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नशे की गिरफ्त में युवा पीढ़ी

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भारत में विश्व की सबसे अधिक युवा आबादी रहती है।

भारत में विश्व के सबसे अधिक युवा रहते हैं शायद इसीलिए भारत को युवाओ का देश कहा जाता है। किसी भी देश की तरक्की में वहां के युवाओं का बहुत बड़ा योगदान होता है। इस बात को और चरितार्थ करती हैं यह पंक्तियां- 'संघर्षों के साये में इतिहास हमारा पलता है। जिस ओर जवानी चलती है उस ओर जमाना चलता है।' लेकिन यह क्या आज हमारे देश के युवा अपने कर्तव्यपथ से विमुख हो गए हैं और नशाखोरी की तरफ बढ़ चले हैं। नशीली...

भारत में विश्व के सबसे अधिक युवा रहते हैं शायद इसीलिए भारत को युवाओ का देश कहा जाता है। किसी भी देश की तरक्की में वहां के युवाओं का बहुत बड़ा योगदान होता है। इस बात को और चरितार्थ करती हैं यह पंक्तियां- "संघर्षों के साये में इतिहास हमारा पलता है। जिस ओर जवानी चलती है उस ओर जमाना चलता है।"

लेकिन यह क्या आज हमारे देश के युवा अपने कर्तव्यपथ से विमुख हो गए हैं और नशाखोरी की तरफ बढ़ चले हैं। नशीली दवाओं एवं नशीले मादक पदार्थों की पहुंच बड़े-बड़े महानगरों से होते हुए छोटे शहरों, कस्बों के गलियारों से होते हुए गांवों तक पहुंच चुकी है।शराब,गुटखा, तम्बाकू,बीड़ी-सिगरेट, कोरेक्स, ड्रग्स, नशीली टेबलेट्स, चरस,गांजा, अफीम, स्मैक सहित भांति-भांति के नशीले पदार्थों की खेप पर खेप बड़े स्तर से लेकर छोटे स्तर तक बड़ी सुगमता से पहुंच रही है। आज हम भले ही बालश्रम निषेध की बात कर लें लेकिन इस कानून की जमीनी हकीकत कितनी है किसी से छिपी नहीं है। बड़े-बड़े शहरों में कबाड़ बीनते बच्चे वाहनों के पंचर बनाने में प्रयुक्त होने वाले पदार्थ साल्यूशन को भी नशे के तौर पर सूंघते हैं। नशे का प्रसार इतना व्यापक हो चुका है कि बच्चे किशोरावस्था से ही इसकी चपेट में आने लग जाते हैं। बच्चे घर से कोचिंग के लिए जाते हैं तथा पान की गुमटियों से सिगरेट की फूंक मारनी प्रारंभ कर देते हैं। सिगरेट पीना तो जैसे लाइफस्टाइल का हिस्सा हो गया। अधिकांशत: इंजीनियरिंग,डॉक्टरी और एमबीए करने वाले छात्र-छात्राएं इस नशे को फैशन के तौर पर आजमा रहे हैं। नैतिकता का इतना पतन आजके पंद्रह-बीस साल पहले तक नहीं था। बच्चों के मन में अभिभावकों का इतना डर था कि वह किसी मादक पदार्थ बेचने वाले दुकानदार की दुकान पर खड़ा होना नहीं चाहते थे। लेकिन आज का दौर कुछ और है। आज के अधिकांश युवा बड़े शौक से बिना किसी के डर के पान-गुटखा बेचने वाले की दुकान पर खड़े होकर गुटखा खाते हैं और सिगरेट की फूंक मारते हैं।

संयुक्त परिवार के सिमटते दायरे एवं एकल परिवार की अवधारणा के चलते बच्चों की परवरिश में दादा-दादी एवं अन्य सम्बंधों की भूमिका नगण्य हो गई जिसके चलते अब बच्चों की देखभाल एवं जिम्मेदारी केवल माता-पिता के कंधों पर आ गई। जीवन की व्यस्ताओं के चलते माता-पिता का भी बच्चों से नाता लगभग शून्य सा ही रह गया। बच्चों ने जैसा बतलाया माता-पिता ने उसे स्वीकार कर लिया, असल में बच्चों के लिए माता-पिता के पास इस बात के लिए समय ही नहीं रह गया कि वे अपने बच्चों की आदतों एवं उनकी दिनचर्या की निगरानी कर सकें। इसी के चलते जब बच्चों पर कोई अंकुश नहीं रह गया तो वे नशे जैसी बुरी आदतों के शिकार होने लग गए।

कॉलेज आते -आते नशे का दायरा और भी बढ़ता चला जाता है तथा बुरी संगत के चलते गुटखे एवं सिगरेट का सेवन करने वाले बच्चे अब वयस्कता के साथ ही शराब, भांग, गांजा इत्यादि का प्रयोग भी करने लगते हैं। इनमें हम उन्हें भी शामिल कर लें जो स्कूल के बाद पढ़ाई छोड़ चुके हैं, तो भी हम पाते हैं कि उनमें भी नशे के प्रति आकर्षण उतना ही है। देश के किसी भी शहर,कस्बे,गांव को ले लीजिए आपको अधिकांशतः युवा नशे की लत के शिकार मिल जाएंगे। अनेकानेक ऐसे मामले नित-प्रतिदिन देखने को मिलतें हैं कि शराब, ड्रग्स, नशीली टेबलेट्स का सेवन करने के कारण युवाओं की किडनी, लीवर,फेफड़े खराब होते जा रहे हैं। इतना ही नहीं कैंसर एवं अन्य गंभीर बीमारियों के कारण मौत के आंकड़ों में वृद्धि होती चली जा रही है, उसके मूल में सिर्फ एक ही कारण- 'नशीले पदार्थों' का सेवन है। नशे के कारण ही चोरी,लूट-पाट, हिंसा में युवाओं की सर्वाधिक संलिप्तता इस बात का सबूत है कि नशे ने इस देश के भविष्य को पल्लवित होने से पहले ही उसके विनाश के द्वार खोल दिए हैं।

आंकड़े बताते हैं कि कुछ सालों में शराब सेवन में काफी इजाफा हुआ है। अमीर से गरीब और बच्चे से बुजुर्ग तक इस लत के शिकार हो रहे हैं। शराब के अतिरिक्त गांजा, अफीम और दूसरी नशीली चीजें भी काफी प्रचलन में हैं। शराब कानूनी रूप से प्रचलित है तो गांजा-अफीम आदि प्रतिबंधित होने के बावजूद चलन में है। देश में करीब 21.4 प्रतिशत लोग शराब के नशे के शिकार हैं। तीन प्रतिशत लोग भांग-गांजे का सेवन करते हैं। 0.7 प्रतिशत लोग अफीम और 3.6 प्रतिशत लोग प्रतिबंधित ड्रग लेते हैं। 0.1 प्रतिशत लोग इंजेक्शन के जरिए जानलेवा ड्रग के शिकार हैं।

एक सर्वे के अनुसार भारत में गरीबी की रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले लगभग 37 प्रतिशत लोग नशे का सेवन करते हैं। इनमें ऐसे लोग भी शामिल है जिनके घरों में दो जून रोटी भी सुलभ नहीं है। जिन परिवारों के पास रोटी-कपड़ा और मकान की सुविधा उपलब्ध नहीं है और सुबह-शाम के खाने के लाले पड़े हुए हैं उनके मुखिया मजदूरी के रूप में जो कमा कर लाते हैं उसे वे शराब पीने में फूंक डालते हैं। इन लोगों को अपने परिवार की चिंता नहीं है कि उनके पेट खाली हैं और बच्चे भूख से तड़प रहे हैं। ऐसे लोगों की संख्या भी लगातार बढ़ती जा रही है। उनका कहना है कि वे गम को भुलाने के लिए नशे का सेवन करते हैं। उनका यह तर्क कितना बेमानी है जब यह देखा जाता है कि उनका परिवार भूखों मर रहा है।

न केवल आधुनिक युग में बल्कि प्राचीन काल में भी शराब का सेवन राजा-महाराजाओं के द्वारा किया जाता था। महाभारत और रामायण काल में मदिरा सेवन के वर्णन मिलते हैं, लेकिन वहां भी इसे एक बुरी वस्तु के रूप में ही इसे चित्रित किया गया है। मदिरा का सेवन आसुरी प्रवृत्ति के लोग ही करते थे और इससे समाज में उस समय भी असुरक्षा, भय और घृणा का वातावरण उत्पन्न होता था।

नशे की प्रवृति को बढ़ावा देने में हमारी फिल्मों का भी कम योगदान नहीं है। जिन हीरो को हमारे युवा अपना आदर्श मानते हैं वही हीरो अपने व्यापार को बढ़ाने और पैसा कमाने के लिए शराब , गुटखा आदि मादक पदार्थों का प्रचार करते हैं। दरअसल, फिल्मों में देखकर ही युवाओं में नशे की लत बढ़ रही है। ऐसे में जो सीधे फिल्मों से जुड़ा है वो बड़ी पार्टियों में शामिल होने और स्टेटस सिंबल के तौर पर नशे को बढ़ा रहे हैं। अभी कुछ दिन पहले की बात है कि एक सुपरस्टार का बच्चा ड्रग्स के सेवन में जेल की हवा खा चुका है।जिसको लेकर देश में खूब हो- हल्ला मचा हुआ था।

सोचने वाली बात है कि जब देश की युवा पीढ़ी नशे के चलते बर्बाद हो जाएगी, तब किसी भी तरक्की का स्वप्न सिर्फ और सिर्फ स्वप्न ही रह जाएगा। दावे-आंकड़े कुछ भी हों किन्तु वास्तविकता तो सबके सामने है कि नशे ने हमारी पूरी युवा पीढ़ी को अपनी चपेट में ले लिया है।

युवाओं में नशे की बढ़ती प्रवृत्ति को रोकने के लिए समाज के जागरूक लोगों को आगे आकर एक जनांदोलन करना पड़ेगा। जिससे कि समाज के सोए हुए लोगों तक एक संदेश पहुंच सके और समाज मुखर होकर इस प्रवृति को बढ़ावा देने वाले लोगों का विरोध कर सके।

Satyapal Singh Kaushik
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