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सक्षम हुए संवेदनहीन, अबकी बार मदद के लिए नही बढ़े हाथ

सक्षम हुए संवेदनहीन, अबकी बार मदद के लिए नही बढ़े हाथ
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विकास त्रिपाठी राजनीतिक संपादक

पिछले साल की पहली कोरोना लहर के दौरान तमाम खिलाड़ियों सिनेमा जगत के लोगों और बड़े उद्योगपतियों ने दिल खोलकर लोगों की मदद की थी और महामारी से निपटने के लिए पीएम केयर्स फंड में भी जमकर दान दिया था। लेकिन अबकी बार हालात कुछ बदले बदले नजर आ रहे हैं।

यह किसी से छुपा नहीं है कि कोरोना की दूसरी लहर से स्थितियां बेहद भयावह हो चुकी है। ऐसे में जब लोगों को भरपूर मदद की जरूरत है, तब गिने चुने लोगों ने ही मदद के लिए हाथ बढ़ाएं हैं। हाल में ही ऑस्ट्रेलिया के दो क्रिकेटरों पैट कमिंस और ब्रेट ली ने कोरोना की मार झेल रहे भारतीयों के प्रति संवेदनशीलता दिखाते हुए क़रीब 42- 42 लाख रुपए दान दिए। इनके अलावा मुख्य रूप से सचिन तेंदुलकर ने मिशन ऑक्सीजन के लिए 1 करोड़, राजस्थान रॉयल्स की ओर से 7.5 करोड़ रुपए और दिल्ली चार्जर्स ने 1.5 करोड़ रुपए कोरोना से लड़ने के लिए दान दिये। कुछ अन्य खिलाड़ियों ने भी आंशिक मदद के प्रयास किए हैं। जबकि क्रिकेट को तमाशा बनाने वाले दुनिया के सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड बीसीसीआई के साथ ही तमाम बड़े-बड़े क्रिकेटरों ने किसी भी तरह की मदद से इस बार पूरी तरह परहेज किया है।

ऐसे नाजुक समय पर अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ लेने वाले लोगों को सबक जरूर सिखाना चाहिए। तमाम बड़े खिलाड़ियों को भगवान की तरह पूजने वाले उनके प्रशंसकों को अब यह समझना होगा कि इन खिलाड़ियों के लिए पैसे के अलावा और कुछ महत्वपूर्ण नहीं है।

वही अगर फिल्म जगत की बात करें तो सोनू सूद और अक्षय कुमार के अलावा कोई ऐसा नाम नहीं दिखता जिसने ऐसी मुसीबत की घड़ी में अपनी हैसियत के अनुसार मदद के लिए हाथ बढ़ाया हो। खास तौर पर जिस तरह से सोनू सूद ने मानवता के प्रति अपनी संवेदनशीलता दिखाई है उसने उन्हें सही मायने में देश का हीरो बनाया है। सलमान खान भी अपने तरीके से महामारी से पीड़ित लोगों की मदद करते रहते हैं लेकिन शाहरुख खान, आमिर खान, अमिताभ बच्चन जैसे अन्य तमाम बड़े नाम महामारी के दौरान बहुत छोटे लगने लगे हैं।

इस बार जिस तरह कोरोना जिस तरह लोगों पर कहर बनकर टूटा है, उसे देखते हुए मदद की अत्यधिक दरकार थी। स्थानीय स्तर पर छोटे-छोटे संगठनों ने तो अपनी क्षमता के अनुसार लोगों की सहायता की लेकिन बड़े-बड़े उद्योगपति इस बार पूरी तरह से फिसड्डी ही साबित हुए हैं। देश के बड़े औद्योगिक घराने ऐसे नाजुक समय पर अपनी मुट्ठी भींचे हुए हैं जब देश को उनके सहयोग की अत्यधिक अपेक्षा है।

सवाल यह नहीं है कि सभी सक्षम लोगों ने ऐसी आपदा के समय मदद क्यों नहीं की बल्कि सवाल यह है कि ऐसे लोगों की देश और देश के नागरिकों के प्रति कितनी संवेदनशीलता है और वह समाज के प्रति कितने जिम्मेदार हैं?

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