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हारकर भी 'बाज़ीगर' बने त्रिवेन्द्र सिंह रावत, लेकिन जिससे हारे वो रह गया विधायक और खुद बने सीएम!

Special Coverage News
9 May 2019 1:41 PM IST
हारकर भी बाज़ीगर बने त्रिवेन्द्र सिंह रावत, लेकिन जिससे हारे वो रह गया विधायक और खुद बने सीएम!
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त्रिवेन्द्र सिंह रावत उत्तराखण्ड में किसी पहचान के मोहताज नहीं है. 2017 में मुख्यमंत्री बनने से पहले भी त्रिवेन्द्र का नाम राज्य की राजनीति में भाजपा के बड़े नेताओं में शुमार था. मुख्यमंत्री बनने से पहले वह राज्य के कृषि मंत्री रह चुके हैं. 2017 में जब भाजपा ने अब तक की सबसे बड़ी जीत दर्ज की तो त्रिवेन्द्र सिंह रावत को राज्य का आठवां मुख्यमंत्री बनाया गया. कमाल की बात ये है कि 2012 में हुए पिछले चुनाव में वह देहरादून की ही एक सीट से चुनाव हार गए थे. त्रिवेन्द्र सिंह रावत खांटी संघी रहे हैं. 2002 में चुनावी राजनीति में कदम रखने से पहले वह संघ के सक्रिय कार्यकर्ता थे. 1979 में ही त्रिवेन्द्र संघ में शामिल हो गए थे. तब से लेकर 2002 तक वे संघ के स्वयंसेवक के तौर पर उसकी विचारधारा को बढ़ाने का काम करते रहे.

साल 2000 में यूपी से अलग होकर उत्तराखण्ड नया राज्य बना. दो साल तक अंतरिम सरकार चलने के बाद 2002 में विधानसभा चुनाव हुए. संघ में बेहतरीन काम करने के एवज में त्रिवेन्द्र को भाजपा से टिकट मिला. वह देहरादून की डोईवाला विधानसभा के चुनाव लड़े और जीते. पांच साल तक एक विधायक की भूमिका निभाने वाले त्रिवेन्द्र का कद 2007 के चुनाव के बाद बढ़ गया. डोईवाला से ही वह फिर चुने गये और इस बार मंत्री पद हासिल किया. त्रिवेन्द्र रावत को तब के सीएम बीसी खण्डूरी ने कृषि राज्य मंत्री बनाया.

इस ओहदे तक पहुंचने के लिए त्रिवेन्द्र की पुरानी मेहनत काम आई. अलग उत्तराखण्ड राज्य के लिए वह काफी संघर्षरत रहे और कई बार जेल भी गए. उनके इसी आन्दोलित मिजाज को देखते हुए भाजपा आलाकमान ने उन्हें प्रदेश का पहला पार्टी अध्यक्ष बनाया था. हालांकि 2012 का चुनाव त्रिवेन्द्र सिंह रावत के लिए बड़ा सदमा लेकर आया. मंत्री रहने के तत्काल बाद उन्हें विधानसभा में हार का मुंह देखना पड़ा. रायपुर से वह कांग्रेस प्रत्याशी उमेश शर्मा 'काऊ' से चुनाव हार गए. किस्मत देखिए कि त्रिवेन्द्र जिस काऊ से सिर्फ़ 474 वोटों से चुनाव हारे थे वही काऊ आज बीजेपी के विधायक हैं जबकि त्रिवेंद्र रावत मुख्यमंत्री.

हालांकि हार को लेकर वह हताश नहीं रहे. कहते हैं न कि मन का हो तो अच्छा लेकिन मन का अगर न हो तो और भी अच्छा.... यह कहावत त्रिवेन्द्र सिंह रावत पर बिल्कुल फिट बैठती है. पांच साल तक त्रिवेन्द्र रावत अपने इलाके में सक्रिय रहे. इस बीच उन्हें पार्टी ने रांची का प्रभारी भी बनाया जहां उन्होंने अपने बड़े नेताओं के विश्वास को और बढ़ाया. साल आ गया 2017.... फिर से उत्तराखण्ड में चुनाव हुए और अपनी पहली वाली विधानसभा डोईवाला से त्रिवेन्द्र मैदान में उतरे... इस बार उनकी जीत ने उन्हें प्रदेश के सबसे बड़े ओहदे पर बिठा दिया. पिछले 17 सालों के उत्तराखण्ड के चुनावी इतिहास में जितने बड़े बहुमत ने त्रिवेन्द्र रावत ने सरकार बनाई वैसा किसी दूसरे सीएम को अब तक नसीब नहीं हुआ था.

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