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(Udaipur Massacre): तालिबानी मानसिकता से ग्रसित उदयपुर हत्याकांड

(Udaipur Massacre): तालिबानी मानसिकता से ग्रसित उदयपुर हत्याकांड
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*सत्यपाल सिंह कौशिक*उदयपुर की दुस्साहसिक घटना जिसमें कन्हैयालाल साहू की दो जेहादियों द्वारा हत्या की जाती है अत्यंत ही निंदनीय और कायरतापूर्ण है। यह कृत्य तालिबानी और इस्लामिक स्टेट के आतंकियों जैसा है जो सर से धड़ अलग करके वीडियो जारी करते हैं। जिस तरह उनका मकसद दहशतगर्दी के जरिए गैर-इस्लामिक लोगों को डराना होता है, ठीक उसी तरह इन दोनों जेहादियों ने भी कुछ इसी तरह का संदेश दिया है। उनका दुस्साहस...

*सत्यपाल सिंह कौशिक*

उदयपुर की दुस्साहसिक घटना जिसमें कन्हैयालाल साहू की दो जेहादियों द्वारा हत्या की जाती है अत्यंत ही निंदनीय और कायरतापूर्ण है। यह कृत्य तालिबानी और इस्लामिक स्टेट के आतंकियों जैसा है जो सर से धड़ अलग करके वीडियो जारी करते हैं। जिस तरह उनका मकसद दहशतगर्दी के जरिए गैर-इस्लामिक लोगों को डराना होता है, ठीक उसी तरह इन दोनों जेहादियों ने भी कुछ इसी तरह का संदेश दिया है। उनका दुस्साहस देखिए कि उन्होंने खुद के बनाए वीडियों में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी जान से मारने की धमकी दी है। गौर करें तो यह सामान्य नहीं बल्कि असामान्य घटना है। इससे कई तरह के सवाल उपजते हैं। मसलन क्या इस हत्याकांड के पीछे जेहादी शक्तियां हैं जो पिछले दिनों नूपुर शर्मा की टिप्पणी के मसले पर देश को जलाने की कोशिश की थी ? क्या येे शक्तियां इन दोनों हत्यारों के वीडियो के जरिए गैर-इस्लामिक समाज के लोगों को डराने की साजिश रच रहे हैं? क्या इन दोनों हत्यारों के पीछे पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी संगठनों का हाथ हैं? इन सभी संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता। इसलिए कि इन हत्यारों ने पूरे इत्मीनान से इस हत्याकांड को अंजाम दिया और वीडियो को जारी किया। उनकी इन हरकतों से साफ पता चलता है कि ये हत्यारें जेहादी आतंकी संगठनों से जुड़े हैं और इन्हें प्रशिक्षण भी हासिल है। गौर करें तो इस हत्याकांड के लिए के लिए सिर्फ दोनों जेहादी ही जिम्मेदार नहीं है। वे लोग भी जिम्मेदार हैं जो नुपूर शर्मा के मसले पर देश को जलाने और धमकाने और जेहादी तत्वों को उकसाने-भड़काने का खेल रचा। भारत एक लोकतांत्रिक देश है। यहां कानून का शासन है न कि शरिया का। अगर कोई व्यक्ति किसी धर्म या मजहब के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी करता है तो निःसंदेह उसे सजा मिलनी चाहिए। लेकिन उसे सजा देने का अधिकार किसी व्यक्ति या संगठन का नहीं है। यह काम न्यायालय का है। लेकिन ऐसा जान पड़ता है कि कुछ जेहादी मानसिकता वाले लोग भारत को शरिया कानून के फ्रेम में फिट करना चाहते हैं। यह राष्ट्र की एकता से खिलवाड़ करने जैसा है। उचित होगा कि इन जेहादी मानसिकता वाले हत्यारों के खिलाफ देश निर्णायक कदम उठाए। कितना अच्छा होता कि जो लोग नूपुर शर्मा के मसले पर देश को आग में झोंकने पर आमादा थे वे इन दोनों हत्यारों के खिलाफ भी अपनी आवाज बुलंद करते। अच्छा यह भी होता कि सुदूर खाड़ी के वे देश जो नूपुर शर्मा के मामले में आगबबूला थे, वे भी इन हत्यारों के खिलाफ अपना आक्रोश दिखाते। लेकिन सभी की चुप हैं।

वैसे देखा जाए तो उदयपुर का इतिहास ही खूनी रहा है।

जब इस शहर के संस्थापक राणा उदय सिंह छोटे थे तो उनके चाचा बनबीर सिंह उन्हें मारना चाहते थे। लेकिन राणा की दासी पन्ना धाय ने उदय सिंह की जगह अपने बेटे चंदन को रख दिया और मेवाड़ के भावी राजा को बचा लिया। उदय सिंह ने गुजरात और राजपुताना की सीमा पर उदयपुर शहर बसाया। लेकिन, यह शहर उनके बेटे महाराणा प्रताप के नाम से प्रचलित हुआ। वे मुगलों का वीरतापूर्ण प्रतिरोध करने के प्रतीक हैं. बलिदान, साहस और सामाजिक समरसता के लिए पहचाने जाने वाला उदयपुर अब आतंक और साम्प्रदायिक का प्रतीक बन चुका है।

