
मुसलमान, आतंकवाद और बाइज़्ज़त बरी ? इन चार घटनाओं में बाइज्जत बरी होने के बाद क्या हुआ इनके साथ!

अंसार इमरान
एक बहुत लंबे अरसे से मुसलमानों को आतंकवादी करार देने की प्रथा चल रही है. सरकार चाहे किसी भी पार्टी की रही हो मुसलमानों को बेगुनाह होते हुए भी आतंकवाद के आरोपों में गिरफ्तार करके कई सालों तक जेल में बंद रखा जाता है. फिर एक समय के बाद उनको बाइज्जत बरी कर दिया जाता है. यह कहकर कि आप के खिलाफ जो सबूत पुलिस या जांच एजेंसी द्वारा पेश किए गए हैं वह आपके खिलाफ साबित नहीं हो पाए हैं.
आप ध्यान दीजिए अगर कोई व्यक्ति अपनी जिंदगी के 10 साल या 20 साल बेगुनाह होते हुए भी जेल में बिता ले उसके बाद वहां से छूट कर वापस आने के बाद उसकी सामाजिक जिंदगी क्या रह जाएगी? उसके परिवार का क्या हश्र हुआ होगा? उसकी आगामी जिंदगी का क्या होगा?
मुसलमानों को युवावस्था में गिरफ्तार किया जाता है और बुढ़ापे में उन्हें रिहा किया जाता है. ऐसी हजारों मिसालें हैं जिनमें यह बाकायदा साबित हुआ है कि जांच एजेंसियों द्वारा फ़र्ज़ी केसों में मुसलमान युवाओं को गिरफ्तार किया गया है. कई साल जेल में उनको रखा गया है और वह भी सख्त कानूनों के तहत अब चाहे यूएपीए की बात कर लीजिए चाहे टाडा की बात कीजिए चाहे पोटा की बात कीजिए जो भी कानून रहे हो उनके तहत गिरफ्तार किया जाता है.
दूसरी सबसे बड़ी बात है कि इतने साल जेल में बेगुनाह होते हुए भी जिंदगी बिताने के बाद जब वह व्यक्ति बेगुनाह साबित होता है और उसे रिहा किया जाता है तो अदालत की तरफ से उन जांच एजेंसी के अफसरों को नहीं पकड़ा जाता जिनकी वजह से एक बेगुनाह को अपनी जिंदगी का एक लंबा अरसा जेल में गुजारना पड़ा। आखिर क्या बात है कि एक बेगुनाह की जिंदगी की कोई कीमत नहीं है? उस बेगुनाह के इतने साल बेगुनाह होते हुए भी जेल में गुजरे हुए उन पलों का हर्जाना कौन भरेगा?
मैं आपको कुछ कहानियां सुनाऊंगा और यह कोई काल्पनिक कहानियां नहीं हैं. असल जिंदगी की कहानियां हैं जो पिछले कुछ सालों के अंदर घटित हुई. ऐसी घटनाएं हैं जिनमें एक व्यक्ति बेगुनाही साबित होने के बाद भी 10 साल बाद, 5 साल बाद, 8 साल बाद या 25 साल बाद जेल से छूटकर आया है.
अब आप तय करिएगा मुसलमान, आतंकवाद और बाइज़्ज़त बरी. इन तीनों शब्दों के कितने गहरे अर्थ हैं जिसको समझने के लिए आपको इन कहानियों के शब्द ब शब्द महसूस करने होंगे। तभी आप इन के दर्द को भी समझ पाएंगे और देश की राजनीति को भी समझ पाएंगे कि किस तरीके से राजनीति के चक्कर में युवाओं की जिंदगी को तबाह और बर्बाद कर दिया जाता है.
