. सरकार ग़रीब-विरोधी है, यह मानना राजनीतिक अर्थों में कठिन लगता है। भारत में किसी भी दल की, कोई भी सरकार ग़रीब-विरोधी नहीं हो सकती। ग़रीब तो उलटे भारत में राजनीतिक-पूंजी हैं।भारत गांवों और ग़रीबों का देश है। कौन सरकार इस बहुसंख्य-वर्ग को चोट पहुंचाएगी? बशर्ते उसे चुनाव हारने का शौक़ ना हो।

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