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जॉर्ज फर्नांडिस यदि आज जीवित होते

जॉर्ज फर्नांडिस यदि आज जीवित होते
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डॉ सुनीलम

पूर्व रक्षा मंत्री, रेल मंत्री, जॉर्ज फर्नांडिस यदि जीवित होते तो वे आज 91 वर्ष पूरा करते। मृत्यु के पहले ही लगभग 10 वर्षों तक बीमारी के चलते वे राजनीति से बाहर हो चुके थे क्योंकि वे शारीरिक तौर पर तो जीवित थे लेकिन कुछ भी सुनने, समझने और कहने की स्थिति में नहीं थे। कई बार ऐसा लगता था कि वे खुद के बिना देश और दुनिया को जीते जी देखना चाहते हैं।

जॉर्ज फर्नांडिस का नाम देश के उन गिने-चुने नेताओं में लिया जा सकता है जिन्होंने लोकप्रियता की शिखर तक पहुंचने का मुकाम हासिल किया । वे संघर्ष के प्रतीक होने के साथ-साथ नेहरू परिवार के प्रखर विरोधी के तौर पर भी जाने जाते थे ।

जॉर्ज फर्नाडीज ने ना केवल राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का केवल गठन किया बल्कि उसे संयोजक के तौर पर लंबे समय तक चलाया भी। राजनीति में जनसंघ से लेकर भाजपा को अछूत समझा जाता था। इसे वैधानिकता देने, कारगर बनाने तथा यूपीए के विकल्प के तौर पर खड़ा करने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका उनकी थी। मेरी नजर में भाजपा के साथ एनडीए में जाकर जो पाप उन्होंने किया है उसे आज देश भुगत रहा है । जॉर्ज वादियों को यह स्वीकार करना चाहिए ।

इसके बावजूद मैं जितना जॉर्ज फर्नांडिस को जानता था उसके आधार पर कह सकता हूं कि यदि जॉर्ज फर्नाडिस आज जीवित होते और सरकार में होते तो मुझे नहीं लगता कि वर्तमान किसान और मजदूर विरोधी कानून बन पाते। वे कारपोरेट के खिलाफ थे। कोको कोला से कारगिल कंपनी के खिलाफ उन्होंने संघर्ष किया था। इस कारण खेती कारपोरेट को सौपने के इरादे से बनाए गए कानून के वे कभी भी हिमायती नहीं हो सकते थे।

वे सरकार को लेबर कोड लागू करने की कभी भी इजाजत नहीं देते।

यदि कानून बन भी गए तो किसानों, श्रमिक संगठनों के साथ बैठकर जरूर कोई रास्ता निकाल लेते। वे सरकार और आंदोलनकारियों के बीच मध्यस्तता अवश्य करते।

जॉर्ज फर्नाडिस को रेलवे हड़ताल के लिए जाना और माना जाता है। जॉर्ज फर्नाडिस जीवित होते तो वे किसी भी कीमत पर रेलवे का निजीकरण नहीं होने देते।

जॉर्ज फर्नांडिस कश्मीर, पूर्वोत्तर, बर्मा और तिब्बत के सवाल पर सर्वाधिक संवेदनशील थे। यदि वे सरकार में होते तो सरकार की ओर से म्यांमार के मिलिट्री शासकों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं करवा पाते तो बयान जरूर दिलवाते तथा बर्मा में लोकतंत्र की बहाली के लिए दिल्ली में चलने वाले आंदोलन का सशरीर समर्थन करते।

जॉर्ज फर्नाडिस यदि जीवित होते तो कश्मीर में धारा 370 हटाई नहीं जा सकती थी तथा कश्मीर का विभाजन तथा तीन पूर्व मुख्यमंत्री की नजरबंदी संभव नहीं थी।

मुझे लगता है कि जॉर्ज फर्नांडिस जीवित होते तो वे मोदी सरकार के खिलाफ विपक्ष को गोलबंद करने के लिए गैर भाजपा वाद की रणनीति बनाते तथा लोकनायक जयप्रकाश नारायण जी की तरह मोदी-अमित शाह की तानाशाही को खत्म करने के लिए देश में जन आंदोलन करते। यदि संभव नहीं होता तो भूमिगत होकर मोदी सरकार को उखाड़ फेंकने की कार्य योजना पर कार्य कर रहे होते।

आज देशभर में कई राज्यों में जॉर्ज फर्नांडिस की स्मृति में आयोजित कार्यक्रमों में इस तरह की चर्चा हुई है।

यहां यह उल्लेख करना आवश्यक है कि जॉर्ज फर्नांडिस के संघर्ष का जितना स्वर्णिम इतिहास है उससे कम उनके द्वारा सरकार में शामिल रहने के लिए सांप्रदायिक ताकतों के साथ समझौता करने का काला इतिहास भी है।