राजस्थान का सुंदर शहर उदयपुर अपनी खूबसूरत झीलों, पहाड़ों, हरे भरे जंगलों और भव्य किलों के लिए दुनिया भर में पूर्व के वेनिस के रूप में जाना जाता है. दुनिया भर के लोग यहां प्रेम, इतिहास और प्रकृति के उपहारों को सेलिब्रेट करने के लिए यहां आते हैं. सालों से यहां हिंदू, मुस्लिम और दाऊदी बोहरा समुदाय के लोग सद्भभावनापूर्वक रहते हैं. सिटी पैलेस के सामने पिछोला झील पर तीज और ईद जैसे त्योहार मनाते हैं. आतंक के इस क्रूर कृत्य ने इस सुंदर और ऐतिहासिक शहर का नाम खराब किया है।

कुछ महीने पहले, यहां के शहर भीलवाड़ा में आगजनी और दंगे हुए थे. भीलवाड़ा को मेवाड़ के प्रवेश द्वार के रूप में देखा जाता है. भौगोलिक क्षेत्र के लिहाज से जिसकी वास्तविक राजधानी उदयपुर है।

उदयपुर की घटना का प्रभाव न केवल राजस्थान बल्कि गुजरात में भी पड़ता है

उदयपुर में जो कुछ होता है, उसका प्रभाव न केवल मेवाड़ और राजस्थान में बल्कि गुजरात में भी पड़ता है। आईएसआईएस स्टाइल में की गई टेलर की इस हत्या से इस क्षेत्र में सांप्रदायिक तनाव बढ़ेगा और अगर दोनों राज्यों की सरकारों ने इसे सावधानी से नहीं संभाला तो आगे हालात खराब हो सकते हैं।

उचित होगा कि अब राजस्थान सरकार इस हत्याकांड से जुड़े मुकदमे को फास्ट ट्रैक कोर्ट में ले जाए और हत्यारों को उनके किए की सजा दिलाए। फिलहाल राजस्थान सरकार ने इस हत्याकांड की जांच के लिए एसआईटी का गठन कर दिया है। पर राहत की बात यह है कि केंद्र सरकार ने इस घटना को महज दो जेहादी मानसिकता वाले हत्यारों की कारस्तानी नहीं माना है, बल्कि इसकी गंभीरता को देखते हुए इसकी जांच के लिए आतंकवाद निरोधी जांच एजेंसी (एनआईए) को उदयपुर भेज दिया है। संभव है कि आतंकवाद विरोधी कानून गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम कानून के तहत मामला दर्ज होने के बाद यह मामला जांच के लिए एनआईए को सौंप दिया जाए। सुरक्षा एजेंसियों की नजर में यह हत्याकांड आतंकी संगठनों से भी जुड़ा हो सकता है। इस हत्याकांड की जांच के लिए एनआईए इसलिए सर्वाधिक उपयुक्त है कि उसे आतंकी संगठनों को बेनकाब करने में महारत हासिल है। याद होगा गत वर्ष पहले इस राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआइए) ने आतंकी संगठन आईएसआईएस से प्रेरित माॅड्यूल 'हरकत उल हर्ब ए इस्लाम' के खतरनाक मंसूबे को समय रहते ही उजागर कर दिया था। यह संभव है कि कन्हैयालाल साहू के हत्यारे भी कुछ इसी तरह के आतंकी संगठनों से जुड़े हुए हों। ऐसा इसलिए कि गिरफ्तार किए गए एक हमलावर की पहचान रियाज अख्तरी के रुप में हुई है जिसका संबंध पाकिस्तान स्थित दावत-ए-इस्लामी से जुड़ा पाया गया है। याद होगा दावत-ए-इस्लामी के कुछ सदस्य 2011 में पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के गवर्नर सलमान तासीर की हत्या समेत कई आतंकी घटनाओं में शामिल पाए गए थे। सलमान तासीर ईशनिंदा कानून के विरोधी थे। पाकिस्तान के कट्टर समूह उन्हें तनिक भी पसंद नहीं करते थे। यह भी संभव है कि दावत-ए-इस्लामी के आतंकी भारत में मौजूद हों। अन्य इस्लामिक संगठनों की तरह दावत-ए-इस्लामी संगठन भी दुनिया भर में शरिया कानून का हिमायती है। उसके सदस्य ऐसे लोगों की हत्या से तनिक भी नहीं गुरेज नहीं करते हैं जो इस्लाम के विरोधी हैं या इस्लाम पर टिप्पणी करते हैं। कन्हैयालाल साहू की हत्या के तर्ज पर गत वर्ष पहले उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में हिंदू समाज पार्टी के अध्यक्ष कमलेश तिवारी की हत्या गला रेतकर कर दी गयी थी। इन दोनों हत्याओं की समानता से साफ है कि भारत में पसरे कुछ जेहादी लोगों की मानसिकता इस्लाम पर टिप्पणी करने वालों को हत्या के अंजाम तक पहुंचाना और भाारत का इस्लामीकरण कर शरिया कानून लागू करना है।

वैसे देखा जाए तो अभी तक जो परिदृश्य देखने को मिला है उसमें इस हत्याकांड पर केंद्र सरकार का रुख काफी सकारात्मक रहा है, जिसने आगे बढ़कर अपनी जिम्मेदारियों को समझते हुए तत्काल एनआईए को उदयपुर भेजकर हत्याकांड से जुड़े सभी पहलुओं पर अपनी निगरानी कड़ी कर दी है।

Satyapal Singh Kaushik
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