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लैंगिक असमानता पाटने की चुनौती

लैंगिक असमानता पाटने की चुनौती
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अरविंद जयतिलकविश्वआर्थिक मंच (डब्ल्यूईएफ) का यह खुलासा भारत के लिए राहतकारी है कि लैंगिक समता के मामले में स्थिति पहले से कुछ बेहतर हुई है। जिनेवा में जारी वार्षिक लैंगिक अंतराल रिपोर्ट 2022 के मुताबिक आर्थिक भागीदारी एवं अवसर के क्षेत्रों में बेहतर प्रदर्शन कर भारत 146 देशों की सूची में 135 वें स्थान पर पहुंच गया है। यानी पिछले वर्ष के मुकाबले पांच पायदान उपर चढ़ा है। रिपोर्ट पर नजर डालें तो आइसलैं...

अरविंद जयतिलक

विश्वआर्थिक मंच (डब्ल्यूईएफ) का यह खुलासा भारत के लिए राहतकारी है कि लैंगिक समता के मामले में स्थिति पहले से कुछ बेहतर हुई है। जिनेवा में जारी वार्षिक लैंगिक अंतराल रिपोर्ट 2022 के मुताबिक आर्थिक भागीदारी एवं अवसर के क्षेत्रों में बेहतर प्रदर्शन कर भारत 146 देशों की सूची में 135 वें स्थान पर पहुंच गया है। यानी पिछले वर्ष के मुकाबले पांच पायदान उपर चढ़ा है। रिपोर्ट पर नजर डालें तो आइसलैंड विश्व के लैंगिक रुप में सर्वाधिक समता वाले देश के रुप में शीर्ष पर है। उसके बाद फिनलैंड, नार्वे, न्यूजीलैंड और स्वीडन है। जबकि सूची में भारत से नीचे सिर्फ 11 ही देश हैं जिनमें अफगानिस्तान, पाकिस्तान, कांगो, ईरान और चाड जैसे देश शामिल हैं। विश्व आर्थिक मंच ने चेतावनी दी है कि जीवनयापन के संकट से विश्व में महिलाओं के सर्वाधिक प्रभावित होने की संभावना है। श्रम बल में लैंगिक अंतराल बढ़ने से लैंगिक अंतराल को पाटने में 132 साल लगेंगे। भारत के संदर्भ में विश्व आर्थिक मंच ने कहा है कि इसका लैंगिक अंतराल अंक पिछले 16 वर्षों में इसके सातवें सर्वोच्च स्तर पर दर्ज किया गया है। लेकिन यह विभिन्न मानदंडों पर सर्वाधिक खराब प्रदर्शन करने वाले देशों में शामिल है। यह सही है कि पिछले साल से भारत ने आर्थिक साझेदारी और अवसर पर अपने प्रदर्शन में सकरात्मक बदलाव दर्ज किया है लेकिन श्रम बल भागीदारी 2021 से पुरुषों और महिलाओं दोनों की कम हुई है। विश्व आर्थिक मंच के मुताबिक महिला सांसदों व विधायकों, वरिष्ठ अधिकारियों और प्रबंधकों की हिस्सेदारी 14.6 प्रतिशत से बढ़कर 17.6 प्रतिशत हो गयी है। इसी तरह पेशेवर एवं तकनीकी श्रमिकों के रुप में महिलाओं की हिस्सेदारी 29.2 प्रतिशत से बढ़कर 32.9 प्रतिशत हो गयी है। रिपोट के मुताबिक अनुमानित अर्जित आय के मामले में लैंगिक समता अंक पहले से बेहतर हुआ है। राजनीतिक सशक्तिकरण के उप सूचकांक में अंक का घटना इसलिए प्रदर्शित हुआ है कि पिछले 50 वर्षों में राष्ट्र प्रमुख के तौर पर महिलाओं की भागीदारी के तौर पर कमी आई है। भारत इस सूचकांक में 48 वें स्थान पर है। स्वास्थ्य एवं जीवन प्रत्याशा सूचकांक में भारत का रैंक 146 वां है। जबकि प्राथमिक शिक्षा में नामांकन के लिए लैंगिक समता के मामले में भारत विश्व में प्रथम स्थान पर है। लेकिन कुलमिलाकर देखें तो जीवन के विविध क्षेत्रों में लैंगिक असमानता पाटने की चुनौती बनी हुई है। इसके लिए आवश्यक है कि सभी क्षेत्रों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाया जाए। गौर करें तो राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों, व्यवसायिक पाठ्यक्रमों में आधी-आबादी की मौजूदगी कम है। अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वे (एआईएसएचई) की रिपोर्ट से उद्घाटित हो चुका है कि राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों और व्यवसायिक पाठ्यक्रमों में बेटियों का नामांकन शैक्षणिक पाठ्क्रमों की तुलना में कम है। शिक्षा मंत्रालय द्वारा जारी सर्वे रिपोर्ट 2019-20 के मुताबिक छात्राओं की मौजूदगी राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों में सबसे कम 24.7 फीसद, सरकारी डीम्ड विश्वविद्यालयों में 33.4 फीसद और राज्य एवं निजी विश्वविद्यालयों में 34.7 फीसद है। वहीं राज्य विधान अधिनियम के तहत आने वाले संस्थानों में छात्राओं की भागीदारी 61.2 फीसद, राज्य की सरकारी विश्वविद्यालयों में 50.1 फीसद और केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 48.1 फीसद रही है। आर्थिक उपक्रमों में भागीदारी की बात करें तो देश के सिर्फ 13.8 प्रतिशत कंपनी बोर्ड में महिला प्रतिनिधित्व है। इसी तरह केवल 14 प्रतिशत महिलाएं नेतृत्वकर्ता की भूमिका में हैं। श्रम के क्षेत्र में नजर दौड़ाएं तो यहां भी पुरुषों के मुकाबले महिलाओं का प्रतिनिधित्व दयनीय है। प्रशासनिक नौकरियों में महिलाओं की भागीदारी के आंकड़े