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ध्रुवीकरण को उतावली भाजपा ने तीर फेंकने किए शुरू

भारतीय जनता पार्टी अपने परंपरागत एजेंडा हिंदू मुस्लिम आधारित राजनीति पर लौटने को उतावली दिखाई दे रही है....

ध्रुवीकरण को उतावली भाजपा ने तीर फेंकने किए शुरू
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माजिद अली खां

अगले साल कुछ राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे करीब आ रहे हैं वैसे वैसे भारतीय जनता पार्टी अपने परंपरागत एजेंडा हिंदू मुस्लिम आधारित राजनीति पर लौटने को उतावली दिखाई दे रही है. भारतीय जनता पार्टी समर्थित समाचार माध्यम हों या सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म हो, सबको बारीकी से देखने पर पता चलता है कि किस प्रकार ऐसे कंटेंट सामने लाए जा रहे हैं जो इन राज्यों में खास तौर पर उत्तर प्रदेश में ध्रुवीकरण की राजनीति का आधार बन सकें. पिछले दिनों अफगानिस्तान में सत्ता परिवर्तन के बाद तालिबान के सत्ता में आ जाने पर आज तक हमारी मेन स्ट्रीम मीडिया तालिबान को ही मुख्य मुद्दा बनाए हुए है. इसके अलावा सोशल मीडिया में फेसबुक और व्हाट्सएप पर मोब लिंचिंग की वीडियो बहुतायत के साथ आनी शुरू हो गई हैं और इसके साथ ही फिर वही धार्मिक उन्माद वाली बहस सोशल मीडिया में और अन्य जगहों पर सुनाई पड़ने लगी है. लेकिन इस बार जहां इन घटनाओं की चर्चा होती है वही दबे शब्दों में लोग यह भी कहने लगे हैं के चुनाव करीब है तो भारतीय जनता पार्टी अपनी परंपरागत फॉर्म में आकर माहौल को गर्म करेगी जिससे उसे हिंदू ध्रुवीकरण करने का मौका मिल जाए और फिर दोबारा सत्ता में आ जाए.

अभी कुछ दिन पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव को अब्बा जान कहा था जिस पर अखिलेश यादव वह दूसरे सपा नेताओं और शिवपाल सिंह यादव ने भी ऐतराज जताया था मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा अब्बा जान शब्द प्रयोग करना इस बात का परिचायक था. मुख्यमंत्री वही पुराना कार्ड इस चुनाव में भी खेलना चाहते हैं. भाजपा सांसद साक्षी महाराज अपने चिरपरिचित अंदाज के लिए जाने जाते हैं. उन्होंने भी दो दिन पहले अखिलेश यादव पर ऐसा ही बयान दिया. साक्षी महाराज ने निशाना साधते हुए कहा कि सपा और कांग्रेस को राम भक्तों का वोट नहीं चाहिए। जब बाबरी मस्जिद का ढांचा गिराया गया था तब सपा और कांग्रेस, उनके विरुद्ध खड़े थे. साक्षी महाराज ने कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि राजनीति में हमेशा द्वंद बने रहते हैं लेकिन कल्याण सिंह के निधन में शामिल न होकर सपा और कांग्रेस ने आने वाले समय में राम भक्तों को ललकारा है। मैं पूरा विश्वास जताता हूं कि आने वाले समय में राम भक्त इसका करारा जवाब देंगे, उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में इसका असर देखा जाएगा।

हालांकि जिन कल्याण सिंह के निधन पर अखिलेश यादव के ना जाने पर साक्षी महाराज नाराज हो रहे हैं वही कल्याण सिंह एक बार मुलायम सिंह यादव की पनाह में भी जा चुके हैं. इस प्रकार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का विधानसभा में खड़े होकर समाजवादी पार्टी पर यह कहकर निशाना साधना कि समाजवादी पार्टी के नेता तालिबान के समर्थक हैं और इन्हें आतंकवादियों का समर्थन करने में शर्म नहीं आती. इसके साथ साथ यदि भाजपा से जुड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म खंगाले जाएं तो वहां ऐसे कंटेंट की भरमार अब नजर आ रही है जिसमें धार्मिक नफरत वाली बहस पढ़ी जा सकती है.

अब इन सब चीजों को सामने रखकर यह बात साफ हो जाती है कि भारतीय जनता पार्टी अपने इस ध्रुवीकरण की राजनीति के अलावा किसी और तरीके से चुनाव प्रचार में नहीं उतरेगी. हालांकि भाजपा नेता बार-बार कहते हैं कि हम सब का साथ सब का विकास और सब का विश्वास नारे के साथ मैदान में उतरेंगे लेकिन उनके मीडिया प्रचार तंत्र को देखकर नहीं लगता कि उनके इस नारे में कुछ दम है. मुस्लिम युवकों की पिटाई, उनसे जय श्रीराम के नारे लगवाने के वीडियो जितनी तेज़ी से सोशल मीडिया में फेसबुक और व्हाट्सएप के साथ के माध्यम से सामने आ रहे हैं उससे अंदाज़ हो रहा कि भाजपा उतावली होती जा रही है. इसी क्रम में योगी सरकार ने मुजफ्फरनगर दंगे में 77मामले बिना कारण बताए वापस लिए हैं.

इसके साथ ही अखिलेश यादव ने भी भाजपा पर राज्य को सांप्रदायिकता की आग में झोंकने की साज़िश का आरोप लगा दिया है. अखिलेश ने एक बयान में आरोप लगाया, ''भाजपा बूथ स्तर पर साजिश में जुटी हुई है। भाजपा संविधान का सम्मान नहीं करती। वह लोकतंत्र के साथ ठगी करने की रणनीति बना रही है। दूसरे राज्यों से संघ के कार्यकर्ताओं को गाँव-गाँव पहुंचाया जा रहा है, ताकि बूथ स्तर पर षड्यंत्र किया जा सके. यदि अखिलेश के इन आरोपों में कोई सच्चाई है तो ये उत्तर प्रदेश के लिए बिलकुल भी अच्छा नही है. अब देखना ये है कि आखिर जनता पर भाजपा की राजनीति का कितना जादू होता है

माजिद अली खां

About author
माजिद अली खां, पिछले 15 साल से पत्रकारिता कर रहे हैं तथा राजनीतिक मुद्दों पर पकड़ रखते हैं. 'राजनीतिक चौपाल' में माजिद अली खां द्वारा विभिन्न मुद्दों पर राजनीतिक विश्लेषण पाठकों की सेवा में प्रस्तुत किए जाते हैं.
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