आमतौर पर हम जिसे पसंद करते हैं उसका गुणगान करते हैं और जिसे नापसंद करते हैं उसके केवल दोष और कमियां गिनाते हैं। लेकिन हर व्यक्ति गुण-दोष का पुतला होता है जो जॉर्ज फर्नाडीज थे।

मैंने आज जॉर्ज फर्नांडिस के जन्मदिवस पर चर्चा में चार किस्से साँझा किये जिनसे पता चलता है कि वे किस तरह के व्यक्ति थे।

एक बार कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान सभी देशों के राष्ट्राध्यक्ष दिल्ली में मिल रहे थे। उन्होंने कार्यक्रम के एक दिन पहले मुझसे रात के 10 बजे बुलाकर कहा कि कल कामनवेल्थ गेम्स पर होने वाली फिजूलखर्ची के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करना है। उस समय मोबाइल फोन नहीं होता था। मैंने उनसे कहा कि तमाम राष्ट्राध्यक्ष आपके मित्र और परिचित है, कम संख्या में विरोध कार्यक्रम करने पर बेज्जती होगी। उन्होंने कहा कि पुलिस कमिश्नर को फोन कर दो और ठीक समझो तो कल सुबह आ जाना। दूसरे दिन 10 बजे सुबह जब मैं 7 ,जंतर मंतर पहुंचा ,तीन छात्रों को स्कूटर पर बिठाकर पहुंचा,

तब वहां 500 से ज्यादा पुलिसकर्मी और 50 से ज्यादा घोड़े के साथ पुलिस मौजूद थी। मेरे सहित चार लोगों के साथ नारा लगाते हुए जॉर्ज फर्नाडिस निकले। जंतर मंतर पर भीड़ इकट्ठी हो गई। डीटीएस की बस पर चढ़कर उन्होंने भाषण देना शुरू किया। देखते ही देखते एक घंटे में हज़ारों लोग इकट्ठे हो गए।

अगले दिन दुनिया के सभी अख़बारों में राष्ट्राध्यक्षयों की तस्वीर के साथ जॉर्ज फर्नाडिस के विरोध की तस्वीर भी समाचार के साथ प्रकाशित हुई। सार यह है वे कहते थे जो गलत लगे उसका विरोध करने में संख्या के बारे में मत सोचो।

दूसरा उदाहरण मैंने बताया है कि दिल्ली में एक बार प्रकाश सिंह बादल ने संविधान जलाया उसके बाद वे जॉर्ज साहब से मिलने हौज खास कार्यालय में आए तथा आते ही रोने लगी और यह कहने लगी कि मैं राष्ट्रभक्त हूं मुझे गलत मत समझना। मैंने देखा कि दोनों काफी देर तक गले लग कर रोते रहे। राष्ट्रभक्ति से सराबोर थे।यह बात अलग है कि शांति प्रयासों के चलते, कई बार उन्हें पाकिस्तानी एजेंट तक कहा गया।

तीसरा मैंने बिहार चुनाव का अनुभव बताया जब उनकी रात-रात भर सभाएं होती थी। वे एम्बेसडर कार में पीछे की सीट पर सोते थे। मंच के पास जब गाड़ी पहुंचती थी तब उठकर 45 मिनट भाषण देते थे । फिर

लौट कर सो जाते । रात-रात भर सभा के लिए कितने नेताओं के लिए जनता इंतजार करती है । आज यह कल्पना करना भी संभव नहीं है। आजकल मोदी - अमित शाह समेत तमाम बड़े नेताओं की सभाओं के लिए टेंट ,कुर्सीऔर माइक के इंतजाम के साथ-साथ भीड़ भी नगद नारायण के साथ इकट्ठी की जाती है।

चौथा किस्सा 3 कृष्णा मेनन मार्ग का है । बड़े मियां खानसामा थे। लैला जी के पिताजी कबीर साहेब के केंद्रीय मंत्री के समय से परिवार के सदस्य के तौर पर माने जाते थे।जॉर्ज साहेब को मैंने उनके साथ चाय में कितनी शक्कर खर्च होती है ,इसका हिसाब करते मैंने कई बार देखा ।

मेरे पास उपलब्ध सभी जानकारियों के आधार पर कह सकता हूँ कि उनपर लगाए गए तमाम आरोप गलत थे। इसलिए सरकारों की तमाम कोशिशों के बावजूद कभी भ्रस्टाचार के आरोप साबित नहीं किए जा सके। जॉर्ज फर्नाडिस अब नहीं है लेकिन उनकी याद उनके प्रियजनों के दिल में आज भी ताज़ा है। जिन्हें मैंने आपके साथ साँझा किया है।

डॉ सुनीलम

Shiv Kumar Mishra
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