निसार अहमद - 23 साल जेल में
निसार अहमद उन तीन लोगों में से एक हैं जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने सभी आरोपों से बरी कर दिया था। देश की सबसे बड़ी अदालत ने उन्हें सुनाई गई उम्रकैद की सजा को रद्द किया और 11 मई 2016 को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया। तीनों को बाबरी मस्जिद ढहाए जाने की पहली बरसी पर हुए ट्रेन बम धमाकों के सिलसिले में उठाया गया था। इन बम धमाकों में दो यात्रियों की मौत हो गई थी और 8 घायल हो गए थे। जब तक तीनों को बरी किया जाता, उनके परिवार उनकी बेगुनाही की लड़ाई लड़ते-लड़ते टूट चुके थे।
निसार कहते हैं, “मैंने अपनी जिंदगी के 8,150 दिन जेल के भीतर बिताए हैं। मेरे लिए जिंदगी खत्म हो चुकी है। जिसे आप देख रहे हैं, वह एक जिंदा लाश है। मैं 20 साल का होने वाला था, जब उन्होंने मुझे जेल में डाल दिया। अब मैं 43 साल का हूं। आखिरी बार जब मैंने अपनी छोटी बहन को देखा था तब वह 12 साल की थी, अब उसकी 12 साल की एक बेटी है। मेरी भांजी तब सिर्फ एक साल की थी, उसकी शादी हो चुकी है। मेरी कजिन मुझसे दो साल छोटी थी, अब वह दादी बन चुकी है। पूरी एक पीढ़ी मेरी जिंदगी से गायब हो चुकी है।
11 मुसलमान व्यक्ति - 25 साल जेल के बाद रिहा
झूठे भुसावल आतंकी मामले में आरोप लगाए जाने के 25 साल बाद, 27 फरवरी 2019 को नासिक की विशेष टाडा अदालत ने 11 मुस्लिम व्यक्तियों को सभी आरोपों से बरी कर दिया। न्यायमूर्ति एस सी खाती ने सबूतों की कमी और जांच के दौरान टाडा दिशानिर्देशों के उल्लंघन का हवाला देते हुए उन्हें बरी करने का आदेश दिया।
जिन 11 लोगों को बरी किया गया है उनमें जमील अहमद अब्दुल खान, मोहम्मद यूनुस, मोहम्मद इशाक, फारूक खान, नजीर खान, यूसुफ खान, गुलाम खान, अयूब खान, इस्माइल खान, वसीमुद्दीन, शमशुद्दीन, शेख शफी, शेख अजीज, अशफाक सैयद मुर्तजा मीर, मुमताज सैयद मुर्तजा मीर, मोहम्मद हारून, मोहम्मद बफाती और मौलाना अब्दुल कादिर जैबी हैं.
“न्याय से इनकार नहीं किया गया है लेकिन इन लोगों ने अपने कीमती जीवन के इतने साल जेल में गंवाए हैं। इसके लिए कौन जिम्मेदार है? क्या सरकार उनके नुकसान की भरपाई करेगी और उनका सम्मान वापस करेगी? जमीयत उलेमा हिंद के लीगल सेल के प्रभारी गुलज़ार आज़मी ने कहा कि इन लोगों के परिवारों को भी बहुत नुकसान हुआ है, जबकि उनके परिवारों के कुछ सदस्यों की भी मृत्यु हो गई है।
“अभियोजन के आधे से अधिक गवाह अदालत में मुकर गए। इससे साबित होता है कि मामला खुद झूठे तथ्यों पर बनाया गया था। समीक्षा समिति ने भी आज से बीस साल पहले सरकार से इन लोगों के मुकदमों को निपटाने की सिफारिश की थी, लेकिन निचली अदालतों ने प्रस्ताव को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और इन 11 लोगों को उस चीज़ की कीमत चुकानी पड़ी जो उन्होंने नहीं की और 25 वर्षों के लम्बे अरसे तक अदालत और न्यायपालिका के चक्कर लगाने पड़े।
चाँद मुहम्मद - 5 साल जेल में आतंकवादी ठप्पे के साथ
नवभारत टाइम्स - 9 अक्टूबर 2022
साल 2014 में बरेली की एक अदालत ने चांद मुहम्मद (Chand Mohammed) को पांच साल 'आतंकवादी' के तौर पर जेल में बिताने के बाद निर्दोष करार देते हुए बरी कर दिया।
13 अक्टूबर 2009 को चांद को हिरासत में लिया गया था। अगले दिन, उसके रिश्तेदारों और दोस्तों को अखबार और टीवी न्यूज में किए गए दावों से जानकारी हुई कि चांद एक 'आतंकवादी' था, और नाबालिग लड़की को आतंकवादी गतिविधियों के लिए तैयार करने की कोशिश कर रहा था। पुलिस ने यह भी दावा किया, कि चांद ने पाकिस्तान में एक आतंकी शिविर में प्रशिक्षण प्राप्त किया था।
चांद कहते हैं कि मैं 'आतंकवादी' के ठप्पे के साथ ही मरूंगा, यह मुझे हर दिन सताता है। मैं अपना जीवन नए सिरे से शुरू नहीं कर पाया, क्योंकि मेरे दोस्त और रिश्तेदार अभी भी पुलिस कार्रवाई के डर से मुझसे जुड़ना नहीं चाहते हैं। चांद ने टाइम्स ऑफ इंडिया से बातचीत में कहा कि मैं नौकरी करना चाहता हूं, लेकिन कोई मुझे नौकरी नहीं देगा। मेरी प्रतिष्ठा और वर्षों के नुकसान के लिए मुझे कोई मुआवजा नहीं दिया गया। मैं जीवन की बुनियादी जरूरतों के लिए भी पूरी तरह से अपने बेटों पर निर्भर हूं।
अब्दुल हकीम - 12 साल तक विचारधीन कैदी
Maktoob Media - 6 अक्टूबर 2021
दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार, 6 अक्टूबर 2022 को मोहम्मद हकीम को जमानत दे दी। हाकिम ने 2008 के दिल्ली सीरियल ब्लास्ट मामले में 12 साल से अधिक समय तक एक विचाराधीन कैदी के रूप में बिताया है, उनका कहना है कि अदालतों को संवैधानिक अधिकारों के मरने के बाद ही ध्यान नहीं देना चाहिए।
"अदालतों को मृत्यु समीक्षक (Coroner) नहीं बनना चाहिए और कानूनी या संवैधानिक अधिकारों को केवल मृत्य होने के बाद ही नहीं सुना जाना चाहिए। इसके बजाय हमें डॉक्टर की भूमिका निभानी चाहिए,और ऐसे अधिकारों को खत्म होने से पहले उन्हें मरने से बचाना चाहिए, "यूएपीए कैदी को जमानत देते हुए ने कहा।
फरवरी 2009 में मुस्लिम व्यक्ति मुहम्मद हकीम को गिरफ्तार करते हुए, पुलिस ने दावा किया कि हकीम पर लखनऊ से दिल्ली तक एक निश्चित मात्रा में साइकिल बॉल बेयरिंग ले जाने का आरोप है और बाद में 2008 के विस्फोटों में इस्तेमाल किए गए IEDs बनाने के लिए इस्तेमाल किया गया था।
मुसलमान - आबादी में 14 फीसद और जेलों में 30 फीसद
एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक 2021 में भारतीय जेलों में बंद कैदियों में 30% से अधिक कैदी मुसलमान थे, यह अलग बात है कि मुसलमानों की जनसंख्या देश में केवल 14.2% है. इसका सीधा मतलब यह हुआ कि अपनी आबादी से भी दोगुना मुसलमान जेलों में बंद है. और तो और खास बात यह है कि इसमें एक बड़ी गिनती विचाराधीन कैदियों की है.
यह तो कुछ कहानियां है जो आपके सामने पेश की गई है इसके अलावा सैकड़ों ऐसी कहानियां है जिसमें नौजवानों की जिंदगी को सालों साल जेलों में बंद करके तबाह कर दिया गया है. इस बेबसी पर आप जरूर आंसू बहा सकते है कि एक बेगुनाह मुसलमान सालों जेल में बेगुनाह होते हुये भी यातनाओं के साथ बिताता है और एक लम्बे अरसे के बाद मानसिक मुर्दा की तरह अपनी बेगुनाही के साथ रिहा होता है.
उभरते सवाल ?
अब यहां पर कुछ सवाल उभर कर सामने आते हैं. पहला सवाल तो यह है कि क्या भारत की न्याय प्रक्रिया इतनी सुस्त है कि किसी बेगुनाह को उसकी बेगुनाही बताने में 20-20 साल का समय लगा दे? दूसरा सवाल यह है जो जांच एजेंसियां हैं चाहे पुलिस हो या कोई स्पेशल एजेंसी वह अपनी तहकीकात को पूरा करने में इतना समय क्यों लगाती है? और दूसरी बात उनकी तरफ से जो थर्ड डिग्री इस्तेमाल किया जाता है उस पर कोई सवाल क्यों नहीं उठाता है? और उनके फर्जी मामलों की वजह से कई लोगों की सालों की जिंदगी तबाह हो बर्बाद हो जाते हैं उस पर क्या?
इसके बाद एक सवाल और उठता है क्या ऐसे मामलों में मीडिया का जो शुरुआती रोल होता है उस पर इन लोगों की बेगुनाही के बाद कोई माफीनामा क्यों नहीं आता? यह मीडिया जब किसी भी मुसलमान को किसी आरोप में गिरफ्तार किया जाता है तो बिना दोष साबित हुए उसको आतंकवादी करार दे देते हैं. मगर जब वही व्यक्ति कई सालों तक न्यायिक प्रक्रिया में अपनी बेगुनाही की लड़ाई लड़ते हुए बेगुनाह बरी होता है तो यही मीडिया वाले एक छोटी सी खबर भी नहीं चलाते। अपनी उस फर्जी खबर के लिए माफी भी नहीं मांगते, जिसकी वजह से उन्होंने एक बेगुनाह को आतंकवादी साबित कर दिया था और उस मुसलमान इंसान की सामाजिक जिंदगी को तबाह हो बर्बाद कर दिया था.
आखिर क्यों होता है यह सब ?
अब यहां पर आप लोग सोचते होंगे कि यह ज़ुल्म क्यूँ होता है. तो इसके पीछे की कहानी जरा टेढ़ी है. मामला सिर्फ इतना नहीं है कि पुलिस का रोल क्या रहा या न्यायपालिका ने कितने टाइम में न्याय दिया। मामला यहां पर यह है कि यह सब मामला राजनीतिक वजहों से होते हैं. राजनीतिक पार्टियां अपनी राजनीति के चक्कर में इस तरीके के चक्रव्यूह बनाती हैं जिसका शिकार हमेशा एक आम इंसान या सीधा कहिये एक मुसलमान होता है.
नेता नगरी ने अपनी राजनीति के चक्कर में हजारों मुसलमानों की जिंदगीयों की बलि ली है और अभी भी वह मुस्तकिल जारी है. अब आपके जेहन में एक सवाल यह आता होगा कि आखिर यह सब चीजों से छुटकारा कैसे होगा कैसे सैकड़ों मुसलमानों की जिंदगी बर्बाद होने से बचेगी। कैसे सैकड़ों नौजवान बेगुनाह होते हुए भी सालों साल जिंदगी जेलों में गुजारने को मजबूर है. उनको इस चक्रव्यू से कैसे बाहर निकाला जाए.
इसका सीधा सा जवाब है आपको इसके लिए तीन जगह पर संघर्ष करना होगा।
मुसलमान और न्याय ?
पहली जगह है राजनीति। जब तक राजनीतिक तौर पर आप का संघर्ष मजबूत नहीं होगा आप को राजनीतिक तौर पर हल्के में नहीं लिया जाएगा। आपकी आवाज को सुनना मौजूदा सरकार की मजबूरी होगा तभी इन मामलों में सरकारों की तरफ से कुछ बेहतर रवैया की उम्मीद की जा सकती है.
दूसरे जगह पर पुलिस का मामला है. खास तौर पर मुसलमानों के प्रति पुलिस का जो सम्प्रदायक रवैय्या है उसके लिए भी आपको आवाज उठानी होगी। पुलिस द्वारा मुसलमानों को सीधा सीधा टारगेट करना, उनके धर्म को गालियां देना, धर्म को आधार बनाकर लोगों को थर्ड डिग्री देना, उनको झूठे मुकदमों में फंसना. यह सब को अगर आप दूर करना चाहते हैं आपको पुलिस रिफॉर्म की बात बड़े पैमाने पर इस देश में उठानी होगी और ऐसा नहीं है कि पुलिस रिफॉर्म की बात केवल मुसलमानों के उठानी चाहिए, इस देश में हर इंसान पसंद को पुलिस रिफॉर्म की बात करना बेहद जरूरी है अगर पुलिस रिफॉर्म नहीं होंगे तो आप मान के चलिए कि कुछ अरसे के बाद यह समाज पुलिस स्टेट में तब्दील हो जाएगा और पुलिस स्टेट का मतलब यह होता है कि उस स्टेट की पुलिस केवल और केवल सत्ता पक्ष की गुलाम होगी, सत्ता पक्ष उससे जोंबीज की तरह काम करवाएगी।
तीसरा मामला है जहां पर हमें आवाज उठानी चाहिए वह मामला है न्यायपालिका। यह बात हमें माननी चाहिए कि भारत में आज भी न्याय की प्रक्रिया बहुत सुस्त है. यहां पर लाखों की आबादी इस न्याय प्रक्रिया में इसी वजह से नहीं जाना चाहती है क्योंकि उन्हें मालूम है उनकी जूतियां घिस जाएंगी सर के बाल सफेद हो जाएंगे मगर उनका कोर्ट से छुटकारा नहीं होगा। कोर्ट किसी भी मामले की सुनवाई करने में इतनी देरी करता है इंसान का न्याय से भरोसा ही उठ जाता है. आज भी अगर आप डाटा निकाल कर भी बात करेंगे तो भारत के कोर्ट में पेंडिंग केसों की गिनती एक बहुत बड़े पैमाने पर मिलेगी। न्याय प्रक्रिया को तेज और रिफाइन करने की बहुत सख्त जरूरत है जिसके लिए सबको मिलकर आवाज बुलंद करने की जरूरत है.
इस ज़ुल्म ओ सितम को देख दिल घबरा रहा है तो इन पंक्तियों को एक बार पढ़ लें:
आबाद रहेंगे वीराने शादाब रहेंगी ज़ंजीरें
जब तक दीवाने ज़िंदा हैं फूलेंगी फलेंगी ज़ंजीरें
आज़ादी का दरवाज़ा भी ख़ुद ही खोलेंगी ज़ंजीरें
टुकड़े टुकड़े हो जाएँगी जब हद से बढ़ेंगी ज़ंजीरें
जब सब के लब सिल जाएँगे हाथों से क़लम छिन जाएँगे
बातिल से लोहा लेने का एलान करेंगी ज़ंजीरें
अंधों बहरों की नगरी में यूँ कौन तवज्जोह करता है
माहौल सुनेगा देखेगा जिस वक़्त बजेंगी ज़ंजीरें
जो ज़ंजीरों से बाहर हैं आज़ाद उन्हें भी मत समझो
जब हाथ कटेंगे ज़ालिम के उस वक़्त कटेंगी ज़ंजीरें।