बताते हैं कि आईएएस में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 20 फीसद से कम है जबकि बैंकों में 22 प्रतिशत के आसपास है। नौकरियों के मामले में विश्व बैंक अपनी रिपोर्ट में पहले ही कह चुका है कि दुनिया भर के कई देशों में महिलाओं की आर्थिक उन्नति में कानूनी बाधाएं हैं। अच्छी बात है कि भारत में इस तरह का भेदभावकारी कानून नहीं है। फिलहाल सरकार और स्वयंसेवी संगठनों के प्रयास से देश में महिला सशक्तिकरण को लेकर जागरुकता बढ़ी है और जीवन के कई क्षेत्रों में महिलाएं परचम लहरा रही हैं। गौर करें तो इसका श्रेय भारतीय संविधान और सर्वोच्च अदालत को जाता है जहां भारतीय संविधान स्त्री-पुरुष दोनों को समान अधिकार प्रदान करता है। सर्वोच्च अदालत संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करता है। भारतीय संविधान में शिक्षा, सेवा, राजनीति इत्यादि सभी क्षेत्रों में पुरुषों व महिलाओं को बराबर के अधिकार दिए हैं। भारतीय संविधान में लैंगिक असमानता को मिटाने यानी समानता को बल प्रदान करने के लिए कई प्रावधान किए गए हैं। संविधान में स्पष्ट कहा गया है कि धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर महिलाओं से भेदभाव नहीं किया जा सकता। दो राय नहीं कि इन संवैधानिक प्रावधानों और गत वर्षों में हुए सरकारी प्रयासों के परिणामस्वरुप भारत में लैंगिक विभेद में कमी आयी है। उसके सकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं। उदाहरण के तौर पर देश के विभिन्न राज्यो की पंचायतों में महिलाओं को आरक्षण प्रदान किया गया है। इस पहल से पंचायतों में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ी है। हाल ही में देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में संपन्न हुए पंचायत चुनाव में पुरुषों से ज्यादा महिलाएं पंच परमेश्वर चुनी गयी हैं। 53.7 फीसदी पंचायतों में सत्ता अब महिलाओं के हाथों में है। राज्य में ग्राम प्रधान के 58,176 पदों पर चुनाव हुए जिसमें 31,212 पदों पर महिलाओं ने जीत हासिल की। कुछ ऐसा ही आंकड़ा देश के अन्य राज्यों से भी सामने आ रहा है जहां महिलाओं की भागीदारी और प्रतिनिधित्व बढ़ रहा है। लेकिन यहां ध्यान रखना होगा कि संख्या के लिहाज से भले ही यह आंकड़ा प्रतिनिधित्व को मजबूती देता हो पर एक सच यह भी है कि नेतृत्व की बागडोर अभी भी पुरुष अभिभावकों के ही हाथों में ही है। बात चाहे गांव, ब्लाॅक या तहसील की हो अथवा जिला स्तर की सभी आवश्यक स्थानों पर निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों के पति या अभिभावक ही उनके दायित्वों का निर्वहन करते देखे जा रहे हैं। यह स्थिति ठीक नहीं है। इससे निर्वाचित महिला सरपंचों की भूमिका महज एक रबर स्टैंप बनकर रह गयी है। यह हस्तक्षेप पंचायतों में महिलाओं की भूमिका को सीमित करने के साथ ही पंचायती राज के पावन उद्देश्यों को नष्ट करता है। एक अरसे से संसद में महिला आरक्षण को लेकर बहस जारी है। लेकिन विडंबना है कि अभी तक किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सका है। नतीजा संसद और राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी कम है। लोकसभा में कुल महिला सदस्यों की संख्या तकरीबन 79 है जो कुल सदस्यों के 15 फीसदी के आसपास है। इसी तरह राज्यसभा में महिलाओं की संख्या तकरीबन 25 है यानी 10 फीसदी है। अच्छी बात यह है कि केंद्रीय मंत्रिमंडल में हुए विस्तार के बाद अब मंत्रिमंडल में कुल महिला मंत्रियों की संख्या तकरीबन एक दर्जन तक पहुंच गयी है। लेकिन विचार करें तो यह अभी भी पुरुषों के मुकाबले कम है। गत वर्ष प्रकाशित डब्ल्यूईएफ (वल्र्ड इकनाॅमिक फोरम) ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2020 के अनुसार भारत राजनीतिक सशक्तिकरण के मामले में 18 वें स्थान पर है। आर्थिक भागीदारी और अवसर में 149 वें, शिक्षा प्राप्ति में 112 वें, स्वास्थ्य और उत्तरजीविता में 150 वें तथा समग्र सूचकांक में 108 वें स्थान पर है। मंत्रालयिक पदों पर 30 फीसदी महिलाओं के साथ भारत की रैंकिंग 69 वीं है और संसद में महिलाओं के मामले में 17 फीसदी के साथ 122 वीं है। भारत के 28 राज्यों में से वर्तमान में केवल पश्चिम बंगाल में एक महिला मुख्यमंत्री हैं। देश का एक भी राज्य ऐसा नहीं है जहां महिला मंत्रियों की संख्या एक तिहाई हो। 65 फीसदी राज्यों के मंत्रिमंडल में 10 फीसदी से कम महिला प्रतिनिधित्व है। यह स्थिति चिंतित करने के अलावा लोकतांत्रिक भारत में आधी आबादी के साथ लैंगिक भेदभाव को उजागर करने वाला है।


Satyapal Singh Kaushik
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