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शास्त्रीजी की मौत का रहस्य ..

Shiv Kumar Mishra
10 Sept 2023 5:24 PM IST
शास्त्रीजी की मौत का रहस्य ..
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The mystery of Shastriji's death

ताशकन्द में शांति समझौते की रात उनकी मृत्यु हुई। सुबह काबुल के लिए उड़ना था। रात 1.20 पर वह सीने में दर्द और सांस लेने में तकलीफ की शिकायत करते हैं।

उनके निजी डॉक्टर द्वारा इलाज किया जाता है, मगर 1.32 पर नब्ज थम जाती है। तब तक रूसी दल आ जाता है। मगर बेजान शरीर मे जान फूंकने की कोशिश बेकार रहती हैं।

युद्ध के पहले, भारत पाकिस्तान कच्छ के रण में भिड़ चुके थे। इस सीमा विवाद को, अंतरराष्ट्रीय पैनल में भेजने के, शास्त्री के फैसले के खिलाफ विरोध था।

विपक्ष ने संसद के सामने जबरजस्त रैली की। शास्त्री दबाव में आये, और 20 अगस्त को विदेश सचिव स्तर की वार्ता कैंसल कर दी।

उत्साहित जनसंघ ने कहा- यदि जनता इतनी सक्रिय और सतर्क रहेगी, तो कच्छ समझौता कागज के टुकड़े में सिमट कर रह जाएगा।

शांति प्रयास फेल हुए, युद्ध 1 सितंबर को शुरू हुआ। शास्त्री ने 6 सितंबर को एक सर्वदलीय बैठक बुलाई। दीनदयाल उपाध्याय भी थे।

जनसंघ नें शांति की किसी भी पहल का कड़ा विरोध किया। भीतर की सचाई थी कि इस वक्त पाकिस्तान को एडवांटेज था, कश्मीर हमारे हाथ से निकलने की अवस्था मे था।

तभी हमारी किस्मत ने पलटी खाई। पाकिस्तान ने, बीच युद्ध मे जनरल बदल दिया।

पाक सेना में कन्फ्यूजन का फायदा उठाकर हमने हाजी पीर जीता। साथ ही लाहौर पर ताबड़तोड़ हमले ने पाकिस्तान को हक्का बक्का कर दिया।

पाकिस्तान सिर्फ कश्मीर (विवादित हिस्से) में लड़ने की तैयारी में था, इंटरनेशनल बार्डर पर नही। अब उसने समझौते की पेशकश की।

हालात तो इधर भी खस्ता ही थे।

शास्त्री ने स्वीकार किया।

ताशकंद की तैयारी होने लगी।

खबर आम हुई तो विपक्ष हमलावर हो गया। स्पस्ट था कि कोई समझौता, युद्ध पूर्व स्थिति रिस्टोर करने पर होगा।

याने लाहौर लौटाना होगा, हाजी पीर भी। सच तो यह है कि हमको कश्मीर मे हारी हुई ज्यादा जमीन मिलती।

पर जनता को क्या ही पता। सरकार जीत को प्रचारित करती है, हार पर चुप रहती हैं। तो हमे लगता है कि हम सब जगह, सिर्फ जीत रहे है।

विपक्ष इसपर खेल लेता है।

तो शास्त्री ताशकंद के लिए उड़े, इधर दिल्ली काले झंडो से पट गयी। अखबारी बयानों में शास्त्री की देशभक्ति और सक्षमता पर सवाल उठने शुरू हो गए।

पीएम आवास के बाहर प्रदर्शन शुरू हो गया। शास्त्री हाय हाय, शास्त्री ये, शास्त्री वो। आवाज घर के भीतर तक जा रही होगी। परिवार के लिए नया अनुभव रहा होगा।

दोपहर में समझौते के बाद शास्त्री ने घर फोन किया, बेटी ने उठाया। बताया कि बाहर हाय हाय चल रही है। बड़ा विरोध है। शास्त्री ने पत्नी से बात करनी चाही।

जरा सोचिए, बेटी ने क्या जवाब दिया होगा??

"अम्मा नाराज हैं। बात नही करना चाहती।आपने जीती हुई जमीन पाकिस्तान को क्यो दे दी??"

शब्दों के बरछे से बिंधे शास्त्री की शाम ताशकंद के जलसों में गुजरी। अयूब ने शास्त्री के कसीदे पढ़े। पाकिस्तानी प्रशंसा से क्या राहत मिलती, जब दिमाग भारत मे विरोध की सुनामी देख रहा था।

डिनर पर, सुबह काबुल में भारतीय अखबार मंगाने का आदेश दिया। इसी समय निजी सचिव का फोन आया। शास्त्री ने पूछा- क्या माहौल है??

जवाब मिला- प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के सुरेंद्र नाथ तिवारी और जनसंघ के अटल बिहारी ने समझौते की आलोचना की है।

दिल्ली में आपके लौटने पर विरोध प्रदर्शन की तैयारी है। काले झंडे लगे हुए हैं।

शास्त्री प्रधानमंत्री नही बनना चाहते थे। कारण कमजोर स्वास्थ्य, दिल की समस्या थी। पीएम बनने के पहले कम से कम 1 हार्ट अटैक तो आ चुका था।

निजी डॉक्टर चुघ, दिल की समस्याओं की दवायें लेकर चलते थे। वक्त आने पर उनकी तैयारियां धरी की धरी रह गयी।

जनसंघ की भी तैयारी मिट्टी में मिल गयी। काले झंडो से जिसका स्वागत करना था, वह तो लाश बनकर आया।

शास्त्री की मौत के ईर्दगिर्द, तमाम मिस्ट्री घूमती है। पोस्टमार्टम नही हुआ, चेहरा नीला, खून के धब्बे थे।

सुभाष की मौत भी ऐसी मिस्ट्री है। मगर जहां ऐसी कहानियों को सुभाष का परिवार खारिज करने का प्रयास करता है। वहीं शास्त्री की मौत पर तमाम कहानियां, परिवार के बयानों से ही पैदा होती हैं।

उनके बेटे ने पहली बार चुनाव लड़ने पर मेरठ में " ताशकंद के शहीद के बेटे" के रूप में वोट मांगा। उनकी पत्नी रीता शास्त्री भाजपा सांसद रही। सुनील शास्त्री वीपी सरकार के मंत्री रहे।

60 साल गुजर चुके। ताशकंद फाइल पर फ़िल्म बनी, पर फाइलों के ढेर पर बैठकर वोट कूटने वाले, फाइल खोलकर कुछ नही बताते।

व्हाट्सप फार्वर्ड जरूर करते हैं।

शास्त्री की मौत, उनको गरियाने का लाभ जनसंघ को अच्छा मिला। उसकी सीटें 35 हो गयी। ये अब तक इतिहास का श्रेष्ठ प्रदर्शन था।

कांग्रेस 283 सीट के साथ, तब तक के अपने बदतरीन प्रदर्शन पर थी।

मनीष कुमार